स्मार्ट मीटर या स्मार्ट लूट? स्मार्ट मीटर बना सिरदर्द! बिजली बिल ने उड़ाए होश
1,360 रुपये का बिल बढ़कर 7,550 रुपये.. क्या स्मार्ट मीटर है असली villain या टैरिफ बढ़ोतरी और गर्मी की लहर?
रायपुर। छत्तीसगढ़ की बिजली व्यवस्था में स्मार्ट मीटर अब मात्र एक उपकरण नहीं रह गया है। यह आम उपभोक्ता की जेब काटने वाला, राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का हथियार और पूरे प्रदेश में बहस का केंद्र बन चुका है। जून-जुलाई 2026 में प्रदेश भर से बढ़े हुए बिजली बिलों की शिकायतों का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा। जहां पहले घरेलू उपभोक्ताओं को 800 से 1,500 रुपये तक का मासिक बिल आता था, वहीं स्मार्ट मीटर लगने के बाद कई परिवारों को 4,000 से 7,500 रुपये या उससे भी अधिक बिल मिल रहे हैं।
यह विवाद अब सिर्फ तकनीकी या बिलिंग का नहीं, बल्कि भरोसे की लड़ाई और राजनीतिक रणनीति का मुद्दा बन गया है। कांग्रेस इसे “जनता पर डाका” बता रही है तो भाजपा कह रही है कि योजना तो पिछली कांग्रेस सरकार की देन है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है क्या स्मार्ट मीटर वाकई ज्यादा बिल भेज रहा है या इसके पीछे टैरिफ बढ़ोतरी, बढ़ी हुई खपत और प्रशासनिक खामियां हैं? इस लेख में हम पूरे मामले की गहन पड़ताल करते हैं।
प्रभावित उपभोक्ताओं की दर्द भरी कहानियां
रायपुर के महावीर नगर निवासी दमयंती तिवारी का मामला सबसे चर्चित है। जुलाई 2025 में उनका बिल मात्र 1,360 रुपये था, लेकिन जून 2026 में यह अचानक 7,550 रुपये पहुंच गया। उन्होंने बताया कि घर में बिजली की खपत लगभग वैसी ही है, फिर भी बिल पांच गुना बढ़ गया।
इसी तरह भिलाई के वृंदानगर में रहने वाले कई परिवारों ने स्मार्ट मीटर उखाड़कर बिजली कार्यालय में फेंक दिए। उन्होंने आरोप लगाया कि पहले सामान्य बिल आने के बावजूद अब चार-पांच गुना ज्यादा राशि वसूली जा रही है। राजगढ़ जिले में तो लोगों ने बंद मीटर में भी रीडिंग बनने का दावा किया। महिलाओं ने कहा, “500 रुपये का बिल सीधे 5,000-6,000 रुपये पहुंच रहा है, परिवार का बजट बिगड़ गया है।”
रायपुर, दुर्ग, बिलासपुर, महासमुंद और अन्य जिलों से 50,000 से अधिक शिकायतें दर्ज हो चुकी हैं। उपभोक्ता कह रहे हैं कि स्मार्ट मीटर संवेदनशील होने के कारण छोटी-छोटी खपत भी ज्यादा रिकॉर्ड कर रहा है। कुछ मामलों में अनुबंध भार (सैंक्शन लोड) बिना सूचना बढ़ाए जाने की शिकायत भी आई है, जिससे फिक्स्ड चार्ज भी बढ़ जाता है।
कांग्रेस vs भाजपा
कांग्रेस ने इस मुद्दे को बड़ा जन आंदोलन बना लिया है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज ने आरोप लगाया कि भाजपा सरकार बनने के बाद बिजली दरें पांचवीं बार बढ़ाई गई हैं। हालिया 6.23% औसत बढ़ोतरी (घरेलू उपभोक्ताओं के लिए 30-50 पैसे प्रति यूनिट) ने आग में घी डाला। कांग्रेस का कहना है कि स्मार्ट मीटर खपत से ज्यादा दिखा रहे हैं और पुरानी ‘आधा बिल’ सब्सिडी योजना बंद कर दी गई।
जून 2026 में पार्टी ने बिजली कार्यालयों का घेराव किया, पुतले फूंके और जुलाई में घर-घर जाकर ‘स्मार्ट मीटर हटाओ’ अभियान चलाया। पूर्व विधायक विकास उपाध्याय ने कहा, “मीटर बिजली विभाग लगा रहा है, जिम्मेदारी वर्तमान सरकार की है। 500 रुपये का बिल अब 5,000 रुपये हो रहा है।”
दूसरी ओर, भाजपा ने पलटवार किया। विधायक पुरंदर मिश्रा ने याद दिलाया कि स्मार्ट मीटर योजना की नींव कांग्रेस शासन में पड़ी थी 2021 में चर्चा, 2022 में टेंडर और जनवरी 2023 में एग्रीमेंट। उनका आरोप है कि पिछली सरकार ने बिजली व्यवस्था निजी कंपनियों को सौंपकर प्रदेश को मुश्किल में डाला। मौजूदा सरकार को इसका खामियाजा भुगतना पड़ रहा है।
यह सियासी पिंजरा-बाजी जनता को और परेशान कर रही है। दोनों पार्टियां एक-दूसरे पर जिम्मेदारी डाल रही हैं, जबकि आम आदमी बिल भरने में असमर्थ हो रहा है।
स्मार्ट मीटर परियोजना
छत्तीसगढ़ में स्मार्ट मीटर Revamped Distribution Sector Scheme (RDSS) के तहत लगाए जा रहे हैं। लक्ष्य है AT&C लॉस कम करना, बिजली चोरी रोकना, रियल-टाइम मॉनिटरिंग और प्रीपेड सिस्टम लागू करना। Tata Power जैसी कंपनियां इसमें शामिल हैं। राज्य में लाखों मीटर लग चुके हैं और लक्ष्य पूरे प्रदेश को कवर करना है।
फायदे
‘मोर बिजली’ ऐप से हर आधे घंटे की खपत देख सकते हैं।
ऑटोमैटिक बिलिंग, कम मानवीय हस्तक्षेप।
चोरी पर तुरंत अलर्ट।
समस्याएं
कई जगहों पर बिना पूरी सूचना या सहमति के मीटर बदले गए।
पुराने मीटरों के निपटान में प्रबंधन की खामियां (CSERC ने संज्ञान लिया)।
गर्मी की लहर में बढ़ी खपत (एसी, कूलर) को मीटर सटीक तरीके से रिकॉर्ड कर रहा है, जो पहले कम दिखता था।
कुछ मामलों में तकनीकी गड़बड़ी या सर्वर इश्यू।
CSERC ने टैरिफ बढ़ोतरी को मंजूरी दी लेकिन उपभोक्ताओं की शिकायतों पर भी सुनवाई की। कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि स्मार्ट मीटर सटीक हैं, लेकिन अचानक बदलाव से उपभोक्ता को झटका लगा।
प्रभाव
यह संकट मध्यम वर्ग और निम्न मध्यम वर्ग को सबसे ज्यादा प्रभावित कर रहा है। कई परिवारों ने बताया कि माह का बजट बिगड़ गया है बच्चों की पढ़ाई, दवाइयां और जरूरी खर्च प्रभावित हो रहे हैं। छोटे व्यापारियों पर भी असर पड़ा है।
प्रदेश में सरकारी विभागों पर ही 3,000 करोड़ रुपये से ज्यादा बकाया है, जो व्यवस्था की कमजोरी दिखाता है। उपभोक्ता अब चेक मीटर लगवाने या शिकायत फोरम में जाने की बात कर रहे हैं।
महाराष्ट्र जैसे राज्यों में मुख्यमंत्री ने स्पष्ट किया कि गर्मी से बढ़ी खपत मुख्य वजह है, स्मार्ट मीटर नहीं। छत्तीसगढ़ को भी इसी स्पष्टता की जरूरत है।
जनता का भरोसा बहाल करना जरूरी
स्मार्ट मीटर भविष्य की जरूरत है, लेकिन इसका क्रियान्वयन जन-उन्मुखी होना चाहिए। यदि खामियां हैं तो उन्हें दूर किया जाए, अन्यथा उपभोक्ताओं को फायदे बताए जाएं। फिलहाल विवाद थमने वाला नहीं दिख रहा क्योंकि बिल अभी भी ऊंचे आ रहे हैं।
छत्तीसगढ़ सरकार, बिजली कंपनी और विपक्ष को मिलकर पारदर्शी समाधान निकालना होगा। जनता सिर्फ रोशनी चाहती है सस्ती और विश्वसनीय। जब तक निष्पक्ष जांच और राहत नहीं मिलती, स्मार्ट मीटर विवाद प्रदेश की सड़कों से लेकर विधानसभा तक गरमाता रहेगा।
उपभोक्ता ‘मोर बिजली’ ऐप पर खपत चेक करें, शिकायत दर्ज करें या निकटतम बिजली कार्यालय/हेल्पलाइन संपर्क करें। सरकार से अपील है इस मुद्दे को राजनीति से ऊपर उठाकर जनहित में हल करें।
