गिरफ्तार CM-मंत्रियों को हटाने वाला बिल क्यों अटका? सरकार का ‘डबल गेम’ और विपक्ष की आपत्तियाँ
भारत की आज़ादी के 75 सालों में कभी ऐसा नहीं हुआ कि कोई मुख्यमंत्री या मंत्री जेल में रहते हुए भी अपने पद पर कायम रहे और सरकार चलाता रहा। लेकिन दिल्ली में यह पहली बार हुआ जब सीएम अरविंद केजरीवाल ने तिहाड़ जेल में रहते हुए भी इस्तीफा नहीं दिया। इसी पृष्ठभूमि में केंद्र सरकार ने 130वें संविधान संशोधन बिल को संसद में पेश किया, जिसका उद्देश्य था– अगर कोई मुख्यमंत्री या मंत्री गिरफ्तार होता है तो उसकी कुर्सी अपने आप चली जाएगी।
सरकार क्यों बेफिक्र दिख रही है?
सरकार का कहना है कि अगर बिल पारित नहीं हुआ, तब भी उसे कोई नुकसान नहीं। असल में, इस विधेयक को लेकर सरकार विपक्ष को कठघरे में खड़ा करना चाहती है। यदि विपक्ष इसका विरोध करता है तो संदेश यह जाएगा कि विपक्ष जेल में बैठे मुख्यमंत्री या मंत्री का समर्थन कर रहा है।
बिल को मॉनसून सत्र खत्म होने से ठीक पहले लाया गया और इसे संयुक्त संसदीय समिति (JPC) के पास भेजने की बात कही गई। यानी शुरुआत से ही सरकार की रणनीति यही थी कि इस पर आम राय बने और अगर राय नहीं बनती तो इसकी ज़िम्मेदारी विपक्ष पर डाली जा सके।
विपक्ष क्यों कर रहा है विरोध?
विपक्ष का तर्क है कि केंद्र सरकार सीबीआई, ईडी जैसी एजेंसियों का दुरुपयोग करती रही है। अगर यह बिल कानून बनता है तो किसी भी मुख्यमंत्री या मंत्री को गिरफ्तार कर 30 दिन तक हिरासत में रखा जा सकता है और 31वें दिन वह अपने-आप पद से हट जाएगा। विपक्ष का कहना है कि यह प्रावधान सत्ता पक्ष के हाथ में राजनीतिक हथियार बन जाएगा।
सरकार का पक्ष
केंद्र सरकार का कहना है कि यह आशंका निराधार है। गिरफ्तारी से पहले नोटिस दिया जाता है, पूछताछ होती है और आरोपी अदालत से अग्रिम जमानत या स्टे ले सकता है। ऐसे में एजेंसियों की मनमानी की आशंका बेबुनियाद है।
नैतिकता बनाम राजनीति
सरकार का मानना है कि यह “मजाक” अब खत्म होना चाहिए। संविधान निर्माताओं ने कभी नहीं सोचा था कि कोई मुख्यमंत्री या मंत्री जेल से सरकार चलाएगा। दिल्ली में केजरीवाल के अलावा, तमिलनाडु में भी डीएमके मंत्री सेंथिल का मामला सामने आया, जहाँ अदालत ने ही उन्हें इस्तीफा देने का निर्देश दिया था।
चुनौती और संभावनाएँ
यह संविधान संशोधन विधेयक है, इसलिए इसे पारित करने के लिए संसद में दो-तिहाई बहुमत चाहिए। यानी विपक्ष का सहयोग अनिवार्य है। सवाल यह है कि क्या यह बिल केवल राजनीतिक तकरार तक सीमित रहेगा या फिर यह राजनीति में नैतिकता बनाम सत्ता का बड़ा मुद्दा बनेगा।
