E20 पेट्रोल से खराब हो रही हैं गाड़ियां? मोदी सरकार ने दिया बड़ा जवाब

लाखों वाहन मालिकों की चीखें, केजरीवाल का अभियान… केंद्र की ‘सब ठीक है’ वाली नीति पर सवाल, मिलावट पर सख्ती लेकिन उपभोक्ता पर बोझ क्यों?

 

देशभर में E20 पेट्रोल को लेकर आग लगी हुई है। कार और बाइक मालिक सड़कों पर उतर रहे हैं, सोशल मीडिया पर रोज नई शिकायतें वायरल हो रही हैं। माइलेज 10 से 20 प्रतिशत तक गिरने, इंजन की परफॉर्मेंस खराब होने, फ्यूल टैंक और पाइप्स पर असर पड़ने तथा बीच रास्ते में गाड़ी बंद हो जाने की घटनाएं आम होती जा रही हैं। अरविंद केजरीवाल ने StopE20petrol.com पर सिग्नेचर अभियान शुरू कर सरकार को घेर लिया है।

लेकिन मोदी सरकार का रुख सख्त है  समस्या E20 से नहीं, मिलावट से है। क्या वाकई ऐसा है या सरकार अपनी गलती छिपा रही है?

 

E20 थोपने की जल्दबाजी: तैयारी कहां थी?

 

मोदी सरकार ने एथनॉल ब्लेंडिंग प्रोग्राम को आत्मनिर्भर भारत का बड़ा हथियार बताया। 2014 से शुरू हुए इस कार्यक्रम में 2025 के अंत तक E20 को पूरे देश में अनिवार्य कर दिया गया। अब 90,000 पेट्रोल पंपों पर सिर्फ E20 ही मिलता है। सरकार का दावा है कि इससे कच्चे तेल के आयात में कमी आई, किसानों की आय बढ़ी और पर्यावरण को फायदा हुआ। लेकिन हकीकत में लाखों पुरानी गाड़ियों वाले आम नागरिक इस प्रयोग के शिकार हो गए।

 

सरकार ने विकास के नाम पर आम आदमी की जेब और गाड़ी दोनों पर डाका डाल दिया।

 

22 करोड़ टू-व्हीलर और 8 करोड़ फोर-व्हीलर में से ज्यादातर 2023 से पहले की हैं, जो E10 के लिए बनी थीं। अचानक E20 थोप दिया गया। ऑटोमोबाइल कंपनियां भी चुपचाप नई गाड़ियों को E20 कंपैटिबल बता रही हैं, लेकिन पुरानी गाड़ियों के लिए कोई ठोस समाधान नहीं। सरकार कह रही है कि कुछ रबर पार्ट्स जल्दी बदलने पड़ सकते हैं, लेकिन मालिकों का कहना है कि रोजाना का खर्च बढ़ गया है।

 

मालिकों की पीड़ा: माइलेज गिरा, खर्च बढ़ा

 

सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो देखकर लगता है जैसे पूरा देश E20 के खिलाफ खड़ा हो गया है। दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु समेत कई शहरों में लोग पेट्रोल पंपों पर शिकायत कर रहे हैं। एक बाइक मालिक ने बताया, “पहले 50 किमी/लीटर चलती थी, अब 40 पर आ गई।” कार मालिकों का कहना है कि इंजन में नॉकिंग हो रही है, पिकअप कम हुई है और सर्विसिंग का खर्च दोगुना हो गया।

 

कुछ मामलों में गाड़ियां बीच रास्ते में बंद हुईं। यूट्यूबर्स और आम लोगों के दावों में 10-20% माइलेज घाटे की बात है। जबकि सरकार और तेल मंत्रालय मानते हैं कि 3-5% घाटा स्वाभाविक है। सवाल उठता है… इतना बड़ा फर्क क्यों? क्या मिलावट वाकई इतनी फैली हुई है या E20 की कम एनर्जी डेंसिटी का असर ज्यादा है?

 

मोदी सरकार ने इस नीति को बिना व्यापक जन जागरूकता और पुरानी गाड़ियों के लिए बैकअप प्लान के लागू कर दिया। विपक्ष का आरोप है कि इसे किसानों और उद्योग के हित में ठीक बताया जा रहा है, लेकिन आम उपभोक्ता की चिंताओं को नजरअंदाज किया जा रहा है। केजरीवाल ने सही कहा कि सरकार लोगों पर E20 थोप रही है और विकल्प नहीं दे रही।

 

केजरीवाल का हमला

 

आप सुप्रीमो अरविंद केजरीवाल ने इस मुद्दे को जन आंदोलन का रूप दे दिया। StopE20petrol.com पर हस्ताक्षर अभियान चलाकर उन्होंने PM मोदी से अपील की है कि विकल्प दें  E10 या प्यूर पेट्रोल भी उपलब्ध हो। केजरीवाल का कहना है कि बिना तैयारी के यह नीति लागू की गई, जिससे वाहन मालिकों का नुकसान हो रहा है। उन्होंने कीमत कम करने की भी मांग की क्योंकि माइलेज घटा है।

राजनीति तो हो ही रही है। विपक्ष इसे मोदी सरकार की जल्दबाजी और आम आदमी विरोधी नीति बता रहा है। जबकि BJP इसे राष्ट्रीय हित का मुद्दा बता रही है। लेकिन सच्चाई यह है कि जब नीति आम लोगों को परेशान कर रही हो तो सरकार को सुनना चाहिए, न कि सिर्फ ‘मिलावट’ का बहाना बनाना चाहिए।

 

 मोदी सरकार का बचाव: मिलावट पर जीरो टॉलरेंस

 

पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने साफ कहा तय मानकों वाला E20 सुरक्षित है। अगर समस्या आ रही है तो वजह मिलावट, खराब स्टोरेज या सप्लाई चेन की गड़बड़ी है। केंद्र ने सभी राज्यों को सख्त निर्देश दिए हैं कि फ्यूल क्वालिटी से कोई समझौता नहीं होगा। दोषियों पर कड़ी कार्रवाई होगी।

 

सरकार के मुताबिक E20 पर सालों की टेस्टिंग हुई है। इससे उत्सर्जन कम होता है, इंजन क्लीन रहता है और ऑक्टेन बढ़ने से परफॉर्मेंस बेहतर होनी चाहिए। एथनॉल ब्लेंडिंग से अब तक किसानों को भारी भुगतान हुआ है और विदेशी मुद्रा बचत भी हुई।

 

लेकिन सवाल बाकी

सरकार ने अब तक कितने मिलावट के मामले पकड़े? कितनों पर कार्रवाई हुई? ये आंकड़े सार्वजनिक क्यों नहीं? पारदर्शिता की कमी से भ्रम और बढ़ रहा है।

 

 E20 के फायदे: तथ्य भी हैं

 

ईमानदारी से देखें तो E20 के कुछ फायदे भी हैं। भारत जैसे देश में जहां तेल आयात पर अरबों डॉलर खर्च होते हैं, एथनॉल ब्लेंडिंग से निर्भरता कम होती है। गन्ना किसानों को नया बाजार मिला। ब्राजील जैसे देश लंबे समय से हाई ब्लेंडिंग इस्तेमाल कर रहे हैं। अगर सही तरीके से लागू किया जाए तो पर्यावरण और अर्थव्यवस्था दोनों को लाभ हो सकता है।

 

फिर भी, आलोचना जायज है। ट्रांजिशन बहुत तेज था। पुरानी गाड़ियों के मालिकों को अपग्रेड किट या सब्सिडी नहीं दी गई। पेट्रोल की कीमत E20 के कम एनर्जी कंटेंट को देखते हुए समायोजित नहीं की गई। विकल्प न देने से उपभोक्ता मजबूर हैं।

 

 समाधान क्या हो सकता है?

 

पेट्रोल पंपों पर सख्त क्वालिटी चेकिंग और रियल टाइम मॉनिटरिंग।

पुरानी गाड़ियों के लिए मुफ्त या सब्सिडी वाले अपग्रेड किट।

E10 या प्यूर पेट्रोल का विकल्प कम से कम बड़े शहरों में उपलब्ध कराना।

कीमत में समायोजन ताकि माइलेज घाटे की भरपाई हो।

सरकार द्वारा स्वतंत्र सर्वे और आंकड़े सार्वजनिक करना।

 

विकास की दौड़ में अगर आम आदमी कुचल दिया जाए तो वह विकास किस काम का?

 

सरकार को सुनना होगा

 

E20 पेट्रोल विवाद सिर्फ ईंधन का नहीं, बल्कि नीति बनाने और लागू करने के तरीके का है। मोदी सरकार ने कई क्षेत्रों में सुधार किए हैं, लेकिन यहां तैयारी की कमी दिखी। केजरीवाल जैसे विपक्षी नेता इसे राजनीतिक मुद्दा बना रहे हैं, जो लोकतंत्र में स्वाभाविक है। लेकिन सरकार को भी अपनी कमियों को स्वीकार कर सुधार करना चाहिए।

 

लोगों की शिकायतें वायरल हो रही हैं। अगर समय रहते ध्यान नहीं दिया गया तो यह असंतोष बड़ा आंदोलन बन सकता है। E20 को सफल बनाने के लिए मजबूत इच्छाशक्ति, पारदर्शिता और उपभोक्ता हित जरूरी है। फिलहाल, वाहन मालिक सावधानी बरतें, प्रमाणित पंप चुनें, नियमित सर्विसिंग करवाएं और अपनी शिकायतें दर्ज कराएं।

 

सरकार अगर मिलावट रोकने के साथ-साथ लोगों की समस्याओं का समाधान निकालेगी तो यह विवाद अवसर बन सकता है। वरना, E20 का सपना आम आदमी के लिए महंगा साबित होगा।

 

Youthwings