प्राइवेट स्कूलों की मनमानी: फ्री किताबों के बावजूद महंगे सेट बेचने का आरोप, जांच के लिए बनी तीन सदस्यीय टीम
अंबिकापुर में निजी स्कूलों द्वारा अभिभावकों पर महंगी किताबें खरीदने का दबाव बनाने के आरोपों ने तूल पकड़ लिया है। मामले की शिकायत मिलने के बाद कलेक्टर के निर्देश पर जिला शिक्षा अधिकारी (DEO) ने तीन सदस्यीय जांच समिति का गठन किया है। समिति को पूरे मामले की जांच कर तीन दिनों के भीतर अपनी रिपोर्ट सौंपने के निर्देश दिए गए हैं।
सरकारी किताबें मिलने के बावजूद निजी प्रकाशकों की किताबें पढ़ाने का आरोप
शिकायत में कहा गया है कि छत्तीसगढ़ बोर्ड के अंग्रेजी माध्यम स्कूलों के विद्यार्थियों को कक्षा पहली से दसवीं तक सरकार की ओर से मुफ्त पाठ्यपुस्तकें उपलब्ध कराई जाती हैं। इसके बावजूद कई निजी स्कूल छात्रों को निजी प्रकाशकों की महंगी किताबें खरीदने के लिए बाध्य कर रहे हैं। आरोप है कि पहली कक्षा की किताबों का सेट करीब 2 हजार रुपये और पांचवीं कक्षा का सेट लगभग 5 हजार रुपये तक में बेचा जा रहा है।
चुनिंदा दुकानों से खरीदने का बनाया जाता है दबाव
शिकायत के अनुसार स्कूल प्रबंधन, निजी प्रकाशकों और कुछ निर्धारित पुस्तक विक्रेताओं के बीच मिलीभगत है। अभिभावकों को व्हाट्सएप के माध्यम से किताबों की सूची भेजकर केवल तय दुकानों से ही पुस्तकें खरीदने के लिए कहा जाता है। इससे अभिभावकों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ रहा है।
read more : कोटवारों का प्रदर्शन: 7 सूत्रीय मांगों को लेकर तहसील मुख्यालय पर दिया धरना
बच्चों के भविष्य की चिंता में सामने नहीं आ रहे अभिभावक
शिकायतकर्ता का कहना है कि कई अभिभावक इस व्यवस्था से परेशान हैं, लेकिन वे खुलकर शिकायत करने से बचते हैं। उन्हें आशंका रहती है कि विरोध करने पर उनके बच्चों को स्कूल में परेशानी का सामना करना पड़ सकता है। इसी वजह से अधिकांश परिवार मजबूरी में महंगी किताबें खरीद रहे हैं।
तीन दिन में रिपोर्ट सौंपेगी जांच समिति
जिला शिक्षा अधिकारी द्वारा गठित जांच दल में तीन अधिकारियों को शामिल किया गया है, जिन्हें पूरे मामले की पड़ताल कर तीन दिनों के भीतर रिपोर्ट प्रस्तुत करनी होगी। जांच के आधार पर आगे की कार्रवाई तय की जाएगी।
पहले भी उठ चुका है निजी किताबों का मुद्दा
यह पहली बार नहीं है जब निजी स्कूलों में महंगी किताबों का मामला सामने आया हो। इससे पहले भी कुछ स्कूलों के खिलाफ निजी प्रकाशकों की किताबें अनिवार्य करने की शिकायतें मिली थीं। उस समय शिक्षा विभाग ने संबंधित स्कूलों को नोटिस जारी किए थे। वहीं कुछ स्कूलों का तर्क था कि बोर्ड की किताबें समय पर और पर्याप्त संख्या में उपलब्ध नहीं हो पातीं, इसलिए वैकल्पिक रूप से निजी प्रकाशनों की पुस्तकें उपयोग में लानी पड़ती हैं।
