बॉम्बे हाई कोर्ट ने नागपुर के श्मशान से मुसलमान का शव खोदने का दिया आदेश, जाने पूरी बात

नागपुर। मृत्यु के बाद भी व्यक्ति की गरिमा और संवैधानिक अधिकार बने रहते हैं। इस सिद्धांत की पुष्टि करते हुए बॉम्बे हाई कोर्ट की नागपुर पीठ ने एक अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने गलती से हिंदू श्मशान घाट में दफनाए गए एक मुस्लिम व्यक्ति के शव को निकालने का आदेश दिया।

 

नागपुर बेंच के न्यायमूर्ति अनिल किलोर और राज वाकोडे की खंडपीठ ने यह आदेश याचिकाकर्ता जावेद खान की याचिका पर सुनवाई के बाद दिया। कोर्ट ने नागपुर ग्रामीण के तहसीलदार और उप-विभागीय अधिकारी के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें शव निकालने की अनुमति देने से इनकार किया गया था।

 

अदालत ने निर्देश दिया कि नागपुर नगर निगम की देखरेख में घाट रोड स्थित मोक्षधाम घाट से साजिद खान का शव निकाला जाए और परिजनों को सौंपा जाए, ताकि इस्लामी रीति-रिवाजों के अनुसार अंतिम संस्कार किया जा सके।

 

मामले के अनुसार, मालेगांव निवासी साजिद खान 25 जनवरी को ताजुद्दीन बाबा के उर्स में शामिल होने नागपुर आए थे। 26 जनवरी को वे लापता हो गए और बाद में बुटीबोरी के पास उनका शव मिला। पहचान न हो पाने के कारण पुलिस ने शव को अज्ञात मानकर मोक्षधाम घाट में दफना दिया।

 

बाद में तस्वीरों के माध्यम से शव की पहचान होने पर परिवार ने कब्र से निकालने की अनुमति मांगी, ताकि बड़ा ताजबाग कब्रिस्तान में धार्मिक परंपरा के अनुसार दफन किया जा सके। स्थानीय प्रशासन ने अनुमति देने से इनकार करते हुए न्यायालय से आदेश लाने को कहा।

 

कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि परिवार को शव की अभिरक्षा से वंचित करना संविधान के अनुच्छेद 14, 21 और 25 के तहत प्रदत्त अधिकारों का उल्लंघन होगा। अनुच्छेद 25 धर्म की स्वतंत्रता की गारंटी देता है, जबकि अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार की न्यायिक व्याख्या में गरिमा का अधिकार भी शामिल है, जो मृत्यु के बाद भी लागू रहता है।

 

पीठ ने नागपुर ग्रामीण के पुलिस अधीक्षक और बुटीबोरी पुलिस को निर्देश दिया कि विधिक पर्यवेक्षण में शव निकालकर मृतक के भाई को सौंपा जाए।

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