Pakistan Iran Airbase Controversy: अमेरिका की नजरों में आया पाकिस्तान, ईरानी विमानों को शरण देने के आरोप

Pakistan Iran Airbase Controversy

Pakistan Iran Airbase Controversy: 1971 के युद्ध में ईरान ने पाकिस्तान को सहारा दिया था, अब नूर खान एयरबेस पर ईरानी विमानों को शरण देने के आरोपों ने नई भू-राजनीतिक बहस छेड़ दी है

Pakistan Iran Airbase Controversy: क्या पाकिस्तान सच में ईरानी सैन्य विमानों को छिपा रहा है? 1971 के युद्ध से जुड़ा 55 साल पुराना रिश्ता अचानक फिर सुर्खियों में है। अमेरिका, चीन और ईरान के बीच फंसे पाकिस्तान की यह रणनीति पूरी दुनिया की नजरों में आ गई है। जानिए आखिर क्यों उठ रहे हैं इतने बड़े सवाल और क्या है इस पूरे विवाद का असली सच।

अमेरिका से तनाव के बीच पाकिस्तान पर ईरान की मदद का आरोप, 55 साल पुराने रिश्ते फिर चर्चा में

अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के बीच पाकिस्तान एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में आ गया है। पाकिस्तान पर आरोप लग रहे हैं कि उसने ईरानी सैन्य विमानों को अपने नूर खान एयरबेस पर शरण दी है। हालांकि पाकिस्तान ने इन आरोपों को पूरी तरह खारिज किया है, लेकिन इस पूरे विवाद ने 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध की पुरानी यादें ताजा कर दी हैं।

1971 में ईरान ने की थी पाकिस्तान की मदद

1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान ईरान के शाह मोहम्मद रजा पहलवी पाकिस्तान के मजबूत सहयोगी थे। उस समय ईरान ने पाकिस्तान को हेलीकॉप्टर, ईंधन, हथियार और स्पेयर पार्ट्स उपलब्ध कराए थे। इतना ही नहीं, कुछ पाकिस्तानी विमानों को ईरानी एयरबेस पर शरण भी दी गई थी।

उस दौर में अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन की सरकार भी पाकिस्तान के समर्थन में थी। अमेरिका और चीन दोनों नहीं चाहते थे कि पाकिस्तान टूटे। ईरान और पाकिस्तान उस समय CENTO जैसे एंटी-सोवियत गठबंधन का हिस्सा थे, इसलिए दोनों देशों के रिश्ते बेहद करीबी माने जाते थे।

Pakistan Iran Airbase Controversy: अब पाकिस्तान पर ईरान की मदद का आरोप

हाल ही में आई रिपोर्ट्स में दावा किया गया कि पाकिस्तान के नूर खान एयरबेस पर ईरानी सैन्य विमान मौजूद हैं। कहा जा रहा है कि अमेरिका के बढ़ते सैन्य दबाव के बीच ईरान अपने एयरक्राफ्ट को सुरक्षित स्थानों पर भेज रहा है।

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हालांकि पाकिस्तानी अधिकारियों ने इन आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि नूर खान एयरबेस शहर के बीच स्थित है और वहां बड़ी संख्या में विमान छिपाना संभव नहीं है।

पाकिस्तान की मुश्किल कूटनीति

आज की जियो-पॉलिटिक्स 1971 से काफी अलग है। ईरान जहां अमेरिका का बड़ा विरोधी बन चुका है, वहीं पाकिस्तान चीन का सबसे करीबी रणनीतिक साझेदार माना जाता है। चीन खुलकर पाकिस्तान की तारीफ कर चुका है कि वह अमेरिका और ईरान के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभाने की कोशिश कर रहा है।

दिलचस्प बात यह है कि पाकिस्तान अपने अधिकांश आधुनिक हथियार चीन से खरीद रहा है, लेकिन साथ ही वह अमेरिका के साथ पुराने सैन्य और खुफिया रिश्तों को भी सुधारना चाहता है। यही वजह है कि पाकिस्तान की विदेश नीति लगातार संतुलन साधने की कोशिश करती दिखाई देती है।

Pakistan Iran Airbase Controversy: अमेरिका में पाकिस्तान पर भरोसा कम

अमेरिका में पाकिस्तान की विश्वसनीयता को लेकर पहले से ही सवाल उठते रहे हैं। ओसामा बिन लादेन का पाकिस्तान में मिलना आज भी अमेरिका-पाक रिश्तों पर बड़ा दाग माना जाता है। कई अमेरिकी नेता और सुरक्षा एजेंसियां पाकिस्तान की खुफिया एजेंसियों पर आतंकवादी संगठनों से संबंध रखने के आरोप लगाती रही हैं।

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अब ईरानी विमानों को शरण देने के आरोपों ने एक बार फिर पाकिस्तान को अमेरिकी राजनीति में विवाद के केंद्र में ला दिया है। अमेरिकी नेताओं ने चेतावनी दी है कि अगर ये आरोप सही साबित हुए तो पाकिस्तान की मध्यस्थ भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े हो सकते हैं।

Pakistan Iran Airbase Controversy: क्या पाकिस्तान चुका रहा है पुराना एहसान?

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इन आरोपों में सच्चाई है तो यह 1971 में ईरान द्वारा पाकिस्तान की मदद के बदले एहसान चुकाने जैसी स्थिति हो सकती है। हालांकि आधिकारिक तौर पर इसकी पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन इस विवाद ने साफ कर दिया है कि दक्षिण एशिया और मध्य-पूर्व की राजनीति कितनी जटिल हो चुकी है।

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