जज को ‘मालिक का सेवक’ बताना पड़ा भारी! एक पोस्ट ने बढ़ाई रत्ना सिंह की मुश्किलें, अब चलेगा अवमानना का केस
नई दिल्ली। दिल्ली सरकार ने कॉकरोच जनता पार्टी की लीगल टीम की प्रमुख रत्ना सिंह के खिलाफ आपराधिक अवमानना की कार्रवाई शुरू करने के लिए औपचारिक सहमति दे दी है। दिल्ली सरकार के अतिरिक्त स्थायी वकील अमोल सिन्हा ने रत्ना सिंह के खिलाफ इस कानूनी प्रक्रिया को आगे बढ़ाने की मंजूरी दी है। रत्ना सिंह पार्टी की कानूनी टीम की कमान संभालती हैं और पार्टी से जुड़े विधिक मामलों में सक्रिय भूमिका निभाती रही हैं। अब सरकार की ओर से हरी झंडी मिलने के बाद उनके खिलाफ दिल्ली हाईकोर्ट में आपराधिक अवमानना का मुकदमा चलाने का रास्ता साफ हो गया है।
सोशल मीडिया पर न्यायिक निष्पक्षता पर उठाए थे सवाल
दरअसल, यह पूरा मामला रत्ना सिंह द्वारा सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर की गई कुछ टिप्पणियों से जुड़ा है। अपने पोस्ट में उन्होंने आरोप लगाया था कि अदालत के एक जज किसी अज्ञात ‘मालिक’ के निर्देश पर काम कर रहे हैं। दिल्ली सरकार की ओर से दी गई आधिकारिक राय में स्पष्ट किया गया है कि इस तरह के आरोप प्रथम दृष्टया न्यायपालिका की स्वतंत्रता और निष्पक्षता पर सीधा हमला करते हैं। इसके साथ ही, ऐसे बयानों से न्याय व्यवस्था के प्रति आम जनता का विश्वास भी कमजोर होने का गंभीर खतरा पैदा होता है।
साकेत कोर्ट के आदेश से शुरू हुआ था विवाद
इस विवाद की पृष्ठभूमि साकेत कोर्ट के एक आदेश से जुड़ी है। 10 अक्टूबर को साकेत कोर्ट के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट अभिनव पांडे ने दिल्ली पुलिस द्वारा रत्ना सिंह की कथित हिरासत के संबंध में उन्हें कोई राहत देने से इनकार कर दिया था। राहत न मिलने के बाद रत्ना सिंह ने सोशल मीडिया पर असंतोष जाहिर करते हुए न्यायिक अधिकारी के आचरण पर तीखे सवाल खड़े किए थे। उन्होंने एक पोस्ट में लिखा था कि “न्यायाधीश मालिक की सेवा कर रहा था”, जबकि एक अन्य पोस्ट में सुझाव दिया गया कि पुलिस और न्यायाधीश दोनों मिलकर किसी “मालिक के आदेश का पालन कर रहे थे।”
न्यायिक फैसलों की आलोचना और दुर्भावनापूर्ण आरोप में फर्क
अतिरिक्त स्थायी वकील अमोल सिन्हा ने 2 नवंबर को दी गई अपनी राय में उल्लेख किया कि रत्ना सिंह द्वारा लगाए गए आरोप दिल्ली हाईकोर्ट के आपराधिक अवमानना अधिकार क्षेत्र को लागू करने के लिए पर्याप्त आधार प्रदान करते हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि किसी भी न्यायिक आदेश के कानूनी पहलुओं की आलोचना की जा सकती है, लेकिन किसी कार्यरत न्यायाधीश पर बाहरी प्रभाव या अनुचित इरादों का आरोप लगाना बिल्कुल अलग और गंभीर मामला है। ऐसे बयान जो यह संकेत दें कि कोई जज अपने स्वतंत्र विवेक से काम न करके किसी बाहरी निर्देश पर चल रहा है, वे पूरी न्याय प्रणाली की साख को नुकसान पहुंचाते हैं। अब यह पूरी प्रक्रिया अदालत अवमानना अधिनियम, 1971 की धारा 15(2) के तहत आगे बढ़ाई जाएगी, जिस पर अंतिम फैसला दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा लिया जाएगा।
