वोटर लिस्ट से गायब हो गया नाम? न हों परेशान: चुनाव आयोग ने दी बड़ी राहत, पुराने वोटर भी भरें फॉर्म-6

नई दिल्ली। विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के दौरान प्रकाशित ड्राफ्ट मतदाता सूची से नाम गायब होने की चिंता से जूझ रहे लाखों मतदाताओं के लिए भारत निर्वाचन आयोग (ECI) ने बड़ी राहत दी है। आयोग ने स्पष्ट किया है कि जिन पुराने मतदाताओं के नाम मसौदा सूची में शामिल नहीं हैं, वे बिना किसी हिचकिचाहट और डर के फॉर्म-6 भरकर अपना नाम दोबारा जुड़वा सकते हैं। आयोग ने साफ कर दिया है कि पुराने मतदाताओं द्वारा फॉर्म-6 भरने को कतई झूठी घोषणा नहीं माना जाएगा और उन पर किसी प्रकार की कानूनी कार्रवाई नहीं होगी।

पुराने वोटरों के मन में क्यों था कानूनी कार्रवाई का खौफ?

दरअसल, 1 अगस्त 2022 से लागू व्यवस्था के तहत फॉर्म-6 में एक अनिवार्य घोषणा पत्र शामिल होता है, जिसमें लिखा होता है-“मेरा नाम पहली बार मतदाता सूची में शामिल किया जा रहा है।”

विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के तहत जब ड्राफ्ट सूची सामने आई, तो कई पुराने मतदाताओं ने पाया कि उनके नाम सूची से गायब हैं। ऐसे मतदाता फॉर्म-6 भरने से कतरा रहे थे। उनके मन में भय था कि चूंकि वे पहले भी मतदान कर चुके हैं, इसलिए यह घोषणा करने पर उन पर लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 31 (गलत या झूठी घोषणा करना) के तहत मुकदमा दर्ज हो सकता है और सजा हो सकती है। इस व्यापक भ्रम और असमंजस को देखते हुए चुनाव आयोग ने सामने आकर पूरी स्थिति स्पष्ट की है।

चुनाव आयोग का दो टूक निर्देश: नहीं माना जाएगा झूठा बयान

निर्वाचन आयोग ने आदेश में स्पष्ट किया है कि यदि किसी मतदाता का नाम ड्राफ्ट रोल में नहीं है, तो उसे अपना मताधिकार सुरक्षित करने के लिए नए सिरे से फॉर्म-6 भरना ही होगा—चाहे वह व्यक्ति अतीत में कितनी भी बार वोट डाल चुका हो।

आयोग ने सभी निर्वाचक पंजीकरण अधिकारियों (ERO) को कड़े निर्देश दिए हैं कि केवल इस आधार पर किसी भी नागरिक के खिलाफ धारा 31 के तहत कोई केस या दंडात्मक कार्रवाई न की जाए कि वह पूर्व में पंजीकृत मतदाता था और अब फिर से फॉर्म-6 जमा कर रहा है।

राहत के साथ बस एक जरूरी शर्त

चुनाव आयोग ने स्पष्ट किया है कि इस राहत के साथ मतदाताओं के लिए केवल एक बुनियादी शर्त लागू होगी—मतदाता का नाम देश के किसी अन्य विधानसभा या लोकसभा क्षेत्र की मौजूदा सूची में दर्ज नहीं होना चाहिए। यदि किसी नागरिक का नाम कहीं भी दर्ज नहीं है या कट चुका है, तो वह पूरी तरह सुरक्षित और वैध रूप से फॉर्म-6 भर सकता है।

दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले पर मुहर

चुनाव आयोग का यह कदम दिल्ली उच्च न्यायालय के उस ऐतिहासिक आदेश के अनुरूप है, जो निलोत्पल दत्ता बनाम निर्वाचन आयोग मामले में सुनाया गया था। अदालत ने भी साफ तौर पर कहा था कि पूर्व में मतदाता रह चुके व्यक्ति द्वारा फॉर्म-6 भरना किसी भी तरह से असत्य या भ्रामक घोषणा नहीं है, और नागरिकों का भय निराधार है।

आयोग ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के मुख्य निर्वाचन अधिकारियों (CEOs) को निर्देश जारी किए हैं कि इस राहतकारी स्पष्टीकरण का स्थानीय व क्षेत्रीय भाषाओं में व्यापक स्तर पर प्रचार-प्रसार कराया जाए, ताकि कोई भी पात्र भारतीय नागरिक केवल प्रशासनिक भ्रम के चलते अपने बहुमूल्य मताधिकार से वंचित न रहे।

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