नेशनल कॉन्फ्रेंस में बड़ी सेंध: आधी रात की ‘सीक्रेट मीटिंग’, विधायकों का अल्टीमेटम… क्या खतरे में है उमर सरकार?

श्रीनगर। जम्मू-कश्मीर की सत्ता संभाल रहे मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला की अपनी ही पार्टी ‘नेशनल कॉन्फ्रेंस’ में अंदरूनी बगावत का जोरदार धमाका हुआ है। पार्टी के भीतर असंतोष की सुलगती चिंगारी अब खुलकर शोले बन चुकी है। 19 विधायकों ने एक गुप्त बैठक में बगावती प्रस्ताव पास कर सीधे पार्टी आलाकमान की चौखट पर रख दिया है। इन विधायकों ने न सिर्फ मंत्रिमंडल में बड़े फेरबदल की शर्त रख दी है, बल्कि उमर अब्दुल्ला के सबसे भरोसेमंद ‘सिपहसालारों’ को भी तुरंत किनारे करने की खुली मांग कर डाली है। पार्टी के भीतर उभरे इस नए गुट ने साफ संकेत दे दिया है कि अगर उनकी शर्तें नहीं मानी गईं, तो घाटी की राजनीति में कोई बड़ा सियासी भूचाल आ सकता है।

श्रीनगर में 4 घंटे तक चला ‘डिनर डिप्लोमासी’ का खेल

सियासी पटकथा शुक्रवार शाम श्रीनगर स्थित विधायक कैसर जमशेद लोन के आवास पर लिखी गई। बंद दरवाजों के पीछे करीब चार घंटे तक गहन मंथन चला। इस बैठक में जम्मू और कश्मीर दोनों अंचलों के 19 असंतुष्ट विधायक लामबंद हुए। बैठक में वरिष्ठ नेता और हाल ही में महासचिव पद से हटाए गए मुबारक गुल की मौजूदगी ने बगावत की गंभीरता को और बढ़ा दिया। चर्चा है कि मुबारक गुल मंत्रिमंडल विस्तार में जगह न मिलने से बुरी तरह खफा थे और उन्होंने संगठन का पद ठुकरा दिया था।

बागी गुट का प्रस्ताव: दो साल वाले मंत्रियों की छुट्टी हो, नए चेहरों को मौका

बैठक में तैयार किए गए प्रस्ताव में नेतृत्व की कार्यशैली पर सीधा हमला बोला गया है। बागी विधायकों की मुख्य मांगें इस प्रकार हैं:

मंत्रिमंडल से छुट्टी: जिन मंत्रियों को पद संभाले दो साल पूरे हो चुके हैं, उन्हें फौरन हटाया जाए और उनकी जगह नए व योग्य विधायकों को कुर्सी सौंपी जाए।

क्षेत्रीय संतुलन और योग्यता: मंत्री पद रेवड़ियों की तरह बांटने के बजाय योग्यता और जम्मू व कश्मीर दोनों संभागों के समान प्रतिनिधित्व के आधार पर दिए जाएं।

फैसलों में हिस्सेदारी: सरकार और संगठन चलाने का तरीका बदला जाए। नीतिगत फैसलों में विधायकों की भागीदारी सुनिश्चित की जाए, न कि चंद लोगों का हुक्म चले।

27 अक्टूबर का कैबिनेट विस्तार बना बगावत की वजह?

पार्टी सूत्रों का कहना है कि नाराजगी का यह दौर 27 अक्टूबर को हुए मंत्रिमंडल विस्तार के बाद शुरू हुआ। उस दिन जब अली मोहम्मद सागर, शमीमा फिरदौस, मीर सैफुल्लाह और अल्ताफ कालू को लालबत्ती थमाई गई, तो कतार में खड़े कई वरिष्ठ विधायक खुद को ठगा सा महसूस करने लगे। विधायकों का आरोप है कि वफादारी और सीनियरिटी को दरकिनार कर कुछ खास चेहरों पर ही मेहरबानी बरसाई गई।

उमर के दो सबसे खास ‘सिपहसालार’ निशाने पर

नाराज विधायकों के निशाने पर सीधे तौर पर मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला की कोर टीम के दो सबसे कद्दावर चेहरे आ गए हैं नासिर असलम वानी और सांसद शम्मी ओबेरॉय। विधायकों का खुला आरोप है कि ये दोनों नेता सरकार के प्रशासनिक फैसलों और पार्टी के कामकाज में गैर-जरूरी दखलंदाजी कर रहे हैं। प्रस्ताव में साफ कहा गया है कि इन दोनों को तत्काल प्रभाव से तमाम अहम जिम्मेदारियों से मुक्त किया जाए।

अब क्या करेंगे फारूक और उमर अब्दुल्ला?

तैयार प्रस्ताव को अब पार्टी के संरक्षक डॉ. फारूक अब्दुल्ला को सौंपने की तैयारी है। 19 विधायकों की यह एकजुटता किसी सामान्य असंतोष का संकेत नहीं, बल्कि सीधे तौर पर पार्टी की मुख्य धारा को चुनौती है।

अब सबकी नजरें इस बात पर टिकी हैं कि क्या फारूक अब्दुल्ला अपने पुराने सियासी तजुर्बे से इस संकट को टाल पाएंगे, या फिर उमर अब्दुल्ला को अपने करीबियों की कुर्बानी देकर असंतुष्टों के आगे झुकना पड़ेगा? कश्मीर के सियासी गलियारों में सस्पेंस गहरा गया है।

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