तीन भारतीय नाविकों की मौत के बाद उबाल… कब तक चुप रहेगा भारत?

होर्मुज स्ट्रेट में अमेरिकी अत्याचार: भारतीय नाविकों की हत्या और मोदी सरकार की कायरतापूर्ण चुप्पी

 

वाणिज्यिक जहाजों पर घातक हमले, ईरानी तेल की बहानेबाजी और भारत-अमेरिका संबंधों की पोल खुली*

 

होर्मुज स्ट्रेट और ओमान की खाड़ी, विश्व की ऊर्जा आपूर्ति की रीढ़ माने जाने वाले इस समुद्री मार्ग पर अमेरिका ने एकतरफा नाकेबंदी थोप दी है। इस नाकेबंदी के नाम पर अमेरिकी नौसेना की बर्बर कार्रवाइयों में तीन भारतीय नाविकों की मौत हो गई है। यह घटना मात्र एक दुर्घटना नहीं, बल्कि अमेरिकी साम्राज्यवाद की क्रूरता भरी तस्वीर है, जो अंतरराष्ट्रीय जलमार्गों को अपना निजी साम्राज्य समझता है। दुर्भाग्य से, मोदी सरकार की अमेरिका-परस्त नीति इस हत्याकांड के खिलाफ भी केवल कागजी विरोध तक सीमित रही है, जिससे भारतीय नागरिकों की जान की कीमत सस्ती साबित हो रही है।

 

क्या हुआ था?

हाल के दिनों में ओमान तट के पास तीन भारतीय नाविकों वाले वाणिज्यिक जहाजों पर अमेरिकी हमले हुए। एक हमले में तीन भारतीय नाविक मारे गए। अमेरिका का दावा है कि ये जहाज ईरानी तेल ले जा रहे थे और नाकेबंदी का उल्लंघन कर रहे थे। लेकिन सवाल यह है कि क्या वाणिज्यिक जहाजों पर बिना चेतावनी के घातक हमला करना अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुरूप है? अमेरिकी बलों ने प्रेसिजन मुनिशन्स का इस्तेमाल किया, जिससे स्पष्ट है कि वे जानबूझकर लक्ष्य भेद रहे थे।

 

अमेरिकी विदेश विभाग की प्रवक्ता टॉमी पिगोट ने साफ कहा कि सभी जहाजों को अमेरिकी आदेशों का पालन करना चाहिए, वरना नाकेबंदी का उल्लंघन बर्दाश्त नहीं होगा। मार्को रूबियो ने जयशंकर से बातचीत में भी यही सख्ती दिखाई। यह अमेरिका का दोहरा मापदंड है जब इजराइल या यूक्रेन की बात आती है तो वे अंतरराष्ट्रीय नियमों की दुहाई देते हैं, लेकिन खुद होर्मुज में समुद्री डाकू बन जाते हैं। ट्रंप प्रशासन ने अप्रैल 2026 से नाकेबंदी लगाई है, जो ईरान पर आर्थिक दबाव का हिस्सा है, लेकिन इसका खामियाजा तीसरे देशों के नाविक भुगत रहे हैं।

 

भारतीय नाविक दुनिया भर में मर्चेंट नेवी में बड़ी संख्या में काम करते हैं। ये गरीब परिवारों के आश्रित हैं। उनकी मौत न केवल व्यक्तिगत त्रासदी है, बल्कि राष्ट्रीय अपमान भी। क्या अमेरिका को भारतीय जानों की कोई कीमत नहीं? क्या भारतीय पासपोर्ट अब अमेरिकी बमों के नीचे सस्ता हो गया है?

 

जयशंकर-रूबियो बातचीत

शुक्रवार को विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने मार्को रूबियो से फोन पर बात की और “कड़ा विरोध” दर्ज कराया। जयशंकर ने एक्स पर लिखा कि वाणिज्यिक जहाजों के खिलाफ घातक कार्रवाई उचित नहीं। लेकिन अमेरिकी बयान में कोई माफी, कोई मुआवजा या जवाबदेही का जिक्र नहीं। उल्टा, रूबियो ने नाकेबंदी की पुष्टि की।

 

भारत ने पिछले दिनों अमेरिकी दूतावास को दो बार तलब किया, लेकिन ये कदम कितने प्रभावी? जब अमेरिका जैसे देश पर दबाव बनाने की बात आती है तो मोदी सरकार हमेशा “रणनीतिक साझेदारी” का राग अलापती है। ईरान से सस्ता तेल खरीदने वाले भारत को ही अब अमेरिकी नाकेबंदी का शिकार होना पड़ रहा है। यह सरकार की विदेश नीति की नाकामी है न ईरान के साथ मजबूत संबंध, न अमेरिका से भारतीय हितों की रक्षा।

 

अमेरिकी दबाव में भारत?

होर्मुज स्ट्रेट से विश्व का 20-30% तेल गुजरता है। अमेरिका इसे नियंत्रित करके वैश्विक ऊर्जा बाजार पर दबदबा बनाना चाहता है। ईरान के साथ तनाव में वह तीसरे देशों के जहाजों को भी निशाना बना रहा है। भारतीय जहाजों को बार-बार टारगेट करने के पीछे शायद भारत की ईरान नीति का बदला है। अमेरिका स्पष्ट संदेश दे रहा है कि उसके नियमों के बाहर कोई स्वतंत्रता नहीं।

 

भारत की स्थिति दयनीय है। लाखों भारतीय नाविक समुद्र पर निर्भर हैं। उनकी सुरक्षा के लिए कोई ठोस कदम? कोई काफिला सुरक्षा व्यवस्था? कोई वैकल्पिक मार्ग? कुछ नहीं। विपक्षी दलों ने सरकार पर सवाल उठाए हैं, लेकिन मोदी कैबिनेट “कूटनीतिक प्रयास” कहकर मामले को ठंडा करने की कोशिश कर रही है। यह ठीक वैसा ही है जैसे गलवान में चीनी आक्रमण के बाद “कोई घुसपैठ नहीं” वाला बयान।

 

रणनीतिक रूप से, यह घटना भारत को सिखाती है कि अमेरिका के साथ “क्वाड” या “आई2यू2” जैसे गठबंधन भारतीय हितों की रक्षा नहीं करते। जब बात आर्थिक या सैन्य हितों की हो तो वाशिंगटन अपना स्वार्थ पहले देखता है। भारत को बहुपक्षीय कूटनीति मजबूत करनी चाहिए रूस, चीन, ईरान और अरब देशों के साथ संतुलित संबंध। केवल अमेरिका-केंद्रित नीति से नुकसान ही होगा।

 

यह तनाव केवल द्विपक्षीय नहीं। बढ़ता सैन्य अभियान वैश्विक तेल कीमतों को बढ़ाएगा, भारत जैसे आयातक देशों को महंगाई का झटका देगा। भारतीय अर्थव्यवस्था पहले से दबाव में है; अतिरिक्त ऊर्जा संकट इसे और बिगाड़ सकता है।

 

अमेरिका की कार्रवाई “क्षेत्रीय सुरक्षा” का नाम देकर की जा रही है, लेकिन वास्तव में यह युद्ध की ओर ले जा रही है। यदि ऐसे हमले जारी रहे तो अन्य देश भी प्रभावित होंगे। भारत को संयुक्त राष्ट्र या IMO (International Maritime Organization) में मजबूत आवाज उठानी चाहिए, न कि सिर्फ बयानबाजी।

 

जवाबदेही की मांग

तीन भारतीय नाविकों की मौत पर अमेरिका को माफी मांगनी चाहिए, मुआवजा देना चाहिए और भविष्य में ऐसी घटनाओं से बचना चाहिए। मोदी सरकार को भी भारतीय हितों की रक्षा के लिए सख्त कदम उठाने चाहिए न कि केवल फोन कॉल और ट्वीट तक सीमित रहना चाहिए।

 

यह घटना भारत की विदेश नीति की असफलता और अमेरिकी एकाधिकारवाद दोनों को उजागर करती है। जब तक भारत अपनी स्वतंत्रता और नागरिकों की सुरक्षा को प्राथमिकता नहीं देगा, ऐसे अपमान और हत्याएं जारी रहेंगी। होर्मुज की लहरें अब केवल तेल नहीं, बल्कि कूटनीतिक और नैतिक सवाल भी उठा रही हैं।

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