‘दिल्ली में ब्रिक्स की एकजुटता, वाशिंगटन से प्रतिबंधों की तैयारी!’ अमेरिकी संसद में आया रूस-ईरान बिल; क्या भारत पर लगेगा भारी टैरिफ?
नई दिल्ली। एक तरफ राजधानी दिल्ली में 18वें BRICS शिखर सम्मेलन के मंच पर भारत और रूस अपने द्विपक्षीय आर्थिक व रणनीतिक रिश्तों को नई ऊंचाई देने पर मंथन कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ वाशिंगटन से भारत जैसे प्रमुख रूसी व्यापारिक साझेदारों के लिए असहज करने वाली खबर सामने आई है। अमेरिकी प्रतिनिधि सभा की नियम समिति सोमवार को ‘लिंडसे ओ. ग्राहम रूस और ईरान प्रतिबंध अधिनियम 2026’ पर विचार करने जा रही है। इस प्रस्तावित कानून में रूस के साथ कारोबार करने वाले और रूसी कच्चा तेल खरीदने वाले देशों पर दंडात्मक टैरिफ लगाने का प्रावधान है, जिसका सीधा असर भारत पर पड़ने की आशंका जताई जा रही है।
यह विधेयक पिछले माह अमेरिकी सीनेट से भारी बहुमत के साथ पहले ही पारित हो चुका है। अब प्रतिनिधि सभा में इसका भविष्य तय होना है। यदि सदन से भी इसे हरी झंडी मिल जाती है, तो राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को रूस, ईरान और रूसी ऊर्जा संसाधनों के आयातक देशों के खिलाफ कड़े व्यापारिक प्रतिबंध लगाने के व्यापक अधिकार मिल जाएंगे।
रूसी तेल खरीदारों पर अतिरिक्त शुल्क का पेंच
इस विधेयक का सबसे संवेदनशील पहलू द्वितीयक प्रतिबंधों और टैरिफ से जुड़ा है। कानून के मसौदे के तहत यदि कोई तीसरा देश रूस से कच्चा तेल, प्राकृतिक गैस या अन्य वस्तुएं खरीदता है, तो अमेरिका उस देश से आयात होने वाले सामानों पर अतिरिक्त सीमा शुल्क थोप सकता है। भारत अपनी ऊर्जा सुरक्षा के लिए रूस से भारी मात्रा में रियायती कच्चा तेल आयात करता रहा है। ऐसे में यदि यह कानून बिना किसी छूट के लागू होता है, तो भारतीय निर्यातकों और दोनों देशों के व्यापारिक संबंधों पर दबाव बढ़ सकता है।
डेमोक्रेट्स ने जताई चिंता, रिपब्लिकन ने बनाया आपात एजेंडा
प्रतिनिधि सभा में इस विधेयक को लेकर तीखी राजनीतिक बहस छिड़ी हुई है। अल्पसंख्यक नेता हकीम जेफ्रीज, ग्रेगरी मीक्स, डॉन बेयर और रिचर्ड नील सहित कई डेमोक्रेट सांसदों ने इसका विरोध किया है। उनका तर्क है कि यह प्रस्ताव अमेरिकी राष्ट्रपति को एकतरफा और असीमित शुल्क अधिकार दे देगा, जिसका अंतिम आर्थिक बोझ अमेरिकी उपभोक्ताओं पर महंगाई के रूप में पड़ेगा और इससे लंबे समय में यूक्रेन समर्थन अभियान भी प्रभावित हो सकता है।
दूसरी तरफ रिपब्लिकन नेतृत्व ने पहले इस बिल को सदन के एजेंडे से हटा दिया था, लेकिन रूस-यूक्रेन युद्ध के पांचवें साल में प्रवेश करने और वैश्विक दबाव के बीच इसे अब आपात कदम के तौर पर नियम समिति के सामने पुन: लाया गया है। सीनेट की विदेश संबंध समिति की रैंकिंग सदस्य जीन शाहीन ने इस कदम का समर्थन करते हुए कहा है कि यूक्रेन में जारी मानवीय संकट के बीच रूस की अर्थव्यवस्था पर अधिकतम वित्तीय दबाव बनाना और उसे बातचीत की मेज पर लाना बेहद आवश्यक है।
ब्रिक्स मंच और भारत का रणनीतिक रुख
दिल्ली में चल रहे 18वें ब्रिक्स सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के बीच हुई द्विपक्षीय बैठक में ‘प्रोग्राम फॉर इकोनॉमिक कोऑपरेशन 2030’ पर सहमति बनी है। ऐसे समय में जब भारत वैश्विक मंच पर अपनी रणनीतिक स्वायत्तता और स्वतंत्र विदेश नीति पर अडिग है, अमेरिकी संसद की यह पहल भारत-अमेरिका व्यापारिक संवाद में नई कूटनीतिक चुनौती खड़ी कर सकती है।
