पवन खेड़ा का पीएम मोदी पर तीखा पलटवार: कहा- बातों से नहीं, अपने कामों से साबित करें चुनावी ताकत

नई दिल्ली। चार राज्यों के विधान परिषद (MLC) चुनावों में मतपत्रों के जरिए हुए मतदान में कांग्रेस का खाता न खुलने पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा किए गए कटाक्ष के बाद सियासी घमासान तेज हो गया है। प्रधानमंत्री की टिप्पणी पर कांग्रेस ने कड़ा ऐतराज जताते हुए सीधा पलटवार किया है। पार्टी के वरिष्ठ नेता एवं राज्यसभा सांसद पवन खेड़ा ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को खुली चुनौती देते हुए कहा है कि यदि उन्हें अपनी पार्टी की चुनावी ताकत और लोकप्रियता पर इतना ही भरोसा है, तो वे आगामी सभी लोकसभा और विधानसभा चुनाव बैलेट पेपर से कराने का वादा करें।

बातों से नहीं, फैसलों से ताकत साबित करने की चुनौती

पवन खेड़ा ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘X’ पर एक बयान जारी करते हुए प्रधानमंत्री के दावों को आड़े हाथों लिया। उन्होंने कहा कि अगर नरेंद्र मोदी को पूरा विश्वास है कि चुनाव परिणामों पर इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM) का कोई असर नहीं पड़ता, तो उन्हें सिर्फ मौखिक बयानबाजी करने के बजाय अपने फैसलों से भाजपा का जनाधार साबित करना चाहिए। खेड़ा ने स्पष्ट किया कि जब तक सरकार ठोस कदम नहीं उठाती, तब तक प्रधानमंत्री द्वारा किए जाने वाले तमाम दावे केवल खोखले शब्द बनकर रह जाएंगे, जिन्हें कोई भी गंभीरता से नहीं ले सकता।

बैलेट पेपर से चुनाव और मतदाता सूची बहाली की रखी मांग

कांग्रेस नेता ने केंद्र सरकार और प्रधानमंत्री के समक्ष चार प्रमुख मांगें रखीं। उन्होंने सबसे पहले मांग की कि सरकार यह वादा करे कि भविष्य में होने वाले सभी लोकसभा चुनाव और आगामी राज्यों के विधानसभा चुनाव अनिवार्य रूप से बैलेट पेपर के जरिए ही संपन्न कराए जाएंगे। इसके साथ ही उन्होंने एसआईआर (SIR) प्रक्रिया पर तुरंत रोक लगाने और मतदाता सूची से कथित तौर पर हटाए गए 13.3 करोड़ नागरिकों के नाम तुरंत वापस जोड़ने का मुद्दा भी उठाया।

निष्पक्ष व्यवस्था के लिए जवाबदेही तय करने पर जोर

पवन खेड़ा ने चुनावी व्यवस्था की साख पर सवाल उठाते हुए ज्ञानेश गुप्ता को उनके पद से तुरंत हटाने की मांग की। इसके अलावा उन्होंने उस कानून को भी तत्काल प्रभाव से निरस्त करने की वकालत की, जो ज्ञानेश गुप्ता को आजीवन कानूनी सुरक्षा यानी इम्युनिटी प्रदान करता है। खेड़ा ने अपने वक्तव्य में कहा कि जब तक इन गंभीर विषयों पर कोई ठोस और पारदर्शी कदम नहीं उठाया जाता, तब तक व्यवस्था की निष्पक्षता को लेकर उठ रहे सवालों को खारिज नहीं किया जा सकता।

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