महंगी हुई प्राकृतिक गैस: आयात बिल 23% उछला, क्या अब बढ़ जाएंगे सीएनजी और रसोई गैस के दाम?

नई दिल्ली। पश्चिम एशिया में गहराते युद्ध संकट का सीधा असर अब भारत के ऊर्जा बिल पर दिखने लगा है, जिसका नुकसान सीधे तौर पर आम उपभोक्ता की जेब पर पड़ सकता है। वैश्विक बाजार में ऊर्जा की कीमतों में आए तेज उछाल के चलते चालू वित्त वर्ष की पहली छमाही यानी अप्रैल से सितंबर के दौरान भारत का प्राकृतिक गैस आयात बिल 23 प्रतिशत बढ़कर 8.5 अरब डॉलर तक पहुंच गया है, जो बीते वित्त वर्ष की इसी अवधि में 6.9 अरब डॉलर था। पेट्रोलियम योजना के इन आंकड़ों ने साफ संकेत दे दिया है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गैस की ऊंची कीमतें घरेलू स्तर पर महंगाई का दबाव बढ़ा सकती हैं।
आम जनता पर क्या होगा असर: सीएनजी और पाइप वाली रसोई गैस पर दबाव
प्राकृतिक गैस आयात के इस बढ़े हुए खर्च से आम नागरिकों को किसी तरह का फायदा मिलने के बजाय सीधे नुकसान के संकेत हैं। शहरों में चलने वाले वाहनों के लिए सीएनजी और घरों में खाना पकाने के लिए इस्तेमाल होने वाली पाइप वाली प्राकृतिक गैस की लागत मुख्य रूप से आयातित और घरेलू गैस के मिश्रण पर निर्भर करती है। जब तेल विपणन कंपनियों को विदेश से ऊंची कीमतों पर एलएनजी खरीदनी पड़ेगी, तो उसकी भरपाई के लिए आने वाले समय में सीएनजी और पीएनजी की खुदरा दरों में बढ़ोतरी की जा सकती है। इससे न केवल निजी वाहन चालकों का महीने का बजट बिगड़ेगा, बल्कि सार्वजनिक परिवहन और माल ढुलाई महंगी होने से दैनिक उपभोग की चीजें भी महंगी हो सकती हैं।
घरेलू गैस उत्पादन में गिरावट ने बढ़ाई निर्भरता
आम जनता के लिए चिंता का दूसरा बड़ा कारण देश के भीतर प्राकृतिक गैस का उत्पादन घटना है। पहली छमाही के दौरान घरेलू गैस उत्पादन 4.4 प्रतिशत घटकर 16,804 एमएमएससीएम रह गया, जो पिछले साल समान अवधि में 17,585 एमएमएससीएम था। ओएनजीसी और ऑयल इंडिया के पुराने कुओं से उत्पादन घटने के चलते देश की आयात पर निर्भरता 50.1 प्रतिशत से बढ़कर 52.3 प्रतिशत हो गई है। इसका सीधा मतलब यह है कि देश अपनी आधी से ज्यादा गैस जरूरतों के लिए विदेशी बाजारों पर निर्भर है, जिससे अंतरराष्ट्रीय उतार-चढ़ाव का सीधा झटका घरेलू उपभोक्ताओं तक पहुंचना लगभग तय हो जाता है।
समुद्री रास्तों पर रुकावट से बढ़ा परिवहन का खर्च
वैश्विक मोर्चे पर यमन के हूती विद्रोहियों के हमलों के बाद लाल सागर और होर्मुज स्ट्रेट में मालवाहक जहाजों की आवाजाही जोखिम भरी हो गई है। खाड़ी देशों से आने वाली खेप प्रभावित होने के कारण भारतीय तेल कंपनियों को सुदूर अमेरिका से अधिक एलएनजी खरीदनी पड़ रही है। लंबी समुद्री दूरी तय करने की वजह से जहाजों का भाड़ा और बीमा खर्च काफी बढ़ गया है। यह अतिरिक्त लॉजिस्टिक्स लागत भी गैस कंपनियों के बहीखाते पर भारी पड़ रही है, जिसका बोझ खुदरा कीमतों के जरिए आम जनता पर ही पड़ने का अंदेशा है।
