धान की टोकरी, जलता दीपक और सुवा नृत्य… छत्तीसगढ़ में दिवाली से पहले निभाई जाती है ये खास परंपरा

सुवा नृत्य

छत्तीसगढ़ की पहचान सिर्फ यहां के त्योहारों, खान-पान और प्राकृतिक सुंदरता से ही नहीं, बल्कि यहां की समृद्ध लोकसंस्कृति और सदियों पुरानी परंपराओं से भी है। इन्हीं परंपराओं में एक बेहद खूबसूरत परंपरा है सुवा नृत्य, जो दीपावली आने से कई दिन पहले ही प्रदेश के गांवों और शहरों में उत्सव का माहौल बना देती है। शाम ढलते ही जब घरों और दुकानों के सामने महिलाओं और छोटी-छोटी बच्चियों के समूह पारंपरिक गीत गाते हुए पहुंचते हैं, तो ऐसा लगता है मानो लोकसंस्कृति खुद लोगों के आंगन में उतर आई हो।

सुवा नृत्य केवल मनोरंजन या नाच-गाने का माध्यम नहीं है, बल्कि यह छत्तीसगढ़ की लोकआस्था, खुशहाली, आपसी मेल-जोल और सामूहिक जीवन का प्रतीक भी है। खास बात यह है कि इस परंपरा में दीपावली की खुशियां सिर्फ एक घर तक सीमित नहीं रहतीं, बल्कि पूरा गांव और मोहल्ला इसमें शामिल हो जाता है।

क्या है सुवा नृत्य और कैसे निभाई जाती है यह परंपरा?

सुवा नृत्य को छत्तीसगढ़ का पारंपरिक लोकनृत्य माना जाता है। इसे मुख्य रूप से महिलाएं और युवतियां समूह में करती हैं। दीपावली से कुछ दिन पहले इसकी शुरुआत होती है। कई जगहों पर छोटी बच्चियां भी इस परंपरा में पूरे उत्साह के साथ शामिल होती हैं।

इस परंपरा में एक टोकरी को सजाया जाता है, जिसमें मिट्टी का तोता यानी सुवा रखा जाता है। कई स्थानों पर इस टोकरी को धान, चावल और अन्य पारंपरिक वस्तुओं से सजाने की भी परंपरा है। टोकरी के बीचोंबीच दीपक जलाया जाता है। इसके बाद महिलाओं और बच्चियों का समूह गांव की गलियों, घरों और दुकानों तक पहुंचता है।

वे टोकरी को बीच में रखकर उसके चारों ओर गोल घेरा बनाती हैं और तालियों की लय पर सुवा गीत गाते हुए नृत्य करती हैं। इन गीतों में लोकजीवन, प्रेम, विरह, प्रकृति, पारिवारिक रिश्तों और सुख-समृद्धि की भावनाएं देखने को मिलती हैं।

नृत्य के दौरान महिलाएं और बच्चियां घर-परिवार के लिए सुख, शांति और खुशहाली की कामना करते हुए आशीर्वाद भी देती हैं। इसके बदले घर के लोग उन्हें श्रद्धा और खुशी के साथ चावल, धान या अनाज देते हैं, जबकि दुकानदार और अन्य लोग अपनी सामर्थ्य के अनुसार पैसे या भेंट देते हैं।

सुवा नृत्य में तोते का क्या है महत्व?

सुवा का अर्थ होता है तोता। इस नृत्य में तोते को केवल एक पक्षी के रूप में नहीं, बल्कि भावनाओं और संदेशों के प्रतीक के रूप में देखा जाता है। लोकमान्यताओं के अनुसार, पुराने समय में महिलाएं तोते के माध्यम से अपने मन की बातें, भावनाएं और संदेश अपने प्रियजनों तक पहुंचाने की कल्पना करती थीं।

धीरे-धीरे यह भाव लोकगीत और नृत्य का हिस्सा बन गया। टोकरी में रखा मिट्टी का सुवा इस पूरी परंपरा का केंद्र बन गया। महिलाएं गीतों के माध्यम से उससे बातें करती हैं, सवाल-जवाब करती हैं और अपने मन की भावनाएं व्यक्त करती हैं।

टोकरी में धान और जलते दीपक का क्या है महत्व?

सुवा नृत्य में इस्तेमाल होने वाली टोकरी भी अपने आप में बहुत खास होती है।

  • धान: छत्तीसगढ़ कृषि प्रधान प्रदेश है। यहां धान केवल फसल नहीं, बल्कि जीवन और समृद्धि का आधार है। इसलिए टोकरी में धान रखना नई फसल, अन्न और खुशहाली का प्रतीक माना जाता है।

  • मिट्टी का तोता: यह सुवा नृत्य की पहचान है। इसके माध्यम से महिलाएं अपने लोकगीतों और भावनाओं को अभिव्यक्त करती हैं।

  • जलता हुआ दीपक: दीपक प्रकाश, सकारात्मकता और मंगलकामना का प्रतीक है। यह दीपावली के उत्सव और लोकआस्था से इस परंपरा का जुड़ाव भी दर्शाता है।

  • बांस की टोकरी: यह ग्रामीण जीवन, खेती-किसानी और स्थानीय हस्तकला से जुड़ी हुई है।

इस तरह टोकरी में रखी ये चीजें छत्तीसगढ़ की कृषि संस्कृति और लोकजीवन की झलक दिखाती हैं।

सुवा गीतों में छिपी होती हैं महिलाओं के मन की भावनाएं

सुवा नृत्य की सबसे खूबसूरत बात इसके गीत हैं। इन गीतों के लिए किसी बड़े मंच, संगीत व्यवस्था या आधुनिक वाद्ययंत्र की जरूरत नहीं होती। महिलाएं अपनी आवाज और तालियों की थाप से ही पूरा माहौल संगीतमय बना देती हैं।

इन गीतों में कहीं प्रेम और विरह की भावनाएं होती हैं, तो कहीं शिव-पार्वती, गौरा-गौरी, पारिवारिक रिश्तों और सामाजिक जीवन का वर्णन मिलता है। कई गीतों में सवाल-जवाब की शैली भी देखने को मिलती है।

कुछ गीतों में महिलाएं अपने सुख-दुख को बयां करती हैं, तो कुछ में देवी-देवताओं का स्मरण करते हुए परिवार की खुशहाली की कामना करती हैं। यही वजह है कि सुवा गीतों को महिलाओं की भावनाओं की अभिव्यक्ति का माध्यम भी माना जाता है।

धान और पैसे देने की परंपरा के पीछे क्या है कहानी?

अब सवाल आता है कि आखिर सुवा नृत्य करने वाली महिलाओं और बच्चियों को घरों के सामने नृत्य करने के बाद चावल, धान या पैसे क्यों दिए जाते हैं?

दरअसल, इस परंपरा का संबंध केवल उपहार देने से नहीं, बल्कि सामूहिक सहयोग और लोकपरंपरा से भी है।

पुराने समय में सुवा नृत्य करने वाली महिलाएं गांव के किसानों के घरों में जाती थीं। वहां उन्हें धान, चावल और पैसे भेंट किए जाते थे। इनसे एकत्रित अनाज और राशि का उपयोग गौरा-गौरी के विवाह उत्सव की तैयारियों और आयोजन में किया जाता था।

छत्तीसगढ़ में गौरा-गौरी पर्व भगवान शिव और माता पार्वती के विवाह के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है। इस तरह सुवा नृत्य केवल एक लोकनृत्य नहीं, बल्कि सामूहिक रूप से त्योहार मनाने और धार्मिक आयोजनों में सहयोग करने की परंपरा भी रहा है।

आज भी कई जगहों पर यह परंपरा जारी है। घरों में लोग अपनी श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार अनाज या पैसे देते हैं। बदले में नृत्य करने वाली महिलाएं और बच्चियां परिवार को सुख-समृद्धि और खुशहाली का आशीर्वाद देती हैं।

सिर्फ नृत्य नहीं, महिलाओं की एकजुटता का प्रतीक है सुवा

सुवा नृत्य की एक और खासियत है कि इसमें महिलाओं को एक साथ आने, अपनी कला दिखाने और अपनी भावनाएं व्यक्त करने का अवसर मिलता है।

गांव की महिलाएं और बच्चियां समूह बनाकर निकलती हैं। वे एक-दूसरे के साथ गीत सीखती हैं, नृत्य की लय बनाती हैं और नई पीढ़ी को इस परंपरा से जोड़ती हैं।

छोटी बच्चियां जब अपनी मां, दादी और गांव की दूसरी महिलाओं के साथ सुवा नृत्य करती हैं, तो वे अनजाने में ही छत्तीसगढ़ की लोकसंस्कृति की विरासत को आगे बढ़ाने लगती हैं।

आज शहरों में भी अपार्टमेंट, कॉलोनियों, बाजारों और दुकानों के सामने सुवा नृत्य की टोलियां दिखाई देने लगी हैं। आधुनिक जीवनशैली के बीच यह परंपरा लोगों को अपनी जड़ों और सांस्कृतिक पहचान से जोड़ती है।

बदलते समय में भी कायम है सुवा नृत्य की पहचान

आज मनोरंजन के साधन बदल गए हैं। मोबाइल, इंटरनेट और आधुनिक संगीत के दौर में भी छत्तीसगढ़ की महिलाएं और बच्चियां सुवा नृत्य को जीवित रखे हुए हैं।

कई जगहों पर अब पारंपरिक वेशभूषा के साथ बच्चियां साड़ी पहनकर भी इस नृत्य में हिस्सा लेती हैं। कुछ स्थानों पर सांस्कृतिक कार्यक्रमों और मंचों पर भी इसकी प्रस्तुतियां दी जाती हैं।

हालांकि, सुवा नृत्य की असली खूबसूरती आज भी गांव की गलियों, घरों के आंगन और दुकानों के सामने ही नजर आती है, जहां बिना किसी बड़े आयोजन के महिलाएं अपनी आवाज और तालियों से लोकसंस्कृति का उत्सव रच देती हैं।

आखिर क्यों खास है छत्तीसगढ़ का सुवा नृत्य?

सुवा नृत्य की खासियत यह है कि इसमें धर्म, संस्कृति, कृषि, लोकगीत, सामूहिक सहयोग और महिलाओं की भावनाएं एक साथ दिखाई देती हैं।

यह हमें बताता है कि त्योहार केवल नए कपड़े पहनने, मिठाइयां बांटने और घर सजाने का नाम नहीं हैं। त्योहारों की असली खुशी एक-दूसरे से जुड़ने, खुशियां बांटने और अपनी परंपराओं को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने में है।

दीपावली की जगमगाहट के बीच जब किसी गली में तालियों की थाप सुनाई देती है और महिलाएं गाती हैं ‘सुवा रे सुवा…’, तो वह केवल एक गीत नहीं होता, बल्कि छत्तीसगढ़ की मिट्टी, उसकी खेती-किसानी और सदियों पुरानी लोकविरासत की आवाज होती है।

सच कहें तो सुवा नृत्य छत्तीसगढ़ की वह सांस्कृतिक धरोहर है, जिसमें एक टोकरी में रखा छोटा-सा तोता पूरे समाज को प्रेम, सहयोग, खुशहाली और अपनी जड़ों से जुड़े रहने का संदेश देता है।

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