Bastar Dussehra 2025: 600 साल पुरानी निशा जात्रा, देवी-देवताओं को प्रसन्न करने की अनोखी परंपरा

जगदलपुर। विश्व प्रसिद्ध बस्तर दशहरे की सबसे रहस्यमयी और अद्भुत रस्म निशा जात्रा बीती रात परंपरागत विधि-विधान के साथ पूरी की गई। प्राचीन मान्यताओं के अनुसार, राजा-महाराजा अपने राज्य को बुरी प्रेत-आत्माओं से बचाने के लिए इस अनुष्ठान को करवाते थे।

चावल और उड़द जमीन में गाड़ने की परंपरा

यह रस्म जगदलपुर के अनुपमा चौक स्थित गुड़ी में अदा की गई। इस दौरान चावल, उड़द और मूंग दाल से बने बड़े तथा नमक का भोग लगाकर उसे जमीन में गाड़ा गया। मान्यता है कि सालभर के बाद भी इस भोग में कीड़े नहीं लगते, जो इसकी चमत्कारी परंपरा को दर्शाता है। रस्म में देवी को प्रसन्न करने के लिए बलि भी दी जाती है। पुराने समय में हजारों पशुओं की बलि चढ़ाई जाती थी, हालांकि अब यह परंपरा काफी कम हो गई है, लेकिन कुछ पशुओं की बलि आज भी दी जाती है ताकि देवी राज्य की रक्षा करें।

सदियों पुरानी परंपरा

बस्तर राजपरिवार के सदस्य कमलचंद भंजदेव ने बताया कि जैसे नवरात्र की अष्टमी समाप्त होती है, वैसे ही निशा जात्रा में बलि दी जाती है और तंत्र विद्याओं की पूजा होती है। उन्होंने कहा, “तंत्र विद्या में मीठे का प्रयोग नहीं किया जाता, इसलिए इसमें चावल, दाल और नमक का ही भोग लगता है। यह परंपरा सदियों से चली आ रही है और आज भी विधि-विधान के साथ निभाई जा रही है।”

जुलूस में गूंजे नगाड़े और ढोल

इस अनुष्ठान के लिए विशेष जुलूस राजमहल और दंतेश्वरी मंदिर परिसर से निकाला गया। इस जुलूस में पुजारी, परगनों से आए देवप्रतिनिधि (चल देव और मूर्तियां) पारंपरिक वाद्ययंत्रों के साथ शामिल हुए। ढोल, नगाड़े और मोहरी बाजा की गूंज के बीच श्रद्धालुओं की बड़ी संख्या भी इस जुलूस में सम्मिलित रही। आंगादेव भी परंपरागत तरीके से इसमें साथ चलते हैं। पूरी रात चले इस आयोजन ने एक बार फिर बस्तर दशहरे की रहस्यमयी और अद्वितीय परंपरा को जीवंत कर दिया।

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