घुसपैठ पर सर्जिकल स्ट्राइक! असम और दिल्ली से रोहिंग्या और बांग्लादेशी वापस भेजे गए, मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा

भारत और पाकिस्तान के बीच जारी बढ़ते तनाव के बीच भारत सरकार अब अपने अंदरूनी सुरक्षा मामलों पर भी सख्त रुख अपना रही है। विशेषकर देश में अवैध रूप से रह रहे रोहिंग्या और बांग्लादेशी घुसपैठियों को लेकर केंद्र और राज्य सरकारों ने कड़ी कार्रवाई शुरू कर दी है। हाल ही में असम और दिल्ली से बड़ी संख्या में रोहिंग्या और बांग्लादेशी नागरिकों को डिटेंशन कैंप से निकालकर उनके मूल देशों को भेजा गया है।

असम से 102 रोहिंग्या वापस भेजे गए

असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने इस बात की पुष्टि की है कि उनके राज्य के गोलपाड़ा जिले स्थित मटिया डिटेंशन कैम्प से 102 रोहिंग्या नागरिकों को बांग्लादेश के रास्ते उनके देश भेज दिया गया है। यह डिटेंशन कैम्प देश का सबसे बड़ा डिटेंशन कैम्प है। रिपोर्ट के मुताबिक, रोहिंग्याओं को पहले बसों में भरकर त्रिपुरा ले जाया गया और फिर वहां से उन्हें बांग्लादेश सीमा के पार करवा दिया गया।

यह कदम ऐसे वक्त पर उठाया गया है जब सीमा पार से घुसपैठ की घटनाएं और आंतरिक सुरक्षा को लेकर चिंताएं लगातार बढ़ रही हैं।

दिल्ली पुलिस की गोपनीय कार्रवाई

इसी प्रकार डेक्कन हेराल्ड की एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि दिल्ली पुलिस ने 7 मई 2025 को 40 रोहिंग्या घुसपैठियों को पकड़कर उन्हें अंडमान के रास्ते समुद्र के जरिए म्यांमार भेज दिया। रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि यह कार्रवाई पूरी तरह गोपनीय ढंग से की गई और इसकी आधिकारिक पुष्टि अभी तक नहीं हुई है

हालांकि इस कार्रवाई के खिलाफ मोहम्मद इस्माइल नाम के व्यक्ति ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है। याचिकाकर्ता का दावा है कि दिल्ली पुलिस ने 43 रोहिंग्या शरणार्थियों को बायोमेट्रिक लेने के बहाने उठाया और फिर उन्हें समुद्र के रास्ते म्यांमार भेज दिया। इस याचिका पर 31 जुलाई 2025 को सुनवाई निर्धारित की गई है।

BSF ने भी की कार्रवाई

एक अन्य रिपोर्ट में बताया गया है कि BSF (सीमा सुरक्षा बल) ने हाल ही में 78 बांग्लादेशी घुसपैठियों को सुंदरबन के जंगलों में छोड़ दिया, जहां से बाद में बांग्लादेशी सुरक्षाबलों ने उन्हें बरामद किया। यह घटनाक्रम दोनों देशों के सीमा सुरक्षा बलों के बीच समन्वय को लेकर भी सवाल खड़ा करता है।

सुप्रीम कोर्ट की नजर

हालांकि अभी तक सुप्रीम कोर्ट ने रोहिंग्या घुसपैठियों के समर्थन में दायर याचिका पर कोई आदेश नहीं दिया है, लेकिन यह मामला कानूनी और मानवीय दृष्टिकोण से बेहद संवेदनशील माना जा रहा है। सरकार की ओर से तर्क है कि ये लोग अवैध रूप से भारत में रह रहे हैं और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा बन सकते हैं। वहीं, मानवाधिकार संगठनों और समर्थकों का कहना है कि इन्हें शरणार्थी माना जाए और अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकारों का पालन हो।

निष्कर्ष

भारत सरकार का यह रुख साफ है कि अवैध घुसपैठियों को किसी भी हालत में बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। चाहे वे बांग्लादेशी हों या रोहिंग्या, उन्हें कानून के दायरे में लाकर वापस उनके देश भेजा जाएगा। हालांकि, इस प्रक्रिया में मानवाधिकारों और अंतरराष्ट्रीय कानूनों का कितना पालन हो रहा है, यह आने वाले समय में सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई से स्पष्ट होगा।

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