अमेरिका-इजरायल से कितने दिन जंग लड़ सकता है ईरान? किसके पास कितनी ताकत और हथियार बचा? भारत पर इसका क्या असर…
ईरान बनाम अमेरिका-इजरायल
मध्य पूर्व में छिड़ा ईरान-अमेरिका-इजरायल युद्ध अब सातवें दिन में पहुंच गया है। 28 फरवरी 2026 को अमेरिका और इजरायल ने संयुक्त रूप से ईरान के परमाणु और सैन्य ठिकानों पर बड़े पैमाने पर हवाई हमले शुरू किए थे। इसके बाद ईरान ने भी जवाबी कार्रवाई करते हुए मिसाइल और ड्रोन से हमले शुरू कर दिए। 7 मार्च 2026 तक यह संघर्ष लगातार तेज होता जा रहा है और इसका असर सिर्फ मध्य पूर्व तक सीमित नहीं है, बल्कि भारत समेत दुनिया की अर्थव्यवस्था पर भी दिखने लगा है।
युद्ध क्यों शुरू हुआ?
इस युद्ध की सबसे बड़ी वजह ईरान का परमाणु कार्यक्रम और उसकी मिसाइल क्षमता है। अमेरिका और इजरायल का आरोप है कि ईरान तेजी से परमाणु हथियार बनाने के करीब पहुंच रहा था और इससे क्षेत्रीय सुरक्षा को खतरा पैदा हो रहा था। इसी कारण दोनों देशों ने मिलकर ईरान के परमाणु ठिकानों और सैन्य बेस पर हमले शुरू किए। ईरान ने इन हमलों को अपनी संप्रभुता पर हमला बताते हुए जवाबी कार्रवाई शुरू कर दी। इसके बाद पूरे क्षेत्र में युद्ध का माहौल बन गया।
इन 7 दिनों में किसे कितना नुकसान ?
यह युद्ध 28 फरवरी 2026 को शुरू हुआ था। 7 मार्च 2026 तक यह संघर्ष सातवें दिन में पहुंच चुका है। इन सात दिनों में अमेरिका और इजरायल ने ईरान के हजारों सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया है। अमेरिकी सेना के अनुसार एक सप्ताह के भीतर 3000 से अधिक हवाई और मिसाइल हमले किए जा चुके हैं। इन हमलों में ईरान के नौसैनिक जहाज, मिसाइल बेस और एयर डिफेंस सिस्टम को भारी नुकसान हुआ है।
ईरान के पास अब कितना गोला-बारूद ?
युद्ध से पहले ईरान के पास बड़ी मिसाइल क्षमता मानी जाती थी। विशेषज्ञों के अनुसार ईरान के पास लगभग 2500 से 3000 बैलिस्टिक मिसाइलें थीं। युद्ध के पहले सप्ताह में ही ईरान ने 500 से अधिक बैलिस्टिक मिसाइलें, करीब 2000 ड्रोन अमेरिका और इजरायल के ठिकानों की ओर दाग दिए हैं। इसके अलावा अमेरिकी और इजरायली हमलों में ईरान की लगभग 1000 मिसाइलें और कई लॉन्चर सिस्टम नष्ट किए जाने का दावा भी किया गया है।यानी अनुमान लगाया जा रहा है कि ईरान के पास अब भी 1000-1500 के आसपास मिसाइलों का भंडार हो सकता है, लेकिन उसकी लॉन्च क्षमता कमजोर हो रही है।
अमेरिका और इजरायल की सैन्य ताकत
अमेरिका और इजरायल की संयुक्त सैन्य शक्ति तकनीकी रूप से दुनिया में सबसे मजबूत मानी जाती है। अमेरिका के पास दुनिया की सबसे बड़ी वायु सेना, F-35 और B-2 जैसे स्टेल्थ फाइटर, टॉमहॉक क्रूज मिसाइल, विमानवाहक पोत और परमाणु पनडुब्बियां। इजरायल के पास आयरन डोम मिसाइल रक्षा प्रणाली, एरो और डेविड्स स्लिंग एयर डिफेंस सिस्टम, अत्याधुनिक साइबर और खुफिया तंत्र, विशेषज्ञों का मानना है कि युद्ध का फैसला इस बात पर निर्भर करेगा कि पहले किस पक्ष के मिसाइल और इंटरसेप्टर खत्म होते हैं।
कितने दिन जंग लड़ सकता है ईरान?
सैन्य विशेषज्ञों के अनुसार ईरान सीधे युद्ध में अमेरिका को नहीं हरा सकता, लेकिन वह लंबे युद्ध की रणनीति अपनाकर संघर्ष को महीनों तक खींच सकता है।
ईरान की रणनीति तीन बातों पर आधारित मानी जाती है:
ड्रोन और मिसाइल से लगातार हमला
खाड़ी क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाना
तेल आपूर्ति के महत्वपूर्ण मार्ग होरमुज जलडमरूमध्य को बाधित करना यदि यह रास्ता बंद होता है तो पूरी दुनिया की तेल सप्लाई प्रभावित हो सकती है।
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भारत पर क्या असर पड़ रहा है?
इस युद्ध का असर भारत में भी दिखने लगा है।
1. गैस सिलेंडर महंगा
7 मार्च 2026 से भारत में घरेलू LPG सिलेंडर ₹60 महंगा, कमर्शियल सिलेंडर ₹115 महंगा हो गया है। सरकार का कहना है कि वैश्विक ऊर्जा बाजार में तनाव और सप्लाई बाधित होने के कारण कीमतें बढ़ी हैं।
2. तेल और गैस सप्लाई पर खतरा
भारत अपने तेल का लगभग 90% हिस्सा विदेशों से आयात करता है और उसका बड़ा हिस्सा मध्य पूर्व से आता है। युद्ध के कारण तेल की कीमतें तेजी से बढ़कर लगभग 85 डॉलर प्रति बैरल पहुंच गई हैं। गैस और LNG की सप्लाई भी प्रभावित होने लगी है। यदि युद्ध लंबा चला तो पेट्रोल, डीजल और गैस की कीमतों में और बढ़ोतरी हो सकती है।
3. रिफाइनरियों को इमरजेंसी आदेश
भारत सरकार ने ऊर्जा संकट से बचने के लिए रिफाइनरियों को LPG उत्पादन बढ़ाने का निर्देश दिया है ताकि घरेलू गैस की कमी न हो। सरकार वैकल्पिक देशों से तेल और गैस खरीदने के विकल्प भी तलाश रही है।
निष्कर्ष
ईरान-अमेरिका-इजरायल युद्ध अब सातवें दिन में है और इसकी तीव्रता लगातार बढ़ रही है। जहां अमेरिका और इजरायल तकनीकी और सैन्य ताकत में आगे हैं, वहीं ईरान मिसाइल और ड्रोन हमलों के जरिए युद्ध को लंबा खींचने की कोशिश कर रहा है। इस संघर्ष का असर केवल मध्य पूर्व तक सीमित नहीं है। भारत सहित पूरी दुनिया में तेल और गैस की कीमतें बढ़ रही हैं और आने वाले दिनों में महंगाई पर भी इसका असर पड़ सकता है। यदि यह युद्ध जल्द खत्म नहीं हुआ तो ऊर्जा बाजार, वैश्विक व्यापार और आम लोगों की जेब पर इसका असर और भी गहरा हो सकता है।
