न कुरान में जिक्र… न इस्लाम का हिस्सा, फिर क्यों हो रहा महिलाओं का खतना? SC ने मांगा जवाब

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने दाऊदी बोहरा समुदाय सहित मुस्लिम महिलाओं में प्रचलित महिला जननांग कटाई (Female Genital Mutilation – FGM) की प्रथा पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने की मांग वाली याचिका पर सुनवाई करने की सहमति जताई है। जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस आर. महादेवन की बेंच ने गुरुवार को ‘चेतना वेलफेयर सोसाइटी’ नामक एनजीओ की जनहित याचिका (PIL) पर केंद्र सरकार, विधि एवं न्याय मंत्रालय सहित सभी संबंधित पक्षों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।

 

याचिका में दावा किया गया है कि FGM इस्लाम का कोई अनिवार्य हिस्सा नहीं है और यह नाबालिग लड़कियों के मौलिक अधिकारों का घोर उल्लंघन है। याचिकाकर्ता ने कहा कि यह प्रथा बच्चों के यौन अपराधों से संरक्षण अधिनियम (POCSO एक्ट) का भी उल्लंघन करती है, क्योंकि गैर-चिकित्सकीय कारणों से नाबालिग के जननांगों को छूना या छेड़छाड़ करना अपराध है।

 

FGM: स्वास्थ्य और मानवाधिकारों पर गंभीर खतरा

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के हवाले से याचिका में उल्लेख किया गया है कि FGM लड़कियों और महिलाओं के मानवाधिकारों का गंभीर उल्लंघन है। यह प्रथा संक्रमण, प्रसव में जटिलताएं, गंभीर शारीरिक और मानसिक क्षति का कारण बनती है। याचिका में संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) के 2012 के प्रस्ताव का भी जिक्र है, जिसमें FGM को समाप्त करने का आह्वान किया गया था। याचिकाकर्ता ने बताया कि दाऊदी बोहरा समुदाय की लगभग 75% महिलाओं पर यह प्रथा थोपी जाती है।

 

पूर्व मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई ने भी इस प्रथा पर चिंता जताई थी। उन्होंने कहा था कि संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) के बावजूद बेटियों पर FGM लागू करना अन्यायपूर्ण है। सुप्रीम कोर्ट ने अन्य मामलों जैसे सबरीमाला मंदिर में महिलाओं का प्रवेश, पारसी समुदाय में महिलाओं के अधिकार और मस्जिदों में महिलाओं के प्रवेश जैसे मुद्दों के साथ इस मामले को जोड़कर देखा है।

 

क्या है FGM प्रथा?

रूढ़िवादी समुदायों में FGM को ‘खतना’ कहा जाता है, जिसमें लड़कियों के जननांगों का हिस्सा (जैसे क्लिटोरल हूड) काट दिया जाता है। समुदाय का मानना है कि इससे महिलाएं ‘शुद्ध’ होती हैं और विवाह के लिए तैयार होती हैं। यह प्रक्रिया अक्सर बिना एनेस्थीसिया के की जाती है और कई डॉक्टर इसे ‘प्लास्टिक सर्जरी’ के बहाने अंजाम देते हैं। कानूनन, दोषी पाए जाने पर 7 साल तक की कैद हो सकती है। हालांकि, हाल के वर्षों में जागरूकता से इसकी संख्या में कमी आई है, लेकिन भारत में कोई विशिष्ट कानून नहीं है। अमेरिका, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया और कई अफ्रीकी देशों में यह प्रतिबंधित है।

 

सुप्रीम कोर्ट का रुख

यह मामला 2017 से अदालत में लंबित है, जब दिल्ली की वकील सुनीता तिवारी ने PIL दायर की थी। 2018 में इसे पांच जजों की संवैधानिक बेंच को भेजा गया था, लेकिन अब दोबारा सुनवाई हो रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि अदालत का फैसला बालिका सुरक्षा, महिला अधिकारों और धार्मिक स्वतंत्रता (अनुच्छेद 26) के बीच संतुलन स्थापित करेगा। निर्णय के बाद पूरे देश में FGM के खिलाफ कानून और जागरूकता अभियान को बल मिलेगा।

 

दाऊदी बोहरा महिला संघ ने पहले बचाव में कहा था कि यह धार्मिक शुद्धता का हिस्सा है, लेकिन याचिकाकर्ता इसे संवैधानिक नैतिकता के विरुद्ध बताते हैं। केंद्र सरकार का रुख अभी स्पष्ट नहीं है, लेकिन स्वास्थ्य मंत्रालय ने पहले इसे स्वास्थ्य के लिए हानिकारक माना है। अदालत के फैसले का इंतजार है, जो महिलाओं के अधिकारों को मजबूत करने वाला साबित हो सकता है।

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