क्या भारत में बच्चों के सपने JEE-NEET तक कैद हैं? राहुल गांधी के बयान से छिड़ी बड़ी बहस

NEP 2020 का जुमला, बजट की कमी और स्किल इंडिया की नाकामी… राहुल गांधी ने उजागर की सच्चाई

 

राहुल गांधी ने कोटा जैसे कोचिंग हब में छात्रों और अभिभावकों से संवाद करते हुए केंद्र सरकार की शिक्षा व्यवस्था पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने इसे “एक्सटॉर्शन मशीन” और “रिजेक्शन सिस्टम” करार दिया। भारतीय शिक्षा प्रणाली युवाओं को डॉक्टर, इंजीनियर, वकील, IAS और सेना जैसे कुछ चुनिंदा करियर तक सीमित रखकर उनके सपनों को कुचल रही है। लाखों युवा NEET, JEE, UPSC जैसी परीक्षाओं में असफल होकर मानसिक तनाव, कर्ज और निराशा का शिकार हो रहे हैं। मोदी सरकार की नीतियां इस संकट को और गहरा कर रही हैं।

 

सरकार दावा करती है कि नई शिक्षा नीति (NEP) 2020 क्रांतिकारी सुधार लाई है, लेकिन पांच साल बाद जमीनी हकीकत उलट है। NEP में 6 प्रतिशत GDP शिक्षा पर खर्च का लक्ष्य रखा गया, लेकिन वास्तविक खर्च 4.1-4.2 प्रतिशत के आसपास अटका हुआ है। केंद्रीय बजट में शिक्षा आवंटन GDP का मुश्किल से 0.36-0.4 प्रतिशत ही है। संसदीय समितियां और विशेषज्ञ बार-बार चेतावानी दे चुके हैं कि यह निवेश अपर्याप्त है, फिर भी सरकार प्राइवेटाइजेशन पर जोर दे रही है, जबकि राहुल गांधी सही कहते हैं कि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के लिए सरकारी निवेश बढ़ाना जरूरी है।

 

परीक्षा संस्कृति और कोचिंग माफिया का शोषण

NEET में 22 लाख से ज्यादा छात्र भाग लेते हैं। परिवार सालाना 1.32 लाख करोड़ रुपये खर्च करते हैं जो केंद्र के पूरे शिक्षा बजट के बराबर है। फिर भी सफलता दर बेहद कम.. 3000 में से महज 1 IAS, 30 IIT और 180 MBBS सीटें। पेपर लीक, घोटाले और कोचिंग संस्थानों का शोषण आम बात हो गया है। मोदी सरकार के कार्यकाल में पेपर लीक की घटनाएं बढ़ी हैं, लेकिन ठोस सुधार नहीं हुए। 80 प्रतिशत इंजीनियर बेरोजगार या अंडरएम्प्लॉयड हैं। युवा बेरोजगारी (15-29 आयु वर्ग) 9.9 से 16 प्रतिशत के बीच बनी हुई है। ग्रेजुएट बेरोजगारी और भी अधिक है।

 

सरकार की स्किल इंडिया मिशन (PMKVY) की CAG ऑडिट में जमकर किरकिरी हुई है। हजारों करोड़ खर्च के बावजूद ट्रेनिंग शॉर्ट-टर्म, प्लेसमेंट दर बेहद कम (कई रिपोर्ट्स में 20-40 प्रतिशत), घोस्ट ट्रेनी और फर्जी सर्टिफिकेट आम हैं। उद्योग की जरूरत के अनुसार स्किलिंग नहीं हो रही। वोकेशनल एजुकेशन को मुख्यधारा में लाने का NEP का वादा ज्यादातर राज्यों में कागजी है। कई जगह अनुदेशक नहीं मिल रहे, इंफ्रास्ट्रक्चर कमजोर और इंडस्ट्री लिंकेज नदारद।

 

नए विकल्पों की अनदेखी

समस्या विकल्पों की कमी नहीं, बल्कि जागरूकता, मार्गदर्शन और नीतिगत इच्छाशक्ति की है। AI, डेटा साइंस, साइबर सिक्योरिटी, रोबोटिक्स, डिजिटल मार्केटिंग, गेमिंग, रिन्यूएबल एनर्जी, एग्री-टेक जैसे क्षेत्र तेजी से बढ़ रहे हैं। लेकिन स्कूलों में करियर काउंसलिंग 8वीं-9वीं से अनिवार्य नहीं हुई। रट्टू शिक्षा, मार्क्स पर जोर और परीक्षा-केंद्रित सिस्टम जारी है। सामाजिक प्रतिष्ठा प्लंबर, इलेक्ट्रिशियन, तकनीशियन जैसे पेशों को कम आंकती है सरकार ने इसे बदलने के लिए ठोस कदम नहीं उठाए।

 

उद्यमिता शिक्षा, इंटर्नशिप और इंडस्ट्री-संबंध को बढ़ावा देने में भी सुस्ती है। नतीजा? युवा नौकरी मांगने वाले बन रहे हैं, नौकरी देने वाले नहीं। डेमोग्राफिक डिविडेंड का फायदा उठाने के बजाय भारत युवा बेरोजगारी और फ्रस्ट्रेशन का शिकार हो रहा है।

 

“विकसित भारत” की बात खोखली

राहुल गांधी का मुद्दा युवाओं की पीड़ा को छूता है। NEET-JEE के दबाव, पेपर लीक और बेरोजगारी के दौर में मोदी सरकार की “विकसित भारत” की बात खोखली साबित हो रही है। केवल नारे और आंशिक योजनाएं काफी नहीं।

जरूरी बदलाव

शिक्षा पर GDP का 6% खर्च सुनिश्चित करें, प्राइवेटाइजेशन पर अंधा भरोसा छोड़ें।

परीक्षा सुधार: एक परीक्षा से भविष्य तय न हो, निरंतर मूल्यांकन।

करियर काउंसलिंग और स्किल एजुकेशन को अनिवार्य बनाएं।

वोकेशनल कोर्स को प्रतिष्ठा दें और इंडस्ट्री पार्टनरशिप मजबूत करें।

स्किल इंडिया को CAG की कमियों से सीखकर ओवरहॉल करें  डिमांड ड्रिवन, हाई क्वालिटी ट्रेनिंग और प्लेसमेंट गारंटी।

 

मोदी सरकार अगर युवाओं के भविष्य को लेकर गंभीर है तो समस्या बताने से आगे बढ़कर ठोस सुधार मॉडल पेश करे। राहुल गांधी का यह आह्वान सिर्फ आलोचना नहीं, बल्कि व्यवस्था परिवर्तन की मांग है। शिक्षा व्यवस्था को “रिजेक्शन मशीन” से “सपनों को साकार करने वाली मशीन” बनाना होगा। तभी बच्चे अपनी रुचि के क्षेत्र में संतुष्ट और सक्षम बन सकेंगे।

Youthwings