‘चलो संसद’ मार्च से पहले दिल्ली छावनी में तब्दील! प्रदर्शनकारियों को चेतावनी… धारा 163 लागू
मानसून सत्र से पहले दिल्ली में सख्ती, अनुमति रहित प्रदर्शन पर कार्रवाई की धमकी– क्या शिक्षा मंत्री का इस्तीफा और परीक्षा सुधार अब भी ‘असंवैधानिक’ मांग है?
नई दिल्ली: संसद का मानसून सत्र 20 जुलाई से शुरू हो रहा है और उसी दिन कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) का प्रस्तावित ‘चलो संसद’ मार्च। दिल्ली पुलिस ने राजधानी में सुरक्षा कड़ी कर दी है। BNSS की धारा 163 (पूर्व CrPC 144) लागू कर पांच या अधिक लोगों के जमा होने, जुलूस और प्रदर्शन पर रोक लगा दी गई है। पुलिस का स्पष्ट कहना है कि मार्च की कोई अनुमति नहीं मांगी गई और न ही दी जाएगी। बिना अनुमति कोई भी प्रदर्शन कानूनी कार्रवाई का कारण बनेगा।
यह तस्वीर केवल सुरक्षा की नहीं, बल्कि मोदी सरकार की शिक्षा व्यवस्था पर गहरे संकट और विपक्षी-छात्र आंदोलन को कुचलने की मानसिकता की है। NEET 2026 पेपर लीक, री-एग्जाम, छात्र आत्महत्याएं और NTA की बार-बार फेलियर के बावजूद शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान न सिर्फ कुर्सी पर बने हुए हैं, बल्कि सरकार पूरे आंदोलन को “विघ्नकारी ताकतों” का ‘B-टीम’ बता रही है।
बार-बार की लापरवाही या सिस्टेमेटिक फेलियर?
NEET-UG 2026 का 3 मई का परीक्षा पेपर लीक होने के आरोपों के बाद रद्द कर दिया गया। री-एग्जाम 21 जून को हुआ, लेकिन विवाद थमा नहीं। पिछले वर्षों में भी पेपर लीक, ग्रेस मार्क्स घोटाले और CUET, UGC-NET जैसी परीक्षाओं में अनियमितताओं ने लाखों छात्रों का भविष्य बर्बाद किया है। CJP और अन्य संगठनों के अनुसार, पिछले एक दशक में करीब 89 पेपर लीक की घटनाएं हुईं, जिससे करोड़ों छात्र प्रभावित हुए।
सरकार ने NTA को “सुरक्षा” के नाम पर बायोमेट्रिक, CCTV, जामर आदि लगाए, लेकिन मूल समस्या पारदर्शिता, जवाबदेही और सिस्टम की जड़ में सड़ांध को नजरअंदाज किया। छात्र मांग कर रहे हैं: प्रधान का इस्तीफा, प्रभावित छात्रों के परिवारों को 1 करोड़ मुआवजा, NTA का विघटन और परीक्षा सुधार। इसके बजाय सरकार प्रदर्शनकारियों पर दमन कर रही है।
जंतर-मंतर पर CJP संस्थापक अभिजीत दीपके का अनशन जारी है। पर्यावरण और शिक्षा कार्यकर्ता सोनम वांगचुक की तबीयत बिगड़ने पर उन्हें सफदरजंग अस्पताल में भर्ती कराया गया। वांगचुक के अनशन ने आंदोलन को नया आयाम दिया, लेकिन पुलिस की कार्रवाई और स्वास्थ्य रिकॉर्ड रोकने के आरोप भी लगे।
सुरक्षा या लोकतंत्र पर हमला?
दिल्ली पुलिस ने संसद, सरकारी भवनों और संवेदनशील इलाकों में अतिरिक्त बल तैनात किए हैं। प्रमुख मार्गों पर बैरिकेडिंग, वाहन जांच और गश्त बढ़ा दी गई है। BNSS 163 के तहत नई दिल्ली जिले में सख्ती बरती जा रही है। पुलिस कह रही है कि संसद हाई-सिक्योरिटी जोन है, इसलिए बिना अनुमति कोई आगे नहीं बढ़ेगा। BNS की धारा 223 आदि के तहत कार्रवाई की धमकी दी गई है।
सवाल उठता है क्या छात्रों का शांतिपूर्ण मार्च इतना बड़ा खतरा है कि पूरे शहर को लॉकडाउन जैसी स्थिति में डाल दिया जाए? जब राम मंदिर दान घोटाले, महंगाई, बेरोजगारी जैसे मुद्दों पर सरकार चुप है, तो NEET जैसे युवा-केंद्रित मुद्दे पर क्यों इतनी बेचैनी? यह दमनकारी रवैया NDA सरकार की पुरानी आदत लगती है आंदोलन को ‘देश-विरोधी’ बताकर कुचलना। किसान आंदोलन, CAA-NRC विरोध, पहलवान आंदोलन.. हर बार यही पैटर्न।
CJP का ‘चलो संसद’ मार्च केवल NEET तक सीमित नहीं। यह पूरे शिक्षा तंत्र की नाकामी, युवाओं की हताशा और बेरोजगारी का प्रतीक है। “Make in India” का नारा देने वाली सरकार “Leak in India” दे रही है। लाखों छात्र साल भर की मेहनत पानी में बहते देख रहे हैं, जबकि NTA और मंत्री जिम्मेदारी से बच रहे हैं।
राजनीतिक आयाम और विपक्ष की भूमिका
CJP जैसा युवा-प्रधान आंदोलन जो CJI की टिप्पणी से प्रेरित “cockroach” नाम से जाना जाता है अब विपक्षी दलों कांग्रेस, वामपंथी संगठनों, किसान यूनियनों का समर्थन हासिल कर रहा है। कांग्रेस ने 40 दिन का अभियान चलाया, राहुल गांधी ने छात्र सम्मेलन किए। SFI, AISA आदि छात्र संगठन NTA के विघटन और विकेंद्रीकृत परीक्षाओं की मांग कर रहे हैं।
मानसून सत्र में विपक्ष इन मुद्दों को जोर-शोर से उठाएगा। सरकार के पास बहुमत है, लेकिन जन-आक्रोश को नजरअंदाज करना महंगा पड़ सकता है। प्रधान का इस्तीफा “बेयर मिनिमम” मांग है। अगर सरकार जवाबदेही नहीं दिखाती, तो युवा वोट बैंक और 2029 चुनावों में नुकसान हो सकता है।
सरकार की विफलताएं
- NTA पर बार-बार सुधार का दावा, लेकिन कोई ठोस बदलाव नहीं।
- पेपर सेटिंग, प्रिंटिंग, ट्रांसपोर्ट और मूल्यांकन (OSM सिस्टम) में पारदर्शिता की कमी।
- छात्र आत्महत्याओं पर चुप्पी और मुआवजे की अनदेखी।
- आंदोलन को राजनीतिक रंग देकर मूल मुद्दे से ध्यान भटकाना।
छात्रों की आवाज दब नहीं सकती
CJP ने अनुमति न मिलने के बावजूद मार्च का ऐलान किया है। अभिजीत दीपके और सहयोगी शांतिपूर्ण प्रदर्शन की अपील कर रहे हैं, लेकिन पुलिस की सख्ती टकराव की आशंका बढ़ा रही है। सोनम वांगचुक जैसे सम्मानित कार्यकर्ताओं का स्वास्थ्य बिगड़ना सरकार के लिए शर्मनाक है।
सरकार दमन के बजाय संवाद करें। NTA पर स्वतंत्र जांच, प्रधान का इस्तीफा (या कम से कम जवाबदेही), और परीक्षा कैलेंडर फिक्स करने जैसे कदम उठाएं। युवाओं का भविष्य राजनीतिक अहंकार का शिकार नहीं होना चाहिए।
‘चलो संसद’ मार्च लोकतंत्र का परीक्षण है। अगर सरकार छात्रों की चीख सुनती है, तो यह सत्र सुधारों का सत्र बन सकता है। वरना, जंतर-मंतर से संसद तक की दूरी पर बैरिकेड नहीं, बल्कि जन-आक्रोश की दीवार खड़ी हो जाएगी। NEET घोटाला केवल एक परीक्षा का नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की नाकामी का प्रतीक है। समय आ गया है कि “विकसित भारत” का सपना युवाओं के आंसुओं पर टिका न रहे।
