‘आत्मसमर्पण के बाद गोली क्यों?’ भोजपुर एनकाउंटर पर सत्ता और विपक्ष दोनों ने उठाए सवाल
युवा बेरोजगारी, पुलिस की संदिग्ध कार्रवाई और राजनीतिक घमासान.. क्या NDA सरकार में कानून-व्यवस्था फेल हो रही है?
भोजपुर जिले के शाहपुर थाना क्षेत्र अंतर्गत बिलौटी गांव में 17 जून 2026 को हुई पुलिस एनकाउंटर ने बिहार की राजनीति को पूरी तरह गरमा दिया है। 30 वर्षीय भरत भूषण तिवारी की मौत को लेकर न केवल विपक्ष, बल्कि सत्तारूढ़ गठबंधन के नेताओं ने भी पुलिस कार्रवाई पर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना ने बिहार में सुशासन, युवा बेरोजगारी और पुलिस की जवाबदेही पर गंभीर बहस छेड़ दी है।
क्या है मामला?
भरत भूषण तिवारी, एक B.Sc. स्नातक, बेरोजगार युवा थे। परिवार के अनुसार वे बाढ़ प्रभावितों की मदद जैसे सामाजिक कार्यों में लगे रहते थे। पुलिस के मुताबिक, उन्होंने सोशल मीडिया पर जगदीशपुर SDM को धमकी दी, हथियार के साथ फोटो और वीडियो पोस्ट किए, और फेसबुक लाइव पर पुलिस पर पिस्टल तानकर फायरिंग की। मंगलवार को पुलिस समझाने पहुंची तो उन्होंने चुनौती दी। बुधवार सुबह लाइव के दौरान हथियार फेंकने के बाद भी गोलीबारी हुई, जिसमें उनके पैर में गोली लगी। उन्हें आरा अस्पताल ले जाया गया, फिर पटना PMCH रेफर किया गया जहां इलाज के दौरान उनकी मौत हो गई।
परिजनों का आरोप है कि भरत ने आत्मसमर्पण कर दिया था, हथियार फेंक दिया था, फिर भी पुलिस ने उन्हें पकड़कर गोली मारी। मां आशा देवी और पिता काशीनाथ तिवारी (सेवानिवृत्त पुलिसकर्मी) ने इसे सुनियोजित हत्या बताया। ग्रामीणों ने शव रखकर NH-922 जाम कर दिया, प्रदर्शन हुए और पुलिस लाठीचार्ज भी किया। मामले की जांच की मांग तेज हुई।
सत्ता पक्ष भी सवाल उठा रहा
इस घटना ने बिहार की NDA सरकार को घेर लिया है। भाजपा के वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री अश्विनी चौबे ने इसे “लोकतंत्र को शर्मसार करने वाली” और “हृदय विदारक” घटना बताया। सोशल मीडिया पर उन्होंने लिखा कि आत्मसमर्पण के बाद गोली मारना गलत है। उन्होंने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से उच्चस्तरीय जांच और दोषी पुलिस अधिकारियों पर कार्रवाई की मांग की। बिहार CM सम्राट चौधरी से 48 घंटे में कार्रवाई कर सुशासन साबित करने को कहा। चौबे ने जोर दिया कि युवक को हिरासत में लेकर कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए थी, न कि गोली।
बिहार के शिक्षा मंत्री मिथिलेश तिवारी (NDA) ने घटना को दुर्भाग्यपूर्ण बताया और कहा कि पुलिस को युवक के आपराधिक इतिहास और परिस्थितियों की पूरी जांच करनी चाहिए थी। उन्होंने कानून सम्मत प्रक्रिया का पालन न होने पर सवाल उठाया। जन सुराज से जुड़े किशोर कुमार ने भी राज्य में अपराध नियंत्रण की कमी और निर्दोषों पर गोली चलने की घटनाओं पर चिंता जताई। पूर्व विधायक राहुल तिवारी समेत अन्य नेताओं ने भी जांच की मांग की।
सुशासन का दावा कितना खोखला?
नतीश कुमार-सम्राट चौधरी सरकार “सुशासन” और “अपराध मुक्त बिहार” का दावा करती रही है, लेकिन यह एनकाउंटर कई सवाल खड़े करता है। पहला, भरत तिवारी पर कोई पुराना आपराधिक रिकॉर्ड नहीं था। वे बेरोजगारी से त्रस्त एक युवा थे, जिन्होंने सोशल मीडिया पर अपनी नाराजगी व्यक्त की। पुलिस ने पहले उन्हें “मानसिक रूप से अस्वस्थ” बताया, फिर एनकाउंटर कर दिया। यह विरोधाभास सरकार की छवि पर सवाल उठाता है।
दूसरा, आत्मसमर्पण के दावों के बावजूद गोली चलाने की घटना फर्जी एनकाउंटर के आरोपों को बल देती है। कई चश्मदीद और परिवार का कहना है कि हथियार फेंकने के बाद भी 3-4 गोलियां मारी गईं। पुलिस का पक्ष आत्मरक्षा का है, लेकिन विपक्ष और सत्ता पक्ष दोनों इसे स्वीकार नहीं कर रहे। सरकार ने शाहपुर SHO समेत 5 पुलिसकर्मियों को सस्पेंड किया, जो क्षति नियंत्रण लगता है, लेकिन उच्चस्तरीय न्यायिक जांच की मांग अनसुनी नहीं हो सकती।
यह घटना बिहार की युवा बेरोजगारी की समस्या को भी उजागर करती है। B.Sc. पास युवा अगर निराशा में ऐसे कदम उठा रहा है, तो शिक्षा और रोजगार की नीतियां कहां खड़ी हैं? TRE-4 जैसी भर्ती विवादों के बीच युवाओं में आक्रोश बढ़ रहा है। NDA सरकार पर आरोप है कि अपराधियों पर सख्ती के नाम पर निर्दोष या मानसिक रूप से परेशान युवाओं को निशाना बनाया जा रहा है।
भोजपुर घटना ने बिहार में कानून-व्यवस्था पर बहस छेड़ दी है। विपक्ष (RJD-कांग्रेस) इसे NDA की पुलिसिया दमन नीति बता रहा है, जबकि सत्ता पक्ष के अंदरूनी सवाल सुशासन की विश्वसनीयता पर चोट कर रहे हैं। अश्विनी चौबे जैसे बीजेपी नेता का बयान दिखाता है कि मुद्दा अब पार्टी लाइन से ऊपर उठ गया है।
सरकार को इस मामले में पारदर्शी जांच करनी चाहिए। यदि पुलिस की भूमिका संदिग्ध साबित हुई तो सख्त कार्रवाई जरूरी है, वरना युवाओं में पुलिस और व्यवस्था के प्रति अविश्वास बढ़ेगा। बिहार जैसे राज्य में जहां बेरोजगारी, बाढ़ और सामाजिक तनाव आम हैं, ऐसी घटनाएं शासन की जड़ों को हिला सकती हैं।
भरत भूषण तिवारी की मौत सिर्फ एक एनकाउंटर नहीं, बल्कि बिहार के युवा संकट, पुलिस सुधार और राजनीतिक जवाबदेही का प्रतीक बन गई है। सरकार अगर समय रहते इसे संभाल नहीं पाई तो राजनीतिक नुकसान के साथ सामाजिक अस्थिरता भी बढ़ सकती है।
