Strait of Hormuz Crisis: युद्धविराम के बाद ईरान का बड़ा बयान, टोल-फ्री का वादा खारिज
गालिबफ ने कहा- ‘होर्मुज अब कभी युद्ध-पूर्व स्थिति में नहीं लौटेगा’, अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के दावे को ठुकराया
Strait of Hormuz : अमेरिका और ईरान के बीच हालिया युद्धविराम के बाद दुनिया को स्ट्रेट ऑफ होर्मुज (होर्मुज जलडमरूमध्य) के दोबारा खुलने की उम्मीद थी। दोनों देशों के बीच हुए समझौते को वैश्विक व्यापार और ऊर्जा बाजार के लिए राहत के तौर पर देखा जा रहा था। लेकिन समझौता लागू होने के पहले ही दिन ईरान के ताजा बयान ने नई चिंताएं पैदा कर दी हैं।
‘होर्मुज युद्ध-पूर्व स्थिति में नहीं लौटेगा’ – ईरान का साफ संकेत
ईरान के मुख्य वार्ताकार और संसद अध्यक्ष मोहम्मद बाघर गालिबफ ने सरकारी टेलीविजन को दिए इंटरव्यू में कहा कि होर्मुज जलडमरूमध्य अब कभी युद्ध-पूर्व स्थिति में नहीं लौटेगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि इस रणनीतिक समुद्री मार्ग पर ईरान का अधिकार है और यहां से गुजरने वाले जहाजों से दी जाने वाली सेवाओं के बदले शुल्क वसूला जाएगा। गालिबफ का यह बयान अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के उस दावे के विपरीत है, जिसमें उन्होंने कहा था कि जलमार्ग को स्थायी रूप से टोल-फ्री रखा जाएगा।
ईरान के संसद अध्यक्ष ने इस समझौते को अमेरिका की कूटनीतिक हार करार देते हुए कहा, “यह समझौता संयुक्त राज्य अमेरिका की विफलता का जीवंत प्रमाण है। दुनिया खुद देखेगी कि इस टकराव का वास्तविक परिणाम क्या रहा।”
समझौते की शर्तें – 60 दिनों की छूट, फिर शुल्क लागू
हालांकि, समझौते के आधिकारिक मसौदे के अनुसार, ईरान शुरुआती 60 दिनों तक जहाजों को बिना किसी शुल्क के सुरक्षित मार्ग उपलब्ध कराने पर सहमत हुआ है। लेकिन गालिबफ के बयान से साफ है कि इस अवधि के बाद ईरान शुल्क वसूलना शुरू कर सकता है। इससे यह स्पष्ट है कि ईरान ने अपनी सैन्य क्षमता और रणनीतिक स्थिति का इस्तेमाल सौदेबाजी की शक्ति के रूप में किया है।
यह दर्शाता है कि ईरान अपनी आर्थिक जरूरतों को पूरा करने के लिए इस रणनीतिक मार्ग का इस्तेमाल करेगा।
वैश्विक व्यापार पर पड़ा था गहरा असर – भारत को भी चिंता
28 फरवरी को शुरू हुए अमेरिका-ईरान संघर्ष के दौरान होर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों की आवाजाही लगभग ठप हो गई थी। युद्ध के दौरान ईरान ने इस मार्ग से गुजरने वाले जहाजों को निशाना बनाया, जबकि अमेरिका ने भी क्षेत्र में कड़ी नाकेबंदी लागू कर दी थी। युद्ध से पहले वैश्विक तेल व्यापार का करीब 20 प्रतिशत हिस्सा इसी समुद्री मार्ग से गुजरता था। इसके बंद होने से वैश्विक सप्लाई चेन प्रभावित हुई और भारत समेत कई आयात-निर्भर देशों में ईंधन आपूर्ति को लेकर गंभीर चिंताएं पैदा हो गईं।
भारत, जो अपनी तेल जरूरतों का एक बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों से आयात करता है, इस मार्ग पर निर्भर है।
अमेरिकी खुफिया एजेंसियों की बढ़ी चिंता
इस बीच अमेरिकी खुफिया रिपोर्टों में भी होर्मुज पर ईरान की बढ़ती पकड़ को लेकर चिंता जताई गई है। अधिकारियों का मानना है कि ईरान ने यह दिखा दिया है कि वह जरूरत पड़ने पर वैश्विक समुद्री यातायात को बाधित करने की क्षमता रखता है। यही कारण है कि समझौते के बावजूद इस महत्वपूर्ण जलमार्ग को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है।
फिलहाल, तेहरान और वाशिंगटन के बीच समझौते के कार्यान्वयन पर बातचीत जारी है। लेकिन यह एक बार फिर पश्चिम एशिया की अस्थिरता को उजागर करता है। अब यह देखना होगा कि अमेरिका इस नई चुनौती का क्या जवाब देता है और क्या दोनों पक्ष इस मसले पर कोई समाधान निकाल पाते हैं।
