UNSC में भारत की दो टूक: वीटो के बिना स्थायी सीट मंजूर नहीं, सभी सदस्यों के लिए समान अधिकारों की मांग

न्यूयॉर्क। संयुक्त राष्ट्र महासभा की बैठक में भारत ने सुरक्षा परिषद (UNSC) के विस्तार और वीटो पावर के मुद्दे पर सख्त रुख अपनाते हुए स्पष्ट संदेश दिया है। भारत ने दो टूक शब्दों में कहा है कि बिना वीटो अधिकार के सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता ‘दोयम दर्जे’ की व्यवस्था होगी, जिसे कतई स्वीकार नहीं किया जा सकता। वैश्विक मंच से कड़ा रुख अपनाते हुए भारत ने स्पष्ट किया कि वर्तमान विश्व 1945 की व्यवस्था और सोच के ढर्रे पर नहीं चल सकता, इसलिए सुरक्षा परिषद में आज की भू-राजनीतिक वास्तविकताओं के अनुसार तुरंत व्यापक बदलाव किए जाने चाहिए।

वीटो जिम्मेदारी है, संकीर्ण स्वार्थ साधने का जरिया नहीं

संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि पर्वतनेनी हरीश ने यूएनजीए प्लेनरी में वीटो के इस्तेमाल पर भारतीय का रुख रखा। उन्होंने कहा कि वीटो एक वैश्विक जिम्मेदारी है, न कि अपने संकीर्ण राजनीतिक हितों को साधने का कोई साधन। सुरक्षा परिषद के पांच स्थायी सदस्य की भूमिका पर सवाल उठाते हुए उन्होंने रेखांकित किया कि इन पांच में से दो देशों ने पिछले साढ़े तीन दशकों से अधिक समय से वीटो का इस्तेमाल नहीं किया है, जबकि अधिकांश वीटो या वीटो लगाने की धमकियां शेष तीन देशों की तरफ से आई हैं। उन्होंने कहा कि सुधारों को टुकड़ों में बांटने से काम नहीं चलेगा, बल्कि सुरक्षा परिषद से जुड़े सभी पांचों प्रमुख पहलुओं पर एक साथ ठोस कदम उठाने होंगे।

छिपे हुए वीटो और अघोषित नियमों पर तीखा प्रहार

भारत ने सुरक्षा परिषद की आंतरिक कार्यप्रणाली और प्रतिबंध समितियों में जारी भेदभावपूर्ण रवैये पर भी खुलकर बात की। उन्होंने कहा कि आम सहमति के अलिखित नियम एक तरह से अघोषित वीटो की स्थिति पैदा कर देते हैं। अंतर-सरकारी वार्ताओं  की प्रक्रिया में इस तरह की तथाकथित आम सहमति का दुरुपयोग छिपे हुए वीटो के रूप में नहीं होना चाहिए। वर्ष 2022 की वीटो पहल को भले ही बदलाव की शुरुआत माना गया था, लेकिन उसके बाद लगातार इस्तेमाल किए गए वीटो का रिकॉर्ड यह स्पष्ट करता है कि प्रणालीगत समस्याएं जस की तस बनी हुई हैं।

अफ्रीकी देशों के रुख का समर्थन और समान अधिकारों की मांग

भारत ने इस दौरान अफ्रीकी देशों के साझा रुख यानी ‘कॉमन अफ्रीकन पोजीशन’ का पुरजोर समर्थन किया। पर्वतनेनी हरीश ने कहा कि जब तक सुरक्षा परिषद में वीटो की व्यवस्था अस्तित्व में है, तब तक परिषद के सभी स्थायी सदस्यों को एक समान अधिकार मिलने चाहिए। बिना वीटो के नई दीर्घकालिक सीटें बनाने से सदस्यों के बीच असमानता ही बढ़ेगी और नए सदस्यों को दोयम दर्जे का बना दिया जाएगा। उन्होंने जोर देकर कहा कि चाहे सदस्य पुराने हों या नए, अधिकारों में कोई भेदभाव नहीं होना चाहिए। इसके लिए स्पष्ट समय-सीमा तय कर दस्तावेज आधारित वार्ता तत्काल शुरू की जानी चाहिए ताकि यूएनएससी 1945 के पुराने ढांचे की जगह 21वीं सदी की वास्तविकताओं को प्रतिबिंबित कर सके।

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