USD vs INR: रुपया पहली बार 90 के पार, डॉलर के मुकाबले रिकॉर्ड लो—जानें गिरावट की पूरी वजहें…
USD vs INR
USD vs INR: बुधवार, 3 दिसंबर की शुरुआती ट्रेडिंग में भारतीय रुपये ने इतिहास में सबसे खराब स्तर छू लिया। अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपया 90.14 पर खुला, जो अब तक का सबसे निचला स्तर है। यह लगातार तीसरा दिन रहा जब करेंसी ने नया लो बनाया है।
मौजूदा परिस्थितियों में रुपये पर कई तरफ से दबाव बन रहा है, जिसमें—FPI/FII की भारी बिकवाली, भारत–अमेरिका ट्रेड डील को लेकर अनिश्चितता, एशियाई करेंसी पर बढ़ता बाहरी दबाव और वैश्विक स्तर पर डॉलर की मजबूती सब मिलकर रुपये को कमजोर कर रहे हैं।
90/$ का स्तर टूटना क्यों बड़ा संकेत है?
यह सिर्फ एक नंबर नहीं, बल्कि भारतीय अर्थव्यवस्था के प्रति बाज़ार के भरोसे में बदलाव का संकेत है। जब किसी करेंसी का महत्वपूर्ण “साइकोलॉजिकल लेवल” टूटता है, तो आगे की दिशा अक्सर और अधिक कमजोरी की ओर बढ़ सकती है।
डॉलर इंडेक्स की मजबूती दुनिया की करेंसी पर भारी
पिछले कुछ हफ्तों से डॉलर इंडेक्स लगातार ऊपर जा रहा है। जिसका कारण— ग्लोबल अनिश्चितता, अमेरिका में ब्याज दरों को लेकर मिश्रित संकेत, सुरक्षित निवेश के लिए डॉलर में शिफ्ट, विश्वभर की करेंसी, खासकर एशियाई FX, इसके दबाव में हैं।
FII की भारी बिकवाली से बढ़ा दबाव
भारतीय बाजारों से पिछले दिनों में विदेशी निवेशकों ने बड़े पैमाने पर पैसा निकाला है। जब FIIs डॉलर खरीदते हैं और निवेश निकालते हैं, तो डॉलर की मांग बढ़ती है और रुपया स्वाभाविक रूप से कमजोर होता है, इसी बिकवाली से निफ्टी 50 भी 26,000 से नीचे और सेंसेक्स 200 अंकों की गिरावट पर आ गया।
RBI की सीमित दखलअंदाजी—बाजार को संकेत क्या मिला?
विशेषज्ञों के अनुसार RBI आमतौर पर रुपये को स्थिर रखने के लिए डॉलर बेचकर बाजार में दखल देता है। मगर इस बार 90/$ का टूटना दिखाता है कि या तो RBI हस्तक्षेप नहीं कर रहा या फिर बाजार का दबाव इतना बड़ा है कि दखल असर नहीं कर पा रहा, इसके चलते बाजार में “RBI will let rupee adjust naturally” जैसी धारणा बन रही है।
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इस साल सबसे खराब प्रदर्शन करने वाली एशियाई करेंसी बना रुपया
2025 की शुरुआत से अब तक रुपया लगभग 5% गिर चुका है। इस गिरावट ने इसे एशिया की सबसे कमजोर प्रदर्शन करने वाली करेंसी बना दिया है।
भारत–अमेरिका ट्रेड डील पर अनिश्चितता भी दबाव की वजह
जानकारों का कहना है कि यदि इस महीने भारत–US ट्रेड डील फाइनल हो जाती है, तो रुपये को स्थिरता मिल सकती है।
लेकिन डील में टैरिफ कैसे होंगे, किस सेक्टर पर असर पड़ेगा, अमेरिका भारत से क्या कंसेशन मांगेगा, इन सवालों के जवाब मिलने तक विदेशी निवेशक जोखिम नहीं लेना चाहते।
रुपये पर येन कैरी ट्रेड का असर
एशिया भर में येन कैरी ट्रेड के अनवाइंडिंग के शुरुआती संकेत मिल रहे हैं। इससे भारी विदेशी धन तेज़ी से शिफ्ट हो रहा है, जो एशियाई करेंसी के लिए एक नया दबाव बना रहा है।
90/$ पार होने का वास्तविक असर—सिर्फ मनोवैज्ञानिक नहीं, आर्थिक भी
1. आयात महंगा होगा
भारत कच्चे तेल से लेकर इलेक्ट्रॉनिक्स तक भारी मात्रा में आयात करता है।
रुपया कमजोर → डॉलर में भुगतान महंगा → कीमतें बढ़ेंगी।
2. पेट्रोल-डीजल की लागत बढ़ने का डर
अगर अंतरराष्ट्रीय तेल कीमतें स्थिर भी रहें, कमजोर रुपया भारत के आयात बिल को बढ़ा सकता है। इससे घरेलू पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर असर पड़ सकता है।
3. इलेक्ट्रॉनिक्स, मोबाइल, मशीनरी के दाम बढ़ने की आशंका
क्योंकि इनका अधिकांश कंपोनेंट आयात किया जाता है।
4. विदेश में पढ़ाई और यात्रा महंगी
डॉलर में भुगतान होने के कारण छात्रों और टूरिस्ट्स की जेब पर सीधा असर पड़ेगा।
5. निर्यातकों को राहत—पर सीमित
रुपया गिरने से निर्यातकों को फायदा होता है, पर इतनी ज्यादा अस्थिरता बिजनेस प्लानिंग को कमजोर कर देती है।
आगे क्या—RBI क्या कदम उठा सकता है?
जरूरत पड़ने पर RBI डॉलर बेचकर बाजार में लिक्विडिटी समायोजित कर सकता है
OMO (Open Market Operations) के जरिए बॉन्ड यील्ड नियंत्रित कर सकता है
या बाजार को “कॉम्फर्ट सिग्नल” देने के लिए प्रेस स्टेटमेंट जारी कर सकता है
फिलहाल संकेत यही है कि RBI ओवर-इंटरवेंशन से बचते हुए बाजार को खुद एडजस्ट करने दे रहा है।
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