डोंगरगढ़ में मां बम्लेश्वरी मंदिर विवाद गहराया, 15 नवंबर को प्रदेशव्यापी आंदोलन का ऐलान

डोंगरगढ़। नवरात्रि पर्व की पंचमी पूजा से शुरू हुआ मां बम्लेश्वरी मंदिर विवाद अब सामाजिक, धार्मिक और राजनीतिक रूप ले चुका है। खैरागढ़ राजपरिवार के वंशज राजकुमार भवानी बहादुर सिंह जहां अपने परिवार की सुरक्षा और परंपरागत अधिकार की मांग कर रहे हैं, वहीं सर्व छत्तीसगढ़ आदिवासी समाज ने मंदिर ट्रस्ट के खिलाफ 15 नवंबर से प्रदेशव्यापी आंदोलन का ऐलान किया है।

विवाद की शुरुआत नवरात्रि के दौरान हुई, जब राजकुमार भवानी बहादुर सिंह ने पारिवारिक परंपरा के अनुसार पंचमी पूजा की। इस पूजा का विरोध करते हुए मंदिर ट्रस्ट समिति ने पुलिस को शिकायत दी और आरोप लगाया कि यह पूजा बलि प्रथा से जुड़ी है। इसके जवाब में राजकुमार ने कहा कि पूजा के दौरान किसी पशु की बलि नहीं दी गई और उनके परिवार की छवि को झूठे आरोपों से नुकसान पहुँचाया जा रहा है।

राजकुमार भवानी बहादुर सिंह ने पुलिस प्रशासन को पत्र लिखकर परिवार की सुरक्षा की मांग की, साथ ही बताया कि उनके दादा स्वर्गीय राजा वीरेंद्र बहादुर सिंह ने ही खैरागढ़ रियासत काल में मां बम्लेश्वरी देवी मंदिर (ऊपर और नीचे दोनों) का निर्माण कराया था और स्वयं को मंदिर ट्रस्ट का आजीवन संरक्षक नियुक्त किया था। राजकुमार का आरोप है कि दादा की मृत्यु के बाद ट्रस्ट ने वंशजों को संरक्षक का दर्जा नहीं दिया, जिससे परिवार की परंपरा और अधिकारों की अनदेखी हुई।

उधर, राजनांदगांव में सर्व छत्तीसगढ़ आदिवासी समाज की प्रदेश स्तरीय आदिवासी महापंचायत में इस मुद्दे पर बड़ा निर्णय लिया गया। समाज का कहना है कि मां बम्लेश्वरी देवी (बम्लाई दाई) आदिकाल से गोंड़ आदिवासी समाज की आराध्य देवी रही हैं। पहले यहां बैगा पुजारी परंपरा से पूजा होती थी, लेकिन ट्रस्ट बनने के बाद से आदिवासी समाज को मंदिर सेवा और पूजा से अलग कर दिया गया।

महापंचायत में कहा गया कि पंचमी पूजा के दौरान आदिवासी समाज को पारंपरिक पूजा करने से रोका गया और बाद में धर्मविरोधी बताकर बदनाम किया गया। समाज ने इसे अपनी आस्था और परंपरा पर सीधा अपमान बताया और शासन से मांग की कि —

  • मां बम्लेश्वरी मंदिर ट्रस्ट को भंग किया जाए,
  • दोषियों पर एट्रोसिटी एक्ट के तहत कार्रवाई हो,
  • और मंदिर स्थल आदिवासी समाज को सौंपा जाए।

महापंचायत ने ऐलान किया कि समाज 15 नवंबर को प्रदेशभर में महाबंद और जन-जागृति अभियान चलाएगा। वहीं प्रशासन का कहना है कि दोनों पक्षों से संवाद के जरिए विवाद सुलझाने की कोशिश की जा रही है, हालांकि अब तक कोई ठोस नतीजा सामने नहीं आया है।

आस्था, परंपरा और अधिकार की इस खींचतान में डोंगरगढ़ का मां बम्लेश्वरी मंदिर जो कभी एकता और श्रद्धा का प्रतीक था अब एक संवेदनशील सामाजिक विवाद के केंद्र में आ गया है।

 

Youthwings