पेट्रोल-डीजल से लेकर खाने-पीने तक सब महंगा.. जेब ढीली करने को तैयार रहिए! आने वाले महीने और मुश्किल होंगे?

थोक महंगाई 43 महीनों के उच्चतम स्तर 9.68% पर, खुदरा महंगाई भी 16 महीने के पीक पर

 

देश में महंगाई एक बार फिर सिर उठा रही है। वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय द्वारा आज जारी आंकड़ों के अनुसार, मई 2026 में थोक मूल्य सूचकांक (WPI) आधारित महंगाई दर बढ़कर 9.68 प्रतिशत हो गई, जो अप्रैल के 8.26 प्रतिशत से काफी अधिक है। यह आंकड़ा पिछले 43 महीनों का सबसे ऊंचा स्तर है। सितंबर 2022 के बाद इतनी तेज थोक महंगाई देखने को नहीं मिली थी।

 

यह वृद्धि महज संख्याओं का खेल नहीं, बल्कि आम जनता की रोजमर्रा की जिंदगी पर भारी पड़ने वाली विपदा है। सरकार दावा करती है कि अर्थव्यवस्था मजबूत हो रही है, लेकिन हकीकत यह है कि ऊर्जा संकट, खाद्य पदार्थों की बढ़ती कीमतें और मैन्युफैक्चर्ड उत्पादों की महंगाई आम आदमी की कमर तोड़ रही हैं।

 

थोक महंगाई का मुख्य कारण

थोक महंगाई में सबसे बड़ी भूमिका ईंधन और बिजली श्रेणी की रही, जहां महंगाई दर अप्रैल के 24.89 प्रतिशत से बढ़कर मई में 30.33 प्रतिशत पहुंच गई। कच्चे पेट्रोलियम की महंगाई तो 61.51 प्रतिशत तक जा पहुंची।

 

इसकी जड़ पश्चिम एशिया (मध्य पूर्व) संकट और हॉर्मुज जलडमरूमध्य के अवरोध में है, जहां से भारत अपना अधिकांश कच्चा तेल आयात करता है। सरकार की विदेश नीति और कूटनीतिक प्रयासों की नाकामी साफ दिख रही है। जब दुनिया के अन्य देश ऊर्जा सुरक्षा के लिए वैकल्पिक स्रोत तलाश रहे थे, तब भारत अभी भी हॉर्मुज पर निर्भर रहा। परिणामस्वरूप, आयातित महंगाई (imported inflation) ने पूरे अर्थतंत्र को झकझोर दिया। अनाज, तेल, खाने-पीने की चीजें सब महंगे हो गए।

 

प्राथमिक वस्तुओं (primary articles) की महंगाई 3.78% से बढ़कर 4.99% हो गई। खाद्य सूचकांक 3.11% से 4.49% पर पहुंच गया। मैन्युफैक्चरिंग उत्पादों की महंगाई भी 6.68% से 7.48% हो गई।

 

 खुदरा महंगाई भी बढ़ी, RBI ने बढ़ाया अनुमान

थोक महंगाई का असर खुदरा बाजार पर भी पड़ा। मई में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) आधारित महंगाई 3.93 प्रतिशत पहुंच गई, जो अप्रैल के 3.48 प्रतिशत से ज्यादा है और 16 महीनों का उच्चतम स्तर है। खाद्य महंगाई भी बढ़कर 4.78% हो गई।

 

भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने भी चालू वित्त वर्ष 2026-27 के लिए महंगाई का अनुमान 4.6% से बढ़ाकर 5.1% कर दिया है। RBI ने वैश्विक ऊर्जा कीमतों में वृद्धि और कच्चे माल की बढ़ती लागत को मुख्य वजह बताया।

 

सरकार की नाकामी? आयात पर निर्भरता और सुधारों की कमी

यह महंगाई संकट सरकार की पुरानी नीतिगत चूक का नतीजा है। भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक देश है, फिर भी पिछले वर्षों में रणनीतिक पेट्रोलियम रिजर्व बढ़ाने, घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देने या नवीकरणीय ऊर्जा पर तेजी से निवेश करने में सरकार नाकाम रही। हॉर्मुज जैसे संकट के समय कोई बैकअप प्लान नजर नहीं आया।

 

कृषि क्षेत्र में भी सुधार अधूरे पड़े हैं। MSP, भंडारण सुविधाओं की कमी और सप्लाई चेन की खराबी के कारण छोटी-मोटी गड़बड़ियों से भी कीमतें आसमान छूती हैं। मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में इनपुट कॉस्ट बढ़ने से छोटे उद्योग बंदी के कगार पर हैं, रोजगार घट रहा है।

 

सरकार सब्सिडी देकर खुदरा महंगाई को नियंत्रित करने का दावा करती है, लेकिन यह अस्थायी राहत है। लंबे समय में राजकोषीय घाटा बढ़ेगा, जिसका बोझ फिर टैक्सपेयर पर पड़ेगा। विपक्ष और अर्थशास्त्री पहले से चेतावनी दे रहे थे कि भू-राजनीतिक जोखिमों को नजरअंदाज करना महंगा पड़ेगा, लेकिन सरकार सुनने को तैयार नहीं हुई।

 

 आम आदमी पर असर

महंगाई का सबसे ज्यादा असर मध्यम वर्ग और गरीबों पर पड़ रहा है। पेट्रोल-डीजल महंगे होने से ट्रांसपोर्ट कॉस्ट बढ़ा, किराने का सामान, दूध, सब्जियां, दवाइयां सब महंगी हो गईं। EMI, किराया, शिक्षा और स्वास्थ्य व्यय पहले से ही बोझ हैं। RBI का बढ़ा अनुमान दर्शाता है कि आने वाले महीनों में स्थिति और खराब हो सकती है, खासकर अगर मानसून खराब रहा या वैश्विक संकट लंबा चला।

 

सरकार को अब चुप्पी तोड़कर ठोस कदम उठाने चाहिए। ऊर्जा आयात को विविधीकरण, घरेलू तेल-गैस उत्पादन बढ़ाना, कृषि सुधार, छोटे उद्योगों को सपोर्ट और रणनीतिक स्टॉक बनाना समय की मांग है। अन्यथा, यह महंगाई न केवल विकास को रोकेगी बल्कि सामाजिक अस्थिरता भी पैदा कर सकती है।

 

जनता उम्मीद करती है कि “अमृत काल” में महंगाई का बोझ न बढ़े, बल्कि राहत मिले। लेकिन फिलहाल, आंकड़े साफ बता रहे हैं कि सरकार की नीतियां आम आदमी के लिए बोझ बन गई हैं!

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