हिड़मा एनकाउंटर विवाद: नक्सली कमेटी ने फर्जी मुठभेड़ का आरोप लगाया, 23 नवंबर को देशव्यापी प्रतिरोध दिवस का ऐलान
जगदलपुर। बस्तर के मोस्ट वांटेड नक्सली कमांडर मांडवी हिड़मा (माडवी हिड़मा) की मौत अब एक बड़े विवाद का केंद्र बन गई है। 18 नवंबर 2025 को आंध्र प्रदेश के अल्लूरी सीताराम राजू जिले के मारेड़ुमिल्ली जंगल में सुरक्षा बलों के साथ मुठभेड़ में हिड़मा सहित उनकी पत्नी राजे (राजक्का) और चार अन्य नक्सलियों की मौत हो गई। इस ऑपरेशन को सुरक्षा एजेंसियां नक्सलवाद के खिलाफ ऐतिहासिक सफलता बता रही हैं, लेकिन नक्सलियों की केंद्रीय कमेटी ने इसे ‘फर्जी मुठभेड़’ करार देते हुए गंभीर आरोप लगाए हैं।
नक्सली कमेटी का प्रेस नोट: सरेंडर की कोशिश के बाद हत्या का दावा
केंद्रीय कमेटी के प्रवक्ता अभय ने 20-21 नवंबर को जारी प्रेस नोट में दावा किया है कि हिड़मा इलाज के लिए विजयवाड़ा गए थे, जहां उन्हें पकड़ लिया गया। सुरक्षा बल उन्हें जिंदा सरेंडर कराना चाहते थे, लेकिन असफल होने पर हिड़मा और उनके साथ मौजूद छह अन्य नक्सलियों की हत्या कर दी गई। कमेटी का कहना है कि यह मौत महज एक ऑपरेशन नहीं, बल्कि नक्सली शीर्ष नेतृत्व को खत्म करने की सुनियोजित रणनीति का हिस्सा है। प्रेस नोट में पुलिस पर मानवाधिकार उल्लंघन के आरोप लगाए गए हैं और जनता से 23 नवंबर को ‘देशव्यापी प्रतिरोध दिवस’ मनाने की अपील की गई है। नक्सली संगठन ने इसे ‘बूटका एंकाउंटर’ (फर्जी मुठभेड़) बताते हुए आंध्र प्रदेश के राम्पाचोडावरम में भी इसी तरह की घटनाओं का जिक्र किया है।
हिड़मा को नक्सलियों का ‘हीरो’ माना जाता था। वे पीपुल्स लिबरेशन गोरिल्ला आर्मी (पीएलजीए) बटालियन नंबर-1 के कमांडर थे, जो संगठन की सबसे घातक और मोबाइल यूनिट थी। कमेटी का मानना है कि उनकी मौत से संगठन को झटका लगा है, लेकिन वे अपनी रणनीति को नए सिरे से गढ़ेंगे।
सुरक्षा एजेंसियों का खंडन: वैधानिक कार्रवाई, राजनीतिक प्रचार
सुरक्षा एजेंसियां नक्सली आरोपों को सिरे से खारिज कर रही हैं। बस्तर रेंज के आईजी सुंदरराज पत्तिलिंगम ने इसे ‘ऐतिहासिक सफलता’ बताते हुए कहा कि हिड़मा की मौत न केवल छत्तीसगढ़, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना के लिए, बल्कि पूरे देश के लिए नक्सलवाद के खिलाफ निर्णायक मोड़ है। छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने इसे ‘लेफ्ट विंग एक्सट्रीमिज्म के खिलाफ निर्णायक उपलब्धि’ कहा, जबकि केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने ऑपरेशन की कमान संभालने वाले अधिकारियों से बात की।
एजेंसियों के मुताबिक, यह मुठभेड़ ग्रेहाउंड्स (आंध्र की एंटी-नक्सल यूनिट), सीआरपीएफ की कोबरा और स्थानीय पुलिस की संयुक्त कार्रवाई थी। सुबह 6-7 बजे के बीच हुई गोलीबारी में हिड़मा समूह भाग रहा था, जब उन्हें घेर लिया गया। घटनास्थल से दो एके-47, रिवॉल्वर और पिस्टल बरामद हुए। हिड़मा पर 1 करोड़ रुपये का इनाम था और वे 26 से अधिक हमलों के मास्टरमाइंड थे, जिनमें 2010 का दंतेवाड़ा हमला (76 जवान शहीद), 2013 का झीरम घाटी नरसंहार (27 मौतें, जिसमें कांग्रेस नेता शामिल) और 2021 का सुकमा-बीजापुर हमला (22 जवान शहीद) प्रमुख हैं।
हाई अलर्ट: प्रतिरोध दिवस के ऐलान से सुरक्षा कड़ी
हिड़मा की मौत के बाद बस्तर पहले ही हाई अलर्ट पर था। अब 23 नवंबर के ‘प्रतिरोध दिवस’ के ऐलान से सुकमा, दंतेवाड़ा, बीजापुर और पड़ोसी राज्यों (आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, ओडिशा) में सुरक्षा और सतर्क कर दी गई है। विशेष अभियान चलाए जा रहे हैं, ताकि कोई अप्रिय घटना न हो। 19 नवंबर को ही आंध्र में एक और मुठभेड़ में सात नक्सली मारे गए, जो हिड़मा ऑपरेशन का हिस्सा माना जा रहा है।
हिड़मा की पृष्ठभूमि: बस्तर का ‘घोस्ट कमांडर’
हिड़मा (उम्र 43-51 वर्ष) का जन्म 1981 में सुकमा के पुवर्ती गांव में हुआ था। मात्र 5वीं कक्षा तक पढ़े वे 1990 के दशक में संगठन में शामिल हुए। आदिवासी पृष्ठभूमि से होने के बावजूद, वे सीपीआई (माओइस्ट) की सेंट्रल कमेटी के सबसे युवा सदस्य थे और बस्तर के एकमात्र आदिवासी प्रतिनिधि। जंगल की भौगोलिक जानकारी और गुरिल्ला युद्ध में माहिर हिड़मा को ‘घोस्ट’ कहा जाता था। उनकी चार परतों वाली सुरक्षा व्यवस्था उन्हें वर्षों तक अजेय बनाए रखी। 2025 में ही 1,300 से अधिक नक्सलियों के सरेंडर और कई शीर्ष नेताओं की मौत ने उन्हें कमजोर किया, जिसका फायदा उठाकर सुरक्षा बलों ने उन्हें घेरा।
सोशल मीडिया पर प्रतिक्रियाएं: जश्न से लेकर सवाल तक
हिड़मा की मौत पर सोशल मीडिया पर मिली-जुली प्रतिक्रियाएं हैं। जेएनयू में एबीवीपी कार्यकर्ताओं ने ‘जश्न मार्च’ निकाला, नारे लगाए ‘जो हिड़मा की चाल चलेगा, वो हिड़मा की मौत मरेगा’। वहीं, हिड़मा की मां का रो-रोकर बुरा हाल वायरल हो रहा है। कुछ पोस्ट में उनकी अंतिम यात्रा का जिक्र है, जहां पत्नी राजे के साथ एक ही चिता पर संस्कार किया गया।
