TMC में महाबगावत! ममता बनर्जी की पकड़ हुई कमजोर? पार्टी मुख्यालय पर बागी गुट का कब्जा
कोलकाता स्थित पार्टी कार्यालय के ताले बदले गए, चुनाव चिह्न और संगठन पर भी दावा; 58 विधायकों की बगावत के बाद ममता बनर्जी की राजनीतिक चुनौती बढ़ी।
कोलकाता। पश्चिम बंगाल की राजनीति में शुक्रवार को बड़ा घटनाक्रम देखने को मिला, जब ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले तृणमूल कांग्रेस (TMC) के बागी गुट ने पार्टी के कोलकाता स्थित मुख्यालय पर कब्जा कर लिया। बागी नेताओं ने कार्यालय के ताले बदल दिए और नए पोस्टर लगाए, जिनमें मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की तस्वीर शामिल नहीं थी। हालांकि, कार्यालय परिसर के भीतर लगी उनकी तस्वीरों और कटआउट को यथावत रखा गया।
मुख्यालय में समर्थकों और नेताओं के साथ बैठक के बाद ऋतब्रत बनर्जी ने दावा किया कि उनका गुट ही “असली तृणमूल कांग्रेस” है। उन्होंने कहा कि अब पार्टी की सभी गतिविधियों का संचालन इसी मुख्यालय से किया जाएगा। बागी गुट पहले ही चुनाव आयोग के समक्ष पार्टी के नाम, चुनाव चिह्न और संगठन पर अपना दावा प्रस्तुत कर चुका है।
दूसरी ओर, ममता बनर्जी समर्थक नेताओं ने इस कार्रवाई का विरोध किया है। वरिष्ठ नेता कुनाल घोष जब पार्टी कार्यालय पहुंचे तो मुख्य द्वार पर ताला लगा मिला, जिसके चलते वे अंदर नहीं जा सके। उन्होंने आरोप लगाया कि कार्यालय पर कब्जा राज्य प्रशासन और पुलिस की मौन सहमति से किया गया है। साथ ही उन्होंने कहा कि बागी नेताओं को जनता ने नहीं, बल्कि तृणमूल कांग्रेस के टिकट पर चुना था।
राजनीतिक संकट की शुरुआत 3 जून को विधानसभा चुनाव में पार्टी की हार के बाद हुई। इसके बाद पार्टी के 80 में से 58 विधायक ममता बनर्जी के नेतृत्व से अलग हो गए और ऋतब्रत बनर्जी को अपना नेता चुन लिया। बागी विधायकों ने विधानसभा अध्यक्ष को समर्थन पत्र सौंपकर उन्हें नेता प्रतिपक्ष घोषित करने की मांग की, जिसे मंजूरी भी मिल गई।
इसके बाद 22 जून को बागी गुट की प्रतिनिधि बैठक आयोजित की गई, जिसमें नए अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और 30 सदस्यीय राष्ट्रीय कार्यकारिणी का गठन किया गया। संगठन पर नियंत्रण को लेकर दोनों पक्षों के बीच राजनीतिक संघर्ष लगातार तेज होता जा रहा है।
बगावत के बाद ममता बनर्जी की राजनीतिक स्थिति पर भी सवाल उठने लगे हैं। विधानसभा में उनके साथ अब केवल 22 विधायक बताए जा रहे हैं। वहीं लोकसभा में 28 में से 8 सांसद और राज्यसभा में 13 में से 9 सांसद उनके समर्थन में बताए जा रहे हैं। ऐसे में पार्टी के भविष्य, संगठन पर नियंत्रण और चुनाव आयोग के संभावित फैसले पर राजनीतिक गलियारों की नजरें टिकी हुई हैं।
