Vijay Sundi Story: मजबूरी में करनी पड़ी मजदूरी, फिर तीरंदाजी में जीता गोल्ड! जानिए कौन हैं विजय सुंडी?

बचपन में पोलियो, घर की कमजोर आर्थिक स्थिति और तीरंदाजी के महंगे खर्च के कारण विजय सुंडी को कई मुश्किलों का सामना करना पड़ा। एक वक्त ऐसा भी आया जब उन्हें खेल छोड़कर बेंगलुरु में मजदूरी करनी पड़ी। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और दोबारा मैदान पर लौटकर भारत के लिए गोल्ड मेडल जीत लिया। आखिर झारखंड के इस खिलाड़ी ने संघर्ष से सफलता तक का सफर कैसे तय किया? जानिए विजय सुंडी की प्रेरणादायक कहानी।

कौन हैं विजय सुंडी, जिन्होंने भारत को दिलाया गोल्ड मेडल?

झारखंड के कोल्हान क्षेत्र से निकलकर अंतरराष्ट्रीय खेल मंच पर देश का नाम रोशन करने वाले पैरा तीरंदाज विजय सुंडी आज अपनी मेहनत और दृढ़ इच्छाशक्ति के लिए चर्चा में हैं। पश्चिमी सिंहभूम जिले के चाईबासा में तीरंदाजी का अभ्यास करने वाले विजय ने गरीबी और शारीरिक चुनौतियों के बावजूद खेल में अपनी अलग पहचान बनाई है।

जापान के नागोया स्थित ओकाजाकी चुओ सोगो पार्क मल्टीपर्पस स्क्वायर में आयोजित एशियन पैरा गेम्स के पुरुष रिकर्व टीम इवेंट में विजय सुंडी और हरविंदर सिंह की जोड़ी ने भारत के लिए स्वर्ण पदक जीता। खिताबी मुकाबले में भारतीय जोड़ी ने चीन को 5-1 से हराया।

इस जीत ने विजय की प्रतिभा को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई। हालांकि, इस मुकाम तक पहुंचने का उनका सफर आसान नहीं रहा। बचपन में पोलियो की चपेट में आने से लेकर खेल के लिए पैसे जुटाने तक, उन्हें कई कठिन परिस्थितियों से गुजरना पड़ा।

पहले सेट में बराबरी, फिर चीन को हराकर जीता गोल्ड

एशियन पैरा गेम्स के पुरुष रिकर्व टीम इवेंट के फाइनल में भारत की ओर से हरविंदर सिंह और विजय सुंडी ने शानदार प्रदर्शन किया। भारतीय जोड़ी का सामना चीन की टीम से था।

मुकाबले की शुरुआत में दोनों टीमों ने 35-35 अंक हासिल किए और पहला सेट बराबरी पर समाप्त हुआ। इसके बाद भारतीय खिलाड़ियों ने बेहतर प्रदर्शन करते हुए दूसरा सेट 37-36 से अपने नाम किया।

तीसरे सेट में भी हरविंदर सिंह और विजय सुंडी ने अपना दबदबा बनाए रखा और 38-36 से जीत दर्ज की। इस प्रदर्शन के साथ भारतीय जोड़ी ने चीन को 5-1 से हराकर स्वर्ण पदक अपने नाम कर लिया।

यह जीत विजय के करियर के महत्वपूर्ण पड़ावों में से एक है। उनके प्रदर्शन ने दिखाया कि सही मार्गदर्शन, निरंतर अभ्यास और दृढ़ संकल्प के सहारे कठिन चुनौतियों के बावजूद बड़े लक्ष्य हासिल किए जा सकते हैं।

गरीब आदिवासी परिवार में हुआ जन्म, बचपन से संघर्ष

विजय सुंडी का जन्म वर्ष 1996 में झारखंड के सरायकेला-खरसावां जिले के राजनगर प्रखंड स्थित बड़डीह गांव में एक साधारण और आर्थिक रूप से कमजोर आदिवासी परिवार में हुआ था। परिवार की सीमित आय के कारण शुरुआती जीवन में उन्हें कई परेशानियों का सामना करना पड़ा।

बचपन में ही पोलियो की चपेट में आने के कारण उनके लिए सामान्य खेलों में हिस्सा लेना मुश्किल था। लेकिन धनुष-बाण के प्रति उनका आकर्षण बना रहा। पारंपरिक बांस के धनुष-बाण से शुरू हुआ यह लगाव धीरे-धीरे तीरंदाजी के प्रति जुनून में बदल गया।

विजय ने स्थानीय सरकारी स्कूलों से अपनी स्कूली शिक्षा पूरी की। इसके बाद उन्होंने जमशेदपुर के एलबीएसएम कॉलेज से उच्च शिक्षा प्राप्त की। पढ़ाई के साथ-साथ तीरंदाजी में आगे बढ़ने की उनकी इच्छा भी मजबूत होती गई।

2016 में लिया तीरंदाजी सीखने का फैसला

विजय सुंडी के खेल जीवन में वर्ष 2016 अहम साबित हुआ। इसी दौरान उन्होंने तीरंदाजी को पेशेवर तरीके से सीखने का फैसला किया। इसके लिए वह चाईबासा के सिकुरसाई स्थित तुरतुंग तीरंदाजी प्रशिक्षण केंद्र पहुंचे।

यहां उन्हें राष्ट्रीय कोच महर्षि महेंद्र सिंकू का मार्गदर्शन मिला। कोच ने विजय की लगन और एकाग्रता को पहचाना और उन्हें रिकर्व वर्ग की पैरा तीरंदाजी के लिए प्रशिक्षित करना शुरू किया।

हालांकि, तीरंदाजी का महंगा सामान और प्रशिक्षण का खर्च उनके सामने बड़ी चुनौती था। आर्थिक स्थिति कमजोर होने के कारण उनके लिए खेल जारी रखना मुश्किल हो गया। एक समय ऐसा आया जब उन्हें तीरंदाजी से दूर होकर बेंगलुरु में मजदूरी करनी पड़ी।

खेल छोड़ना पड़ा, लेकिन हार नहीं मानी

विजय के लिए तीरंदाजी केवल एक खेल नहीं, बल्कि अपने सपनों को पूरा करने का रास्ता थी। आर्थिक तंगी के चलते मजदूरी करने के बावजूद उन्होंने खेल में वापसी की उम्मीद नहीं छोड़ी।

उन्होंने मेहनत करके पैसे जुटाए और दोबारा तीरंदाजी के मैदान में लौटे। उनकी यह वापसी आसान नहीं थी, लेकिन लगातार अभ्यास और समर्पण ने उन्हें आगे बढ़ने का मौका दिया।

राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में उन्होंने झारखंड के लिए पांच पदक जीतकर अपनी प्रतिभा साबित की। इन उपलब्धियों ने उनके आत्मविश्वास को बढ़ाया और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खेलने की राह तैयार की।

राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं से भारतीय टीम तक कैसे पहुंचे विजय?

विजय सुंडी की मेहनत का अगला बड़ा पड़ाव वर्ष 2026 में आया। नई दिल्ली के यमुना स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स में आयोजित ट्रायल्स के जरिए उनका चयन बैंकॉक, थाईलैंड में होने वाली वर्ल्ड आर्चरी पैरा सीरीज के लिए भारतीय टीम में हुआ।

अपने शुरुआती अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंट में पुरुष रिकर्व टीम इवेंट में उन्होंने शानदार प्रदर्शन किया और भारत के लिए स्वर्ण पदक जीतने में योगदान दिया।

इसके बाद एशियन पैरा गेम्स में हरविंदर सिंह के साथ उनकी स्वर्णिम सफलता ने उनके सफर को नई पहचान दी। एक साधारण परिवार से आने वाले विजय ने साबित किया कि प्रतिभा और मेहनत को अवसर मिले, तो मुश्किल परिस्थितियां भी रास्ता नहीं रोक सकतीं।

विजय सुंडी की कहानी युवाओं को क्या सिखाती है?

विजय सुंडी का सफर केवल एक खिलाड़ी की पदक जीतने की कहानी नहीं है। यह आर्थिक कठिनाइयों, शारीरिक चुनौतियों और असफलताओं के बीच अपने लक्ष्य से जुड़े रहने की मिसाल भी है।

उनकी जिंदगी में ऐसे मौके आए जब खेल जारी रखना संभव नहीं लग रहा था। लेकिन उन्होंने मेहनत करके संसाधन जुटाए, अभ्यास दोबारा शुरू किया और अपने प्रदर्शन के दम पर आगे बढ़ते गए।

आज विजय की उपलब्धि उन युवाओं के लिए प्रेरणा है जो सीमित संसाधनों के कारण अपने सपनों को लेकर असमंजस में रहते हैं। उनकी कहानी बताती है कि मंजिल तक पहुंचने के लिए केवल प्रतिभा ही नहीं, बल्कि धैर्य, लगातार मेहनत और सही मार्गदर्शन भी जरूरी है।

विजय सुंडी ने अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत के लिए स्वर्ण पदक जीतकर अपने परिवार, झारखंड और देश को गौरवान्वित किया है। उनका सफर यह संदेश देता है कि परिस्थितियां चाहे कितनी भी कठिन हों, दृढ़ संकल्प के साथ आगे बढ़ने का रास्ता निकाला जा सकता है।

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