भूटान ने E20 पेट्रोल लेने से किया इनकार! इथेनॉल ब्लेंडिंग पर फिर छिड़ी बहस…

भूटान ने स्टोरेज इंफ्रास्ट्रक्चर का हवाला देकर E20 पेट्रोल स्वीकार करने से किया इनकार, भारत में भी माइलेज और इंजन प्रदर्शन को लेकर जारी है बहस

 

भारत सरकार द्वारा थोपी गई E20 पेट्रोल नीति अब गंभीर सवालों के घेरे में है। भूटान ने भारतीय ऑयल मार्केटिंग कंपनियों के E20 सप्लाई प्रस्ताव को साफ इनकार कर दिया है। भूटान के डिपार्टमेंट ऑफ ट्रेड ने कहा कि इथेनॉल की हाइग्रोस्कोपिक प्रकृति नमी सोख लेती है जिससे स्टोरेज में समस्या होती है। देश के पुराने अंडरग्राउंड टैंक्स E20 के लिए उपयुक्त नहीं हैं। भूटान ने भारत से सामान्य पेट्रोल की आपूर्ति जारी रखने की मांग की है। यह फैसला सरकार की नीति की कमियों को उजागर करता है।

 

E20 नीति पर सरकार की दावे और वास्तविकता

 

सरकार E20 को ऊर्जा सुरक्षा और किसान कल्याण का प्रतीक बताती है। 2014 से अब तक लाखों करोड़ की विदेशी मुद्रा बचत और किसानों को भुगतान का दावा किया जाता है। लेकिन उपभोक्ता स्तर पर स्थिति अलग है। LocalCircles सर्वे के अनुसार 2022 या उससे पहले की गाड़ियों के 66 से 80 प्रतिशत मालिकों ने 10 प्रतिशत या उससे ज्यादा माइलेज घाटा रिपोर्ट किया है। कई मामलों में 15-20 प्रतिशत तक कमी दर्ज हुई है। इंजन नॉकिंग इंजेक्टर फेलियर और रबर पार्ट्स क्षरण की शिकायतें बढ़ गई हैं।

 

पेट्रोलियम मंत्रालय ने दावों को खारिज किया लेकिन सर्वे आंकड़े सरकार की तैयारियों पर सवाल उठाते हैं। अधिकांश पुरानी गाड़ियां E10 के लिए बनी थीं। अचानक E20 थोपने से करोड़ों वाहन मालिक प्रभावित हुए। सरकार का कहना है कि आधुनिक गाड़ियों में समस्या नहीं है लेकिन सड़कों पर करोड़ों पुरानी गाड़ियां चल रही हैं जिन्हें नजरअंदाज किया गया।

 

 गडकरी परिवार के फायदे पर सवाल

 

केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी E20 के प्रमुख समर्थक रहे। विपक्ष ने आरोप लगाया कि उनके बेटे निखिल गडकरी की CIAN Agro और सारंग गडकरी की Manas Agro जैसी कंपनियां इथेनॉल क्षेत्र में हैं। इन कंपनियों की आय और शेयर वैल्यू में तेज उछाल आया। कांग्रेस ने conflict of interest का मुद्दा उठाया। गडकरी ने इन आरोपों को खारिज किया लेकिन नीति के समय और परिवार की कंपनियों के फायदे पर सवाल बने हुए हैं।

 

सरकार ने E20 को अनिवार्य बना दिया बिना पर्याप्त विकल्प दिए। पेट्रोल पंपों पर सामान्य पेट्रोल का चुनाव मुश्किल है। इससे उपभोक्ताओं पर जबरदस्ती थोपी गई नीति साबित होती है।

 

उपभोक्ता समस्याएं और इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी

 

LocalCircles सर्वे में 52 प्रतिशत पुरानी गाड़ी मालिकों ने असामान्य वियर एंड टियर रिपोर्ट किया। इंजन फ्यूल लाइन टैंक और कार्बोरेटर प्रभावित हुए। चेन्नई जैसे शहरों में लग्जरी कार मालिकों ने लाखों रुपये की मरम्मत खर्च की। इथेनॉल नमी सोखता है जिससे फ्यूल कंटेमिनेशन होता है। भूटान ने यही वजह बताई। भारत में भी स्टोरेज इंफ्रास्ट्रक्चर पूरी तरह तैयार नहीं दिखता।

 

सरकार ने ARAI और SIAM के परीक्षणों का हवाला दिया लेकिन रियल वर्ल्ड परफॉर्मेंस अलग है। ट्रैफिक गर्मी और AC इस्तेमाल में माइलेज घाटा ज्यादा है। उपभोक्ता समान कीमत चुकाते हुए कम दूरी तय कर रहे हैं। ब्राजील में हाई इथेनॉल पर सब्सिडी दी जाती है लेकिन भारत में ऐसा नहीं है।

 

अपग्रेड किट या विकल्प नहीं

 

सरकार ने E20 को जल्दबाजी में लागू किया। 2023 से पहले बनी गाड़ियों की संख्या करोड़ों में है। इनके लिए अपग्रेड किट या विकल्प नहीं दिए गए। वारंटी और इंश्योरेंस पर असर की आशंका बनी हुई है। सुप्रीम कोर्ट में भी याचिकाएं दाखिल हुईं। सरकार ने इसे प्रयोग नहीं बल्कि नीति बताया लेकिन उपभोक्ता अनुभव अलग है।

 

इथेनॉल उत्पादन के लिए फूड ग्रेन जैसे चावल का इस्तेमाल खाद्य सुरक्षा पर सवाल उठाता है। पानी की खपत और पर्यावरणीय प्रभाव पर भी चिंताएं हैं हालांकि सरकार इन्हें खारिज करती है। भूटान का इनकार दिखाता है कि नीति में इंफ्रास्ट्रक्चर और भौगोलिक वास्तविकता को नजरअंदाज किया गया।

 

सरकार पर सवाल

 

सरकार E20 को राष्ट्रीय हित बताती है लेकिन उपभोक्ताओं की लागत पर। माइलेज घाटा और मरम्मत खर्च आम आदमी की जेब पर बोझ है। राजनीतिक आरोपों के बीच नीति का क्रियान्वयन कमजोर रहा। पुरानी गाड़ियों के मालिकों को बिना सहायता के छोड़ दिया गया। विकल्प न देना और जबरन थोपना लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है।

 

E20 के फायदे किसानों तक सीमित दिखते हैं जबकि शहरी उपभोक्ता पीड़ित हैं। सरकार को पारदर्शी सर्वे जारी करने चाहिए और समस्याओं का समाधान निकालना चाहिए। फ्लेक्स फ्यूल वाहनों को बढ़ावा और पुरानी गाड़ियों के लिए सब्सिडी जरूरी है।

 

E20 नीति के अच्छे इरादे हो सकते हैं लेकिन क्रियान्वयन में लापरवाही साफ दिखती है। भूटान का इनकार और उपभोक्ता सर्वे सरकार के दावों को चुनौती देते हैं। लाखों वाहन मालिक प्रभावित हैं। सरकार को तुरंत सुधार करना चाहिए अन्यथा यह नीति आम आदमी के खिलाफ साबित होगी। सच्चाई यह है कि बिना पूर्ण तैयारी के थोपी गई नीतियां विफल होती हैं। उपभोक्ता जागरूक रहें और अपनी गाड़ी की सुरक्षा सुनिश्चित करें।

 

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