IMPCL Privatization: औने-पौने दाम में बेच दी गई सरकारी कंपनी? IMPCL डील पर उठे बड़े सवाल
सरकारी आयुर्वेदिक कंपनी IMPCL Privatization के बाद कर्मचारियों और स्थानीय लोगों में नाराजगी बढ़ गई है। कंपनी की बिक्री कीमत और कर्मचारियों के भविष्य को लेकर कई सवाल खड़े हो रहे हैं
145 करोड़ रुपये की नेटवर्थ वाली सरकारी आयुर्वेदिक कंपनी आखिर 121 करोड़ रुपये में क्यों बेची गई? कर्मचारियों का विरोध, IMPCL Privatization पर उठते सवाल और सरकार के फैसले को लेकर शुरू हुई नई बहस ने इस मामले को चर्चा के केंद्र में ला दिया है। जानिए पूरा मामला।
IMPCL Privatization: सरकारी आयुर्वेदिक कंपनी के निजीकरण पर विवाद, कर्मचारियों ने खोला मोर्चा
उत्तराखंड के अल्मोड़ा स्थित इंडियन मेडिसिन फार्मास्युटिकल कॉर्पोरेशन लिमिटेड (IMPCL) के निजीकरण को लेकर नया विवाद खड़ा हो गया है। आयुर्वेदिक और यूनानी दवाओं के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली इस सरकारी कंपनी को निजी क्षेत्र की कंपनी मेसर्स स्काईमैप फार्मास्युटिकल्स प्राइवेट लिमिटेड को बेच दिया गया है। इस फैसले के बाद कर्मचारियों, स्थानीय लोगों और राजनीतिक हलकों में बहस तेज हो गई है।
कंपनी की बिक्री को लेकर उठ रहे सवाल
IMPCL की कुल नेटवर्थ लगभग 145 करोड़ रुपये बताई जा रही है, जबकि कंपनी का अधिग्रहण 121 करोड़ रुपये में किया गया है। इसी अंतर को लेकर सवाल उठ रहे हैं। आलोचकों का कहना है कि इतनी बड़ी संपत्ति और संसाधनों वाली कंपनी का मूल्यांकन किस आधार पर किया गया और क्या यह सौदा उचित कीमत पर हुआ है।
कंपनी वर्ष 1978 में स्थापित की गई थी और लगभग 40 एकड़ सरकारी भूमि पर संचालित हो रही थी। IMPCL के पास 1,200 प्रकार की औषधियां बनाने का लाइसेंस था तथा वर्तमान में कंपनी 575 आयुर्वेदिक और यूनानी दवाओं का उत्पादन कर रही थी।
सरकारी संस्थानों को होती थी दवाओं की आपूर्ति
IMPCL देश के कई सरकारी अस्पतालों, अनुसंधान संस्थानों और स्वास्थ्य केंद्रों को दवाओं की आपूर्ति करती रही है। आयुष क्षेत्र में इसे एक महत्वपूर्ण सरकारी इकाई माना जाता था। यही वजह है कि इसके निजीकरण को लेकर कई लोग चिंता जता रहे हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि आयुर्वेद और यूनानी चिकित्सा क्षेत्र में सरकारी उपस्थिति का अपना महत्व है। ऐसे में कंपनी के निजीकरण के बाद भविष्य में इसकी कार्यप्रणाली और प्राथमिकताओं में बदलाव की आशंका जताई जा रही है।

कर्मचारियों में बढ़ी नाराजगी
निजीकरण के फैसले के बाद कर्मचारियों के बीच असंतोष बढ़ गया है। कर्मचारियों का आरोप है कि उनके रोजगार, सेवा शर्तों और भविष्य की सुरक्षा को लेकर कोई स्पष्ट आश्वासन नहीं दिया गया है।
आईएमपीसीएल कर्मचारी संघ ने इस मुद्दे को लेकर आंदोलन का ऐलान किया है। कर्मचारियों ने एक जून से धरना और विरोध प्रदर्शन शुरू करने की घोषणा की है। उनका कहना है कि कंपनी के निजीकरण से कर्मचारियों के हित प्रभावित हो सकते हैं।
भाजपा के कुछ नेताओं ने भी जताई आपत्ति
IMPCL Privatization की खास बात यह है कि निजीकरण के इस फैसले पर केवल विपक्ष ही नहीं, बल्कि भाजपा के कुछ नेताओं ने भी आपत्ति दर्ज कराई है। स्थानीय स्तर पर कई जनप्रतिनिधियों और सामाजिक संगठनों ने इस मुद्दे पर सवाल उठाए हैं।
स्थानीय लोगों का कहना है कि कंपनी केवल एक औद्योगिक इकाई नहीं थी, बल्कि क्षेत्र के रोजगार और आर्थिक गतिविधियों का महत्वपूर्ण केंद्र भी थी। ऐसे में इसके निजीकरण के दूरगामी प्रभाव पड़ सकते हैं।
विनिवेश या सरकारी संपत्ति की बिक्री?
IMPCL के निजीकरण के बाद सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि यह सामान्य विनिवेश प्रक्रिया है या फिर सरकारी संपत्तियों को निजी हाथों में सौंपने का मामला। समर्थकों का तर्क है कि निजी निवेश से कंपनी को आधुनिक तकनीक, बेहतर प्रबंधन और विस्तार के अवसर मिल सकते हैं।
वहीं आलोचकों का कहना है कि सरकार को पहले कर्मचारियों के हितों और कंपनी की दीर्घकालिक भूमिका पर स्पष्ट रोडमैप प्रस्तुत करना चाहिए था। इसी वजह से यह मुद्दा अब राजनीतिक और सामाजिक बहस का विषय बन गया है।
फिलहाल कंपनी की बिक्री को लेकर विरोध और सवालों का दौर जारी है। आने वाले दिनों में कर्मचारियों के आंदोलन और सरकार की प्रतिक्रिया पर सबकी नजर रहेगी।
