4 रियासतों के विलय से भोपाल के राजधानी बनने तक, पढ़ें नए राज्य की अनकही कहानी

भोपाल। देश का दिल कहा जाने वाला मध्य प्रदेश आज 1 नवंबर 2026 को अपना 71वां स्थापना दिवस मना रहा है। यह दिन केवल कैलेंडर की एक तारीख नहीं है, बल्कि उस लंबे, संघर्षपूर्ण और ऐतिहासिक राजनीतिक मंथन की याद दिलाता है, जिसके बाद इस विशाल भौगोलिक भूभाग का जन्म हुआ था। पिछले सात दशकों की यात्रा में इस राज्य ने भोपाल गैस त्रासदी जैसी भीषण मानवीय आपदाओं के घावों को भी सहा और अपनी सांस्कृतिक विरासत व दृढ़ इच्छाशक्ति के बल पर देश के अग्रणी और विकसित राज्यों की कतार में अपनी मजबूत जगह बनाई।
चार अलग-अलग हिस्सों को जोड़कर गढ़ा गया नया राज्य
26 जनवरी 1950 को जब देश का संविधान लागू हुआ, तब आज का मध्य प्रदेश चार अलग-अलग प्रशासनिक श्रेणियों (पार्ट ‘ए’, ‘बी’, ‘सी’ और रियासत) में बंटा हुआ था:
सेंट्रल प्रोविंस एंड बरार (पार्ट ‘ए’): इसकी राजधानी नागपुर हुआ करती थी और इसमें महाकौशल व छत्तीसगढ़ का इलाका शामिल था।
मध्य भारत (पार्ट ‘बी’): यह ग्वालियर और इंदौर की रियासतों को मिलाकर बना था, जहां छह महीने ग्वालियर (शीतकालीन) और छह महीने इंदौर (ग्रीष्मकालीन) राजधानी रहती थी।
विंध्य प्रदेश (पार्ट ‘सी’): बघेलखंड और बुंदेलखंड की रियासतों से मिलकर बने इस क्षेत्र की राजधानी रीवा थी।
भोपाल स्टेट: यह एक स्वतंत्र नवाब-शासित रियासत थी, जिसके अंतिम नवाब हमीदुल्लाह खान थे।
जब नक्शा देख नेहरू बोले- ‘यह कैसा अजूबा और बेढंगा प्रदेश है’
अक्टूबर 1953 में न्यायमूर्ति फजल अली की अध्यक्षता में राज्य पुनर्गठन आयोग बना, जिसमें के.एम. पणिक्कर और हृदयनाथ कुंजरू सदस्य थे। आयोग ने मराठी भाषी विदर्भ और नागपुर को बॉम्बे राज्य (महाराष्ट्र) में शामिल करने और बाकी हिंदी भाषी अंचलों को मिलाकर नया मध्य प्रदेश बनाने का खाका तैयार किया।
मध्यभारत के पहले मुख्यमंत्री लीलाधर जोशी के संस्मरणों के मुताबिक, जब इस नए प्रस्तावित राज्य का नक्शा पहली बार प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के सामने रखा गया, तो वे चौंक पड़े। उन्होंने कहा, ‘अरे! यह क्या अजूबा है? ऐसा लंबा-चौड़ा और बेढंगा प्रदेश कैसे बन सकता है?’
नेहरू के इस संशय को दूर करने के लिए मध्य प्रदेश के पैरोकार नेताओं ने प्रख्यात अर्थशास्त्री प्रो. वी.के.आर.वी. राव से संपर्क किया। प्रो. राव ने प्राकृतिक संसाधनों के आधार पर एक राष्ट्रीय अंग्रेजी दैनिक में ‘इकोनॉमिक वायबिलिटी ऑफ मध्यप्रदेश’ शीर्षक से प्रभावशाली लेख लिखा। इसके बाद दिल्ली में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस ने केंद्र सरकार को राज्य की आर्थिक आत्मनिर्भरता पर आश्वस्त कर दिया।
जबलपुर की जगह भोपाल कैसे बन गया राजधानी?
राज्य पुनर्गठन आयोग ने अपनी औपचारिक रिपोर्ट में संस्कारधानी जबलपुर को राजधानी बनाने की सिफारिश की थी। जबलपुर में तैयारियां भी शुरू हो गई थीं, जबकि ग्वालियर और इंदौर भी रेस में आगे थे। लेकिन अंतिम क्षणों में फैसला भोपाल के पक्ष में गया।
इसके पीछे ठोस रणनीतिक कारण थे। भोपाल के नवाब हमीदुल्लाह खान शुरुआत में भारत विलय के पक्ष में नहीं थे। जन आंदोलन और डॉ. शंकर दयाल शर्मा के नेतृत्व में चले संघर्ष के बाद जून 1949 में भोपाल का विलय हुआ था। सामरिक दृष्टि से नवाब की पूर्व रियासत पर सीधी प्रशासनिक निगरानी जरूरी मानी गई। इसके अलावा, भोपाल में सरकारी दफ्तरों के लिए ‘मिंटो हॉल’ जैसी भव्य और तैयार इमारतें मौजूद थीं। सरदार वल्लभभाई पटेल की दूरगामी सोच और मौलाना अबुल कलाम आजाद के समर्थन से भोपाल को राजधानी घोषित किया गया, जबकि जबलपुर को इसकी भरपाई के रूप में हाई कोर्ट सौंपा गया।
दीपावली की रात और अमावस्या का वह ऐतिहासिक शपथ ग्रहण
संसद में 11 सितंबर 1956 को राज्य पुनर्गठन विधेयक पारित होने के बाद 1 नवंबर 1956 को नया मध्य प्रदेश अस्तित्व में आया। 31 अक्टूबर 1956 की मध्यरात्रि भोपाल के मिंटो हॉल में पहली सरकार का शपथ ग्रहण समारोह हुआ।
उस रात संयोग से दीपावली और अमावस्या थी। जब किसी ने चुटकी लेते हुए कहा कि आज तो अमावस्या की रात है, तो पहले मुख्यमंत्री पंडित रविशंकर शुक्ल ने मुस्कुराते हुए ऐतिहासिक जवाब दिया ‘‘पर इस अंधेरे को मिटाने के लिए हजारों दीये तो जल रहे हैं।’’
चीफ जस्टिस मोहम्मद हिदायतुल्ला ने पहले राज्यपाल डॉ. पट्टाभि सीतारमैया को शपथ दिलाई और फिर राज्यपाल ने पंडित रविशंकर शुक्ल को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाई। 17 दिसंबर 1956 को मिंटो हॉल में ही 328 सदस्यीय पहली विधानसभा की ऐतिहासिक बैठक हुई, जिसमें 12 महिला विधायक भी शामिल थीं।
छत्तीसगढ़ का विभाजन और विकास की नई इबारत
स्थापना के ठीक 44 साल बाद, 1 नवंबर 2000 को मध्य प्रदेश से अलग होकर छत्तीसगढ़ नया राज्य बना। इस बंटवारे में मध्य प्रदेश ने अपना 30.4% भूभाग, 26.62% आबादी और 27.26% राजस्व खो दिया।
विभाजन और अतीत की चुनौतियों से उबरकर आज 71वें स्थापना दिवस पर मध्य प्रदेश पूरी तरह बदल चुका है। कभी बीमारू कहे जाने वाले इस राज्य ने कृषि के क्षेत्र में क्रांति करते हुए कई बार ‘कृषि कर्मण पुरस्कार’ जीते हैं। शरबती गेहूं, दलहन और तिलहन का सिरमौर बना यह राज्य औद्योगिक और बुनियादी ढांचे में भी तेजी से आगे बढ़ा है। वहीं, राज्य की आर्थिक राजधानी इंदौर ने लगातार देश का सबसे स्वच्छ शहर बनकर मध्य प्रदेश का मान पूरे विश्व में बढ़ाया है।
