कुर्सी के लिए फर्जीवाड़े का आरोप: कैसे एक सस्पेंशन ने खड़ी कर दी 60 बागी विधायकों की फौज? जानिए पूरा सियासी ड्रामा

कोलकाता। पश्चिम बंगाल की राजनीति में इन दिनों एक ऐसा अजब-गजब ‘खेला’ चल रहा है, जिसने सबको हैरान कर दिया है। खुद मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की पार्टी में ऐसी भयंकर बगावत हुई है कि पार्टी दो फाड़ हो गई है। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि बागी गुट के पास बहुमत है और वफादार गुट अल्पमत में आ गया है!

इस बीच कलकत्ता हाईकोर्ट ने भी बागी गुट को बड़ी राहत देते हुए फैसला सुनाया है कि टीएमसी के बागी विधायक ऋतब्रत बनर्जी ही फिलहाल विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष बने रहेंगे।

कोर्ट में क्या हुआ? ‘दीदी’ के खास को झटका

ममता बनर्जी के वफादार और पूर्व मुख्यमंत्री की पसंद के नेता शोभनदेव चट्टोपाध्याय को नेता प्रतिपक्ष बनाने की मांग को लेकर हाईकोर्ट में याचिका दायर की गई थी। इसमें विधानसभा अध्यक्ष रथींद्र बोस के उस फैसले को चुनौती दी गई थी, जिसमें उन्होंने बागी ऋतब्रत बनर्जी को नेता प्रतिपक्ष मान लिया था।

सिंगल बेंच का फैसला: न्यायमूर्ति कृष्णा राव की एकल पीठ ने इस मामले में दखल देने और अंतरिम राहत देने से साफ इनकार कर दिया है।

डिवीजन बेंच में दौड़: सिंगल बेंच से झटका लगने के बाद अब शोभनदेव चट्टोपाध्याय ने 28 जुलाई की अगली सुनवाई से पहले ही हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच का दरवाजा खटखटा लिया है।

बंगाल का अजब-गजब गणित: बागी 60, वफादार सिर्फ 20!

इस पूरी कहानी का सबसे दिलचस्प और हैरान करने वाला हिस्सा विधायकों का गणित है। वर्तमान में 294 सदस्यीय पश्चिम बंगाल विधानसभा में तृणमूल कांग्रेस (TMC) के पास कुल 80 विधायक हैं।

बागी गुट का दबदबा: ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले विद्रोही गुट का दावा है कि उनके पास 60 से 64 विधायकों का बंपर समर्थन है।

अल्पमत में आलाकमान: वहीं, पार्टी सुप्रीमो ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी के प्रति वफादार मूल तृणमूल गुट के पास फिलहाल केवल 20 विधायक ही बचे हैं।

फर्जी हस्ताक्षर से शुरू हुई थी बगावत की ‘स्क्रिप्ट’

इस पूरी बगावत की कहानी किसी सस्पेंस फिल्म जैसी है। विवाद तब शुरू हुआ जब विधानसभा अध्यक्ष को एक प्रस्ताव सौंपा गया, जिसमें शोभनदेव चट्टोपाध्याय को नेता प्रतिपक्ष, असीमा पात्रा को उपनेता और फिरहाद हकीम को मुख्य सचेतक नामित किया गया था।

यहां से पलटी बाजी

ऋतब्रत बनर्जी और संदीपन साहा ने भंडाफोड़ किया कि इस प्रस्ताव में कुछ विधायकों के ‘हस्ताक्षर जाली’ हैं। मामले की गंभीरता को देखते हुए CID ने जांच शुरू कर दी। जाली हस्ताक्षरों का मुद्दा उठाने पर टीएमसी आलाकमान ने तुरंत ऋतब्रत और संदीपन को ही पार्टी से निलंबित कर दिया। इस सस्पेंशन से नाराज होकर ऋतब्रत बनर्जी ने 60 विधायकों को अपने पाले में कर लिया और खुद को बहुमत वाला गुट घोषित करते हुए विधानसभा अध्यक्ष को नया प्रस्ताव सौंप दिया।

विधानसभा अध्यक्ष ने इस नए प्रस्ताव को स्वीकार करते हुए ऋतब्रत बनर्जी को ही आधिकारिक ‘नेता प्रतिपक्ष’ मान लिया, जिसे लेकर अब हाईकोर्ट में कानूनी जंग लड़ी जा रही है। अब सबकी नजरें कलकत्ता हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच पर टिकी हैं कि क्या बंगाल के इस अजब-गजब सियासी ड्रामे में कोई नया ट्विस्ट आता है या बागी गुट का विधानसभा पर कब्जा बरकरार रहता है!

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