मक्का किसान फिर छत्तीसगढ़ी व्यापारियों के भरोसे: मंडी न होने से सालों से कम दाम पर बिक रही फसल
भुवनेश्वर/कालाहांडी। ओडिशा के कालाहांडी जिले में मक्का की बंपर फसल तैयार है, लेकिन किसानों के चेहरे पर खुशी नहीं, मायूसी है। वजह साफ है – जिले में आज तक एक भी सरकारी मक्का मंडी नहीं बनी। नतीजा, छत्तीसगढ़ के व्यापारी हर साल यहां आते हैं, मनमाने दाम पर मक्का खरीदते हैं और मोटा मुनाफा लेकर चले जाते हैं। किसान लागत भी नहीं निकाल पा रहे।
पहाड़ों में मेहनत, मैदानों में मुनाफा
कालाहांडी के ठुम्पाखुंट, लांजीगढ़, भवानीपाटना, नरला, कोकरासर, जयपाटना जैसे पहाड़ी और आदिवासी बहुल ब्लॉकों में मक्का जिले की दूसरी सबसे बड़ी फसल है। एक एकड़ में किसान को बीज, खाद, मजदूरी मिलाकर करीब 18-20 हजार रुपये खर्च आता है। चार महीने की कड़ी मेहनत के बाद 18-22 क्विंटल फसल तैयार होती है। लेकिन स्थानीय स्तर पर खरीदार न होने से छत्तीसगढ़ के व्यापारी 900 से 1,200 रुपये प्रति क्विंटल तक ही भाव देते हैं, जबकि छत्तीसगढ़ या आंध्र प्रदेश की मंडियों में यही मक्का 1,800 से 2,200 रुपये क्विंटल तक बिकता है।
किसान बोले– “हमारे पास कोई विकल्प ही नहीं”
लांजीगढ़ ब्लॉक के एक किसान ने बताया, “हमारे गांव से मक्का ले जाने के लिए छत्तीसगढ़ के व्यापारी ट्रक लेकर आते हैं। न तौल सही करते हैं, न दाम ठीक देते हैं। मना करो तो कहते हैं – ले जाएंगे नहीं तो सड़ जाएगा। मजबूरी में बेचना पड़ता है।”
ठुम्पाखुंट के एक अन्य किसान ने कहा, “धान और कपास के लिए तो मंडी है, लेकिन मक्का के लिए कुछ नहीं। सरकारें बदलती रहीं, लेकिन हमारी समस्या वही है।”
सरकारें बनाती रहीं योजनाएं, मंडी नहीं बनी
केंद्र और राज्य सरकार किसानों के नाम पर सैकड़ों योजनाएं चला रही हैं, लेकिन कालाहांडी में मक्का खरीदी केंद्र या मंडी बनाने की कोई घोषणा आज तक नहीं हुई। कांग्रेस के समय भी नहीं बनी, बीजद सरकार में भी नहीं बनी और अब बीजेपी सरकार में भी मक्का किसानों की अनदेखी जारी है।
स्थानीय विधायक और सांसदों ने कई बार विधानसभा और लोकसभा में मुद्दा उठाया, लेकिन जमीन पर कुछ नहीं हुआ। नतीजा – कालाहांडी का मक्का आज भी छत्तीसगढ़ के व्यापारियों की दया पर बिक रहा है।
किसान अब एक ही मांग कर रहे हैं – “हमारे जिले में कम से कम एक सरकारी मक्का मंडी बनवा दो, ताकि हम अपनी ही जमीन पर लुटने से बच जाएं।”
