यूरोप का तीसरा सबसे बड़ा हथियार निर्यातक बना भारत: रक्षा निर्यात 38,424 करोड़ रुपये के रिकॉर्ड स्तर पर
नई दिल्ली। वैश्विक रक्षा बाजार में भारत ने ऐतिहासिक मुकाम हासिल किया है। यूरोप की ‘रीआर्म यूरोप’ पहल के तहत रक्षा साजो-सामान की बढ़ती मांग और देश में रक्षा विनिर्माण क्षेत्र के तेज विस्तार के चलते भारत अब यूरोप को हथियार निर्यात करने वाला तीसरा सबसे बड़ा देश बनकर उभरा है। रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह ने शुक्रवार को पत्रकारों से बातचीत में इस महत्वपूर्ण उपलब्धि की आधिकारिक जानकारी दी।
रक्षा निर्यात 38,424 करोड़ रुपये के सर्वकालिक उच्च स्तर पर
रक्षा सचिव ने ब्लूमबर्ग की एक ताजा रिपोर्ट का हवाला देते हुए बताया कि भारत का रक्षा निर्यात अब तक के उच्चतम स्तर पर पहुंचकर 38,424 करोड़ रुपये दर्ज किया गया है। उन्होंने कहा कि यूरोप की ‘रीआर्म यूरोप’ पहल के बाद वहां गोला-बारूद और रक्षा उपकरणों की मांग में अप्रत्याशित वृद्धि हुई है। इसके चलते भारत से मानक गोला-बारूद, आर्टिलरी शेल्स तथा छोटे और बड़े कैलिबर के गोला-बारूद की भारी मात्रा में यूरोपीय देशों को आपूर्ति की जा रही है।
17,000 से अधिक उद्यमों का मजबूत इकोसिस्टम
राजेश कुमार सिंह ने रेखांकित किया कि बीते एक दशक में भारत के रक्षा विनिर्माण ढांचे में बुनियादी बदलाव आया है। वर्तमान में:
- 16 बड़े सार्वजनिक क्षेत्र के रक्षा उपक्रम सक्रिय हैं।
- लगभग 840 मध्यम एवं बड़ी निजी कंपनियां रक्षा उत्पादन में जुटी हैं।
- स्टार्टअप्स समेत करीब 17,000 छोटे और मध्यम उद्यम (MSMEs) इस तंत्र को मजबूत कर रहे हैं।
- इस विस्तृत औद्योगिक आधार का सकारात्मक परिणाम घरेलू बिक्री के आंकड़ों में भी देखा जा रहा है, जो अब लगभग 17 अरब यूरो तक पहुंच गया है।
80 से अधिक देशों को आपूर्ति, IDDM पर जोर
भारत वर्तमान में दुनिया के 80 से अधिक देशों को रक्षा सामग्री का निर्यात कर रहा है। सरकार की नीति के तहत सालाना 20 से 25 अरब डॉलर के रक्षा पूंजीगत व्यय का 75 फीसदी हिस्सा घरेलू स्तर पर ही खर्च किया जा रहा है। इसके लिए भारतीय डिजाइन, विकास और विनिर्माण श्रेणी को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जा रही है ताकि रक्षा क्षेत्र में पूर्ण आत्मनिर्भरता हासिल की जा सके। भारत का निर्यात केवल भारी तोपों और बारूद तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें आधुनिक बुलेटप्रूफ जैकेट, बैलिस्टिक हेलमेट और अत्याधुनिक छोटे हथियार भी शामिल हैं। दक्षिण-पूर्व एशिया सहित कई अन्य क्षेत्रों के साथ भी नए रक्षा समझौतों और खरीद प्रस्तावों पर काम जारी है।
आयात निर्भरता में बदलाव: रूस के साथ फ्रांस और इजरायल की भूमिका
रक्षा सचिव ने स्पष्ट किया कि पहले जहां भारत रक्षा जरूरतों के लिए मुख्य रूप से रूस पर निर्भर था, वहीं अब रक्षा आयात के स्रोतों में व्यापक विविधता आई है। हालांकि सेना के पास अभी भी रूसी मूल के कई साजो-सामान मौजूद हैं, लेकिन फ्रांस और अन्य यूरोपीय साझेदारों के साथ संबंध प्रगाढ़ हुए हैं। वर्तमान में भारत के रक्षा आयात में फ्रांस और इजरायल दोनों की हिस्सेदारी लगभग 15-15 प्रतिशत है। हाल ही में रक्षा सचिव के ग्रीस और साइप्रस दौरे का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि रणनीतिक हितों की समानता के कारण ये देश यूरोप के रक्षा बाजार में भारत के नए और अहम साझीदार बन रहे हैं।
संयुक्त उपक्रम (JV) और मेक इन इंडिया की शर्त
भारत अब केवल निर्यातक तक सीमित न रहकर यूरोपीय देशों के रक्षा खरीद कार्यक्रमों में प्रत्यक्ष भागीदारी बढ़ाने की दिशा में काम कर रहा है। इसके लिए यूरोपीय देशों में भारतीय कंपनियों द्वारा संयुक्त उपक्रम स्थापित करने और यूरोपीय कंपनियों को भारत में उत्पादन इकाई लगाने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है। हालांकि, विदेशी कंपनियों को भारत के रक्षा खरीद कार्यक्रमों में भाग लेने के लिए सरकार की सख्त ‘मेक इन इंडिया’ शर्तों का अनिवार्य रूप से पालन करना होगा। भारत-यूरोप प्रस्तावित साझेदारी समझौता दोनों पक्षों की रक्षा आपूर्ति श्रृंखला को और अधिक मजबूत व एकीकृत करने में मील का पत्थर साबित होगा।
