श्री सीमेंट की चूना पत्थर खनन परियोजना के खिलाफ किसान आंदोलन, 55 गांवों की महापंचायत में कंपनी समर्थकों की एंट्री बैन
खैरागढ़ (छत्तीसगढ़)। खैरागढ़-छुईखदान-गंडई जिले के संडी क्षेत्र में श्री सीमेंट लिमिटेड की प्रस्तावित चूना पत्थर खनन और सीमेंट फैक्ट्री परियोजना के खिलाफ किसानों का आंदोलन तेज हो गया है। ग्रामीणों का कहना है कि यह परियोजना उनकी खेती, पानी और आजीविका के लिए विनाशकारी साबित होगी। पिछले अनुभवों से सबक लेते हुए 55 गांवों के हजारों किसानों ने एकजुट होकर विरोध को जनआंदोलन का रूप दे दिया है।
खनन से पानी और खेती पर संकट का डर
किसानों का मुख्य तर्क है कि खनन शुरू होने पर भूजल स्तर गिरेगा, कुएं-हैंडपंप सूखेंगे और खेत बंजर हो जाएंगे। आसपास के क्षेत्रों में पहले से हुए खनन के बाद खेती चौपट होने और गांव खाली होने के उदाहरण उन्होंने गिनाए। कंपनी के सर्वे और अधिकारियों के दौरे से चिंता बढ़ी, तो गांव-गांव बैठकों का सिलसिला शुरू हुआ।
पंडरिया-बिचारपुर भाठा में ऐतिहासिक महापंचायत
हाल ही में पंडरिया-बिचारपुर भाठा में हुई किसान महापंचायत में 55 गांवों से हजारों किसान जुटे। बड़ी संख्या में महिलाओं की भागीदारी ने आंदोलन को पूरे समाज की लड़ाई बना दिया। पंचायत में ‘किसान अधिकार संघर्ष समिति’ का गठन किया गया और संकल्प लिया गया कि परियोजना पूरी तरह रद्द होने तक संघर्ष जारी रहेगा।
महापंचायत के प्रमुख फैसले:
खनन कंपनी के कर्मचारी, परियोजना समर्थक अधिकारी और नेता गांवों में प्रवेश नहीं करेंगे (भ्रम फैलाने के आरोप में)।
पंडरिया भाठा को आंदोलन का स्थायी केंद्र बनाया गया।
परियोजना रद्द होने तक हर महीने किसान पंचायत होगी।
एकता के लिए दक्षिण मुखी हनुमान मंदिर निर्माण का निर्णय।
सामाजिक जिम्मेदारी दिखाते हुए रक्तदान शिविर आयोजित किया गया।
पहले भी बड़े प्रदर्शन
इससे पहले 6 दिसंबर को 200 से अधिक ट्रैक्टरों के काफिले में हजारों ग्रामीणों ने छुईखदान में प्रदर्शन किया, सड़क जाम की और जनसुनवाई रद्द करने की मांग की। भारी विरोध के बाद 11 दिसंबर की प्रस्तावित जनसुनवाई को प्रशासन ने स्थगित कर दिया। 39 गांवों ने लिखित आपत्ति दर्ज की और कई पंचायतों ने ग्रामसभा में परियोजना अस्वीकार कर दी। कंपनी पर सहमति के लिए दबाव और भ्रम फैलाने के आरोप लगे हैं।
यह आंदोलन उपेक्षा और पर्यावरणीय चिंताओं से उपजा है। किसान कहते हैं कि विकास के नाम पर उनकी जमीन-पानी और आने वाली पीढ़ियों का भविष्य दांव पर नहीं लगने देंगे। आंदोलन अब पीछे हटने की स्थिति में नहीं है।
