संसद में 3 बड़े बिल पेश, क्या 2029 से महिलाओं की राजनीति में आएगा बड़ा बदलाव?

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महिला आरक्षण बिल 2026: 2029 से 33% आरक्षण लागू करने का प्रस्ताव

Lok Sabha में महिला आरक्षण से जुड़े संवैधानिक संशोधनों पर आज संसद में जोरदार बहस की शुरुआत हो गई है। केंद्र सरकार ने इस मुद्दे पर तीन अहम विधेयक पेश किए हैं, जिनमें Lok Sabha और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं को 33% आरक्षण देने का प्रस्ताव रखा गया है। इस विषय पर चर्चा के लिए संसद का तीन दिवसीय विशेष सत्र बुलाया गया है, जिसका आज पहला दिन है।

सरकार का लक्ष्य है कि वर्ष 2029 से यह आरक्षण लागू हो जाए, जिससे देश की राजनीति में महिलाओं की भागीदारी को मजबूती मिले। हालांकि, इस प्रस्ताव को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तीखी बहस देखने को मिल रही है।

संसद में क्या है प्रस्ताव?

सरकार द्वारा पेश किए गए संशोधन बिल में Lok Sabha की सीटों की संख्या बढ़ाने का भी प्रावधान शामिल है। वर्तमान में लोकसभा में 543 सदस्य हैं, जिसे बढ़ाकर 850 करने का प्रस्ताव रखा गया है। इसमें से 815 सीटें राज्यों के लिए और 35 सीटें केंद्र शासित प्रदेशों के लिए निर्धारित की जाएंगी।

इसके साथ ही कुल सीटों में से 273 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित करने का प्रस्ताव है। इस पूरी प्रक्रिया को लागू करने के लिए परिसीमन (Delimitation) भी कराया जाएगा, जिससे निर्वाचन क्षेत्रों की नई सीमाएं तय की जा सकें।

2023 के कानून में क्या थी बाधा?

केंद्र सरकार ने वर्ष 2023 में ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ पारित किया था। यह विधेयक Lok Sabha और Rajya Sabha दोनों सदनों से पास होकर राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद कानून बन गया था। लेकिन उस समय एक बड़ी शर्त यह थी कि इस कानून को लागू करने से पहले 2027 की जनगणना और उसके बाद परिसीमन कराना अनिवार्य होगा। इस प्रक्रिया में समय लगने के कारण महिला आरक्षण लागू होने में 2034 तक की देरी की संभावना जताई जा रही थी।

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अब क्या बदलाव किया जा रहा है?

सरकार ने अब इस देरी को खत्म करने के लिए बड़ा फैसला लिया है। नए संशोधन के तहत 2011 की जनगणना के आंकड़ों के आधार पर ही परिसीमन कराने का प्रस्ताव रखा गया है।इस बदलाव से यह सुनिश्चित किया जाएगा कि महिला आरक्षण को जल्द से जल्द लागू किया जा सके और 2029 के आम चुनाव से ही महिलाएं इसका लाभ उठा सकें।

किन चुनावों में लागू होगा आरक्षण?

यदि ये संशोधन पारित हो जाते हैं, तो 2029 के Lok Sabha चुनाव के साथ-साथ ओडिशा, आंध्र प्रदेश, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश की विधानसभा चुनावों में भी महिलाओं को 33% आरक्षण मिलेगा। यह कदम देश की राजनीति में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने की दिशा में एक ऐतिहासिक बदलाव माना जा रहा है।

संसद में बहस और राजनीतिक तकरार

इस मुद्दे पर Lok Sabha के अंदर तीखी बहस देखने को मिल रही है। समाजवादी पार्टी के सांसद धर्मेंद्र यादव ने सरकार पर संविधान के खिलाफ काम करने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि जब तक मुस्लिम महिलाओं को अलग से आरक्षण नहीं दिया जाएगा, तब तक यह कानून अधूरा रहेगा। इस पर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने स्पष्ट रूप से कहा कि धर्म के आधार पर आरक्षण देना संविधान के खिलाफ है और ऐसा संभव नहीं है।

सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने भी इस मुद्दे को उठाते हुए कहा कि देश की आधी आबादी को आरक्षण मिलना चाहिए, लेकिन मुस्लिम महिलाओं के लिए क्या प्रावधान है, यह स्पष्ट होना चाहिए। इसके जवाब में अमित शाह ने कहा कि अगर समाजवादी पार्टी चाहे तो अपने टिकट मुस्लिम महिलाओं को दे सकती है, सरकार को इससे कोई आपत्ति नहीं है।

विपक्ष का रुख

इस विधेयक को लेकर Lok Sabha में विपक्षी दलों ने भी अपनी रणनीति साफ कर दी है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने विपक्षी नेताओं के साथ बैठक के बाद कहा कि उनकी पार्टी महिला आरक्षण के खिलाफ नहीं है, लेकिन लोकसभा सीटों की संख्या बढ़ाने का विरोध करती है।उन्होंने संकेत दिया कि पूरा विपक्ष संसद में इस प्रस्ताव के खिलाफ मतदान कर सकता है। इस बैठक में राहुल गांधी के साथ-साथ तृणमूल कांग्रेस, राष्ट्रीय जनता दल, शिवसेना (यूबीटी), एनसीपी (शरद गुट) और आम आदमी पार्टी के नेता भी शामिल हुए।

कितनी देर होगी चर्चा?

Lok Sabha में इन विधेयकों पर चर्चा के लिए कुल 18 घंटे का समय तय किया गया है, जबकि राज्यसभा में 10 घंटे बहस होगी। माना जा रहा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी इस मुद्दे पर चर्चा के दौरान अपनी बात रख सकते हैं।

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