सरकार-CJP वार्ता फिर बेनतीजा! इस्तीफे की मांग पर अड़ी पार्टी, सरकार ने मांगा एक दिन का समय
दिल्ली में दूसरी बैठक बेनतीजा, जंतर-मंतर पर आंदोलन जारी… पेपर लीक पर नया कानून सिर्फ़ धूल फेंकने का प्रयास?
केंद्र सरकार और कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के बीच दूसरी बार हुई उच्चस्तरीय बैठक भी बेनतीजा समाप्त हो गई। दोपहर 12:40 बजे से 2:20 बजे तक चली इस बैठक में CJP ने शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के तत्काल इस्तीफे की अपनी अटल मांग दोहराई, जबकि सरकार ने एक दिन का समय मांगा। इससे पहले 20 जुलाई को केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा के आवास पर हुई बैठक भी निष्फल रही थी। CJP ने साफ़ कहा था कि वे किसी भी कीमत पर नड्डा के घर नहीं जाएंगे, इसलिए यह बैठक कॉन्स्टिट्यूशन क्लब (Constitution Club) में आयोजित की गई।
CJP के फाउंडिंग प्रेसिडेंट अभिजीत दिपके ने बैठक से पहले स्पष्ट कर दिया था, “इस्तीफे के अलावा हमें कुछ भी मंजूर नहीं। हमारा प्रोटेस्ट तब तक नहीं रुकेगा।” बैठक में CJP के प्रवक्ता आशुतोष रांका और सौरभ दास ने 5 पैराग्राफ वाली लिखित मांग-पत्र सौंपा, जिसमें मुख्य रूप से चार बड़े बिंदु शामिल हैं: शिक्षा मंत्री का इस्तीफा, छात्रों पर दर्ज FIR और केस वापस लेना, पीड़ित परिवारों को 1-1 करोड़ रुपये मुआवजा और सरकार की ओर से सार्वजनिक माफी।
बैठक के बाद आशुतोष रांका ने कहा, “सरकार हमारे दबाव में है, इसलिए पीएम मोदी को रात 12:30 बजे वीडियो जारी करना पड़ा। हमारा प्रदर्शन शिक्षा मंत्री के इस्तीफे तक जारी रहेगा।” CJP ने दावा किया कि सरकार ने आत्महत्या करने वाले छात्रों के परिवारों को मुआवजा और केस वापसी पर सैद्धांतिक सहमति जताई है, लेकिन इस्तीफे पर टालमटोल कर रही है।
सरकार की नाकामी और टालमटोल की राजनीति
यह घटनाक्रम केंद्र सरकार की शिक्षा व्यवस्था पर गहरा सवाल उठाता है। NEET, NET और अन्य परीक्षाओं में लगातार पेपर लीक, सवालों की बिक्री और रिश्वतखोरी के मामले सामने आने के बावजूद शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान अब तक कुर्सी पर बने हुए हैं। लाखों छात्रों का भविष्य बर्बाद हो रहा है, परिवार आत्महत्या कर रहे हैं, लेकिन सत्ता के गलियारों में सिर्फ़ बैठकें और वीडियो मैसेज जारी हो रहे हैं।
पीएम मोदी ने गुरुवार देर रात वीडियो जारी कर कहा कि सरकार पेपर लीक पर सख्त कानून लाएगी जिसमें 10 साल की जेल और 10 करोड़ तक का जुर्माना शामिल होगा। लेकिन सवाल यह है कि जब पुराने कानूनों का सख्ती से पालन नहीं हो रहा, नया कानून किस काम का? यह सिर्फ़ जनता को लुभाने वाला प्रचार है। फास्ट-ट्रैक कोर्ट और तीन महीने में फैसले का वादा कितना हवा-हवाई है, यह तो समय बताएगा। असल में सरकार परीक्षा घोटालों की जड़ निजीकरण, कोचिंग माफिया और प्रशासनिक लापरवाही को छूने की हिम्मत नहीं दिखा रही।
CJP के प्रवक्ताओं ने बैठक में कहा कि सरकार दबाव में है। सच भी यही है। जंतर-मंतर पर लंबे समय से चला आंदोलन, सोनम वांगचुक जैसे एक्टिविस्ट्स का अनशन और युवाओं का गुस्सा सरकार को परेशान कर रहा है। सोनम वांगचुक ने लिखित आश्वासन मिलने के बाद अपना अनशन तोड़ दिया, लेकिन CJP का आंदोलन अभी भी जोरों पर है। अभिजीत दिपके ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में दोहराया, “धर्मेंद्र प्रधान इस्तीफा न दें तो जंतर-मंतर खाली नहीं होगा।”
सत्ता की उदासीनता और युवाओं का शोषण
यह पूरा प्रकरण मोदी सरकार की शिक्षा नीति की नाकामी को उजागर करता है। एक तरफ़ “बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ” और “स्किल इंडिया” जैसे नारे, दूसरी तरफ़ पेपर लीक के कारण छात्र आत्महत्या कर रहे हैं। शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग को सरकार टाल रही है, इसका मतलब साफ़ है मंत्रियों की कुर्सी छात्रों के भविष्य से ज्यादा महत्वपूर्ण है।
सरकार कह रही है कि कैबिनेट मीटिंग में बिल पर चर्चा हो रही है और सोमवार को संसद में पेश किया जाएगा। लेकिन इतने दिनों की देरी क्यों? जब घोटाले हो रहे थे, तब सरकार कहां सो रही थी? NEET पेपर लीक का मामला सामने आने के बाद भी त्वरित कार्रवाई नहीं हुई। FIR दर्ज हुईं, लेकिन बड़े माफिया तक पहुंचने में नाकामी दिखी। अब जब CJP और अन्य संगठन सड़क पर हैं, तब अचानक कानून बनाने की बात हो रही है। यह दबाव की राजनीति है, स्वतःस्फूर्त सुधार नहीं।
CJP की मांग छात्रों पर कार्रवाई के लिए माफी और 1 करोड़ मुआवजा पूरी तरह जायज है। जिन परिवारों ने अपने बच्चे खो दिए, उन्हें सिर्फ़ शब्दों के आश्वासन से नहीं, ठोस मुआवजे और न्याय से संतोष मिल सकता है। लेकिन सरकार सैद्धांतिक सहमति देकर समय खींच रही है। यह क्लासिक टालमटोल है, जिसका इस्तेमाल हर आंदोलन में किया जाता है पहले वादे, फिर भुलावा, अंत में दमन।
देश भर में युवा बेरोजगारी, शिक्षा की गिरती गुणवत्ता और परीक्षा प्रणाली के भरोसे का संकट गहरा रहा है। कोचिंग उद्योग अरबों का कारोबार कर रहा है, लेकिन असली तैयारी और निष्पक्ष परीक्षा का अभाव है। CJP जैसे नए संगठन इसी गुस्से का नतीजा हैं। “कॉकरोच जनता पार्टी” का नाम शायद व्यंग्यात्मक है, लेकिन उनका संदेश साफ़ है सिस्टम में छिपे कीड़े-मकोड़ों को बाहर निकालो।
सरकार की ओर से जेपी नड्डा और जितेंद्र सिंह जैसे मंत्रियों को बातचीत के लिए भेजना भी रणनीतिक है। वे “संवाद” का चेहरा बन रहे हैं, जबकि असली फैसला पीएमओ से आ रहा है। अगर सरकार वाकई संवेदनशील होती, तो पहली बैठक में ही इस्तीफा स्वीकार कर लिया जाता और पीड़ितों को तत्काल राहत दी जाती।
अब समय है जवाबदेही का
CJP का आंदोलन सिर्फ़ एक मंत्री के इस्तीफे तक सीमित नहीं है। यह पूरे शिक्षा तंत्र की सफाई की मांग है। अगर सरकार अब भी टालती रही, तो युवाओं का गुस्सा और भड़केगा। जंतर-मंतर पर प्रदर्शन जारी है, और लाखों छात्र देश भर में नजर रखे हुए हैं।
धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा अब सिर्फ़ नैतिक जिम्मेदारी नहीं, राजनीतिक जरूरत भी बन गया है। नया कानून लाना अच्छा है, लेकिन बिना जवाबदेही के वह सिर्फ़ कागजी शेर साबित होगा। सरकार को समझना चाहिए छात्रों का भविष्य खेलने का समय समाप्त हो चुका है। अब या तो इस्तीफा दो, मुआवजा दो और सिस्टम सुधारो, वरना सड़कें और लंबी होंगी।
CJP के प्रवक्ता सौरभ दास ने ठीक कहा: “सरकार दबाव में है।” सवाल है कि यह दबाव कब असली बदलाव में बदलता है? युवा इंतजार नहीं कर सकते। समय आ गया है कि सत्ता अपने घमंड को छोड़े और जनता की आवाज सुने। अन्यथा, यह गुस्सा आने वाले चुनावों और सड़कों दोनों पर भारी पड़ेगा।
