‘आनंद के बेटों को सियासत में नो-एंट्री!’ मायावती का ऐतिहासिक फैसला, अब भतीजी दीपिका संभालेंगी बसपा की बागडोर?

लखनऊ। बहुजन समाज पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती ने पार्टी संगठन और चुनावी रणनीति में बड़े पीढ़ीगत बदलाव के स्पष्ट संकेत दिए हैं। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर सिलसिलेवार पोस्ट साझा करते हुए बसपा सुप्रीमो ने कड़ा और ऐतिहासिक ऐलान किया कि उनके भाई आनंद कुमार के दोनों बेटों को संगठन या चुनावी राजनीति में कोई भी छोटा-बड़ा पद नहीं दिया जाएगा। उन्होंने दो टूक कहा कि बहुजन आंदोलन को ‘परिवारवाद’ के साये से मुक्त रखना उनकी सर्वोच्च प्राथमिकता है।

इसके साथ ही उन्होंने साफ किया कि संगठन में 50 फीसदी तक युवाओं को भागीदारी दी जा रही है और आगामी उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड तथा पंजाब विधानसभा चुनावों में युवा महिला और पुरुष चेहरों को प्रमुखता दी जाएगी।

आनंद कुमार के बेटों पर रोक, भतीजी दीपिका के लिए विकल्प खुला

मायावती ने अपनी पोस्ट में परिवार से जुड़े सियासी फैसलों पर विस्तार से स्थिति स्पष्ट की। उन्होंने बताया कि स्वयं अविवाहित होने और व्यक्तिगत सुरक्षा की अनिवार्य जरूरतों के कारण उन्होंने अपने छोटे भाई आनंद कुमार को हमेशा साथ रखा, जो लंबे समय से पार्टी की देखरेख में जिम्मेदारियां निभा रहे हैं।

हालांकि, अगली पीढ़ी के संदर्भ में उन्होंने दो टूक व्यवस्था दी:

बेटों की नो-एंट्री: आनंद कुमार के दोनों बेटों या भविष्य में उनके बच्चों को बसपा में किसी भी राजनीतिक या संगठनात्मक पद पर कार्य करने का मौका नहीं दिया जाएगा।

दीपिका आनंद को अवसर: यदि भविष्य में आनंद कुमार को संगठनात्मक कार्यों में सहयोग की आवश्यकता होती है, तो उनकी सुपुत्री कुमारी दीपिका आनंद मदद कर सकती हैं।

वकालत की पढ़ाई और योग्यता: दीपिका आनंद वर्तमान में वकालत (Law) की पढ़ाई कर रही हैं। मायावती ने कहा कि ईमानदारी, निष्ठा और कार्यक्षमता के कड़े मूल्यांकन के बाद ही उन्हें पार्टी में कोई जिम्मेदारी देने पर विचार होगा।

मिशनरी विकल्प: यदि दीपिका जिम्मेदारी संभालने को तैयार नहीं होती हैं, तो पार्टी की सहमति से दलित समाज के किसी निष्ठावान और समर्पित ‘मिशनरी कार्यकर्ता’ को यह दायित्व सौंपा जाएगा।

‘कांशीराम की विरासत और अंबेडकरवादी मूल्यों से समझौता नहीं’

मायावती ने कहा कि वे मान्यवर कांशीराम के आदर्शों पर चलते हुए परिवारवाद के खिलाफ पूरी मजबूती से अडिग हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि वे अपने भाई-बहनों और उनके परिवारों को हमेशा सांसद, विधायक, मंत्री या दूसरे चुनावी पदों से दूर रखती रही हैं ताकि बहुजन समाज के आम लोग और कार्यकर्ता आंदोलन के साथ अपनत्व महसूस कर सकें।

Gen-Z और Gen-Alpha को जोड़ने की नई रणनीति

बदलते राजनीतिक परिदृश्य का उल्लेख करते हुए मायावती ने कहा कि आज की युवा पीढ़ी विशेष रूप से Gen-Z और Gen-Alpha की सोच और बुनियादी जरूरतों को ध्यान में रखकर पार्टी कैडर को पुनर्गठित किया जा रहा है।

उन्होंने बताया कि संगठन में युवाओं को 50% तक भागीदारी देने की नीति पर लंबे समय से काम जारी है। आने वाले विधानसभा चुनावों में बसपा संविधान और अंबेडकरवादी राजनीति को मजबूती देने के लिए नई ऊर्जा वाले शिक्षित, युवा चेहरों को ही चुनावी मैदान में उतारेगी।

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