‘थलापति’ से जननायक तक: तमिलनाडु की राजनीति में विजय की ऐतिहासिक जीत से टूटा 60 साल पुराना सिस्टम
साल 1991 में आई तमिल फिल्म Idhayam की एक लाइन थी—“अप्रैल-मई की इस तपती गर्मी में हरियाली कहीं नहीं दिखती, सब कुछ बिखरा और उबाऊ लगता है।” तमिलनाडु की राजनीति को देखने वाले कई युवाओं के लिए यह लाइन हकीकत जैसी ही रही। लंबे समय तक राज्य की सियासत कुछ चुनिंदा चेहरों और दलों के इर्द-गिर्द ही घूमती रही।
दो दलों के बीच सिमटी राजनीति
बचपन से लेकर युवावस्था तक तमिलनाडु की राजनीति में मुख्य रूप से J. Jayalalithaa की AIADMK और M. Karunanidhi की DMK का ही दबदबा रहा। करीब छह दशकों तक यही दोनों दल बारी-बारी से सत्ता में आते रहे। तमिल अस्मिता, भाषा और क्षेत्रीय गर्व जैसे मुद्दे राजनीति के केंद्र में रहे, लेकिन आम जनता की बुनियादी समस्याएं अक्सर पीछे छूटती नजर आईं।
बदलाव की जरूरत क्यों महसूस हुई
राज्य के कई हिस्सों में बिजली कटौती, कमजोर बुनियादी ढांचा और भ्रष्टाचार जैसे मुद्दे लंबे समय तक बने रहे। चेन्नई जैसे शहरों में भी लोगों को गर्मी और उमस के साथ-साथ इन समस्याओं का सामना करना पड़ता था। लेकिन राजनीतिक विमर्श अक्सर व्यक्तित्व आधारित रहा, जहां नेताओं की छवि ही सब कुछ तय करती थी। ऐसे माहौल में एक मजबूत विकल्प की कमी साफ महसूस होती थी।
सिनेमा से राजनीति तक की परंपरा
तमिलनाडु की राजनीति में फिल्मी सितारों का प्रभाव नया नहीं है। M. G. Ramachandran, N. T. Rama Rao, जयललिता और करुणानिधि जैसे नेताओं ने फिल्मों से राजनीति में कदम रखकर बड़ा प्रभाव डाला। इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए जब अभिनेता विजय ने राजनीति में एंट्री की, तो शुरुआत में इसे ज्यादा गंभीरता से नहीं लिया गया।
एग्जिट पोल को गलत साबित करती जीत
चुनाव से पहले ज्यादातर एग्जिट पोल विजय की पार्टी को बहुत कम सीटें दे रहे थे। लेकिन नतीजों में बड़ा उलटफेर देखने को मिला। चेन्नई से लेकर मदुरै और कोंगू क्षेत्र तक विजय ने अपने पहले ही चुनाव में प्रभावशाली प्रदर्शन करते हुए पारंपरिक दलों को कड़ी चुनौती दी।
नई राजनीति की शुरुआत
विजय की इस सफलता को इसलिए ऐतिहासिक माना जा रहा है क्योंकि इससे तमिलनाडु की दशकों पुरानी दो-दलीय व्यवस्था को झटका लगा है। उनकी पार्टी का प्रतीक ‘सीटी’ है, जो बदलाव और नई सोच का संकेत बनकर उभरा है।
यह जीत सिर्फ चुनावी सफलता नहीं, बल्कि राज्य की राजनीति में एक नए दौर की शुरुआत के रूप में देखी जा रही है, जहां मतदाता पारंपरिक विकल्पों से आगे बढ़कर नए नेतृत्व को मौका देने के लिए तैयार नजर आ रहे हैं।
