‘हर साल 4.5 लाख लड़कियां भागती हैं, 9 लाख बच्चे होते हैं’: गरबा पंडालों में एंट्री पर उषा ठाकुर का सनसनीखेज दावा, सियासत गरमाई
इंदौर। शारदीय नवरात्रि के शुरू होने से पहले गरबा आयोजनों और पंडालों में प्रवेश को लेकर मध्य प्रदेश में एक बार फिर सियासी और सामाजिक बहस तेज हो गई है। पूर्व मंत्री और भाजपा नेता उषा ठाकुर ने गरबा पंडालों में गैर-हिंदुओं के प्रवेश और आयोजनों के बदलते स्वरूप को लेकर कड़ा रुख अपनाया है। एक बातचीत के दौरान उन्होंने दावा किया कि गरबा विशुद्ध रूप से धार्मिक आस्था और शक्ति की साधना का पर्व है, ऐसे में मूर्ति पूजा न करने वालों को इन आयोजनों से दूर रखा जाना चाहिए। इसके साथ ही उन्होंने गरबों के तेजी से हो रहे बाजारीकरण और व्यावसायिक स्वरूप पर भी गहरी चिंता व्यक्त की।
‘पहचान छिपाकर भ्रमित करने वालों के प्रवेश पर लगे रोक’
उषा ठाकुर ने आरोप लगाया कि कुछ लोग अपनी धार्मिक पहचान छिपाकर या भेष बदलकर गरबा पंडालों में दाखिल होते हैं और युवतियों को भ्रमित करते हैं। उन्होंने इसे सुनियोजित साजिश बताते हुए कहा कि हिंदू संगठनों द्वारा ऐसे लोगों को पंडालों से दूर रखने का फैसला पूरी तरह जायज है। उन्होंने स्पष्ट किया कि जो लोग सनातन परंपरा और मूर्ति पूजा में विश्वास नहीं रखते, उन्हें आस्था के इस उत्सव में आने की अनुमति नहीं मिलनी चाहिए।
जनसांख्यिकी बदलाव को लेकर किया बड़ा दावा
बातचीत के दौरान पूर्व मंत्री ने एक अत्यंत विवादित दावा करते हुए कहा कि हर साल गरबा आयोजनों के जरिए लाखों युवतियों को प्रेमजाल में फंसाकर उनका धर्मांतरण कराया जाता है, जिससे देश की जनसांख्यिकी पर सीधा असर पड़ रहा है। हालांकि, अपने इस भारी-भरकम आंकड़े के समर्थन में उन्होंने किसी आधिकारिक अध्ययन, सरकारी रिपोर्ट या पुलिस डेटा का कोई स्रोत पेश नहीं किया। कानूनी और सांख्यिकीय जानकारों का मानना है कि बिना किसी आधिकारिक आधार के ऐसे आंकड़े केवल राजनीतिक बयानबाजी का हिस्सा प्रतीत होते हैं।
‘साधना पीछे छूटी, टैटू और गहनों का प्रदर्शन बन गया गरबा’
पूर्व मंत्री ने गरबा आयोजनों के मौजूदा व्यावसायिक ट्रेंड पर भी जमकर निशाना साधा। उन्होंने विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल द्वारा कमर्शियल गरबों के विरोध का समर्थन करते हुए कहा कि गरबा मूल रूप से शक्ति स्वरूपा मां भगवती की उपासना और महिलाओं के चारित्रिक व आत्मिक उत्थान का माध्यम है।
उषा ठाकुर ने आगे कहा कि अब आयोजनों में धार्मिक साधना गौण हो गई है और गरबा केवल महंगे कपड़ों, गहनों और टैटू के प्रदर्शन का मंच बनकर रह गया है। नवरात्रि के नौ दिनों में शस्त्र और शास्त्र के संतुलन से मातृशक्ति को सशक्त करने की परंपरा रही है, जिसे व्यावसायिक आयोजनों ने तमाशे में बदल दिया है। आयोजकों को मर्यादा और गरिमा का विशेष ध्यान रखना चाहिए।
2014 से ही गरबा पंडालों पर मुखर रहा है रुख
गरबा पंडालों में आईडी कार्ड देखकर प्रवेश देने और गैर-हिंदुओं को रोकने का उषा ठाकुर का यह बयान कोई नया नहीं है। साल 2014 में भी, जब वे इंदौर से विधायक थीं, तब उन्होंने आयोजकों से केवल हिंदू युवाओं को प्रवेश देने और वोटर आईडी चेक करने की सार्वजनिक अपील की थी। नवरात्रि के नजदीक आते ही उनके इस ताजा बयान ने एक बार फिर स्थानीय राजनीति और प्रशासनिक गलियारों में हलचल पैदा कर दी है।
