MP में ऊंची बिल्डिंग बनाने पर सरकार का नया पहरा! अब इन शर्तों के बिना नहीं मिलेगी मंजूरी
भोपाल। मध्य प्रदेश में बहुमंजिला और गगनचुंबी इमारतों के निर्माण को लेकर सुरक्षा मानकों में बड़ा बदलाव किया जा रहा है। अब राज्य में किसी भी हाईराइज बिल्डिंग को मंजूरी देने से पहले अधिकृत जियोटेक्निकल लैब से मिट्टी की भार वहन क्षमता, मिट्टी की संरचना और भूजल स्तर की सघन जांच कराना अनिवार्य होगा। ‘मप्र एकीकृत भूमि विकास और भवन प्रोत्साहन नियम, 2026’ के नए प्रारूप में यह स्पष्ट प्रावधान किया गया है कि मिट्टी की मजबूती की ‘सोइल स्टेबिलिटी रिपोर्ट’ सकारात्मक आने के बाद ही निर्माण की दिशा में अगला कदम उठाया जा सकेगा।
15 मंजिल या 45 मीटर से ऊंचे भवनों पर लागू होंगे नियम
तैयार किए गए नियमों के अनुसार, 15 मंजिल से अधिक या 45 मीटर से ऊंचे किसी भी भवन को हाईराइज श्रेणी में माना जाएगा। ऐसे भवनों को तब तक निर्माण स्वीकृति नहीं मिलेगी जब तक कि विशेष ‘साइट क्लीयरेंस कमेटी’ स्थल का स्थलीय और तकनीकी परीक्षण कर स्पष्ट मंजूरी न दे दे। मिट्टी की कठोरता और गहराई के सटीक विश्लेषण के आधार पर ही भवन का स्ट्रक्चरल डिजाइन तैयार किया जाएगा, ताकि भारी वजन या भूकंप के झटकों से इमारत धंसने का खतरा न रहे।
साइट क्लीयरेंस कमेटी इन बिंदुओं की करेगी जांच:
भौगोलिक उपयुक्तता: प्रस्तावित स्थल किसी फॉल्ट लाइन, अत्यधिक जलभराव वाले क्षेत्र, कमजोर ढलान या नदी-नाले के कैचमेंट एरिया के समीप तो नहीं है।
बुनियादी ढांचे की सुरक्षा: ऊंची इमारत का भारी वजन आसपास की जमीन, मेट्रो टनल, गैस पाइपलाइन या मुख्य सीवर लाइन जैसी भूमिगत संरचनाओं को नुकसान तो नहीं पहुंचाएगा।
10 साल के अनुभवी इंजीनियरों की जवाबदेही तय, गड़बड़ी पर ब्लैकलिस्ट
भवन निर्माण की पूरी प्रक्रिया में नेशनल बिल्डिंग कोड (NBC) के कड़े मानकों का अनुपालन अनिवार्य बनाया गया है। नए नियमों के अंतर्गत जांच और तकनीकी अनुमति देने का अधिकार केवल उन्हीं अधिकृत आर्किटेक्ट्स या स्ट्रक्चरल इंजीनियर्स को होगा, जिनके पास न्यूनतम 10 वर्ष का प्रमाणित कार्य अनुभव हो। यदि किसी भी स्तर पर सोइल टेस्टिंग या स्ट्रक्चरल स्टेबिलिटी जैसे अनिवार्य मानकों की अनदेखी पाई गई या गलत जानकारी देकर मंजूरी ली गई, तो संबंधित इंजीनियर या आर्किटेक्ट के विरुद्ध दंडात्मक कार्रवाई की जाएगी और उन्हें ब्लैकलिस्ट किया जाएगा।
