Chicken consumption drop : युद्ध और गैस संकट से पोल्ट्री कारोबार पर बड़ा असर, 40% नुकसान
चिकन की खपत में गिरावट
Chicken consumption drop: युद्ध और गैस संकट से पोल्ट्री कारोबार पर बड़ा असर
अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच पिछले एक महीने से अधिक समय से जारी युद्ध का असर अब आम जनजीवन के साथ-साथ खाद्य बाजारों पर भी साफ दिखाई देने लगा है। इस अंतरराष्ट्रीय तनाव ने प्रदेश के पोल्ट्री कारोबार को बुरी तरह प्रभावित किया है। खासकर चिकन और अंडों की मांग में आई भारी गिरावट ने कारोबारियों की चिंता बढ़ा दी है। पहले जहां अंडों की खपत में कमी देखी जा रही थी, वहीं अब चिकन की बिक्री भी तेजी से घट रही है।
Chicken consumption drop में 40 फीसदी गिरावट
प्रदेश में हर महीने करीब डेढ़ करोड़ किलो चिकन की खपत होती थी, यानी रोजाना लगभग पांच लाख किलो चिकन की बिक्री होती थी। इसमें से लगभग 20 फीसदी यानी 30 लाख किलो चिकन अन्य राज्यों में सप्लाई किया जाता था। लेकिन मौजूदा हालात में खपत में लगभग 40 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई है। अब स्थिति यह है कि रोजाना की खपत घटकर लगभग तीन लाख किलो रह गई है, यानी करीब दो लाख किलो की दैनिक कमी आई है। इस गिरावट का सीधा असर पोल्ट्री फार्म और उससे जुड़े हजारों कारोबारियों पर पड़ा है।
थोक और खुदरा कीमतों में बड़ा अंतर
चिकन की मांग में कमी आने के कारण पोल्ट्री फार्म स्तर पर कीमतों में भारी गिरावट देखी जा रही है। वर्तमान में बायलर चिकन की थोक कीमत करीब 90 रुपए प्रति किलो तक पहुंच गई है। हालांकि, खुदरा बाजार में इसका असर उतना नहीं दिख रहा। बड़ी चिकन दुकानों में चिकन की कीमत 160 रुपए प्रति किलो तक है, जबकि छोटी दुकानों में यह 180 रुपए प्रति किलो तक बिक रहा है। वहीं, कटा हुआ चिकन 200 से 220 रुपए प्रति किलो के बीच बेचा जा रहा है। इस तरह थोक और चिल्हर कीमतों के बीच बड़ा अंतर देखने को मिल रहा है, जिससे उपभोक्ताओं को राहत नहीं मिल पा रही।

गैस संकट ने बढ़ाई मुश्किलें
Chicken consumption drop में गिरावट का एक बड़ा कारण गैस संकट भी बताया जा रहा है। प्रदेश में चिकन की खपत का बड़ा हिस्सा ढाबों, होटलों और रेस्टोरेंट्स में होता है। लेकिन युद्ध के चलते एलपीजी गैस की आपूर्ति प्रभावित हुई है, जिससे इन संस्थानों में चिकन की डिशेज कम तैयार हो रही हैं। कम गैस उपलब्धता के कारण होटल और रेस्टोरेंट संचालक पहले जितना चिकन नहीं खरीद पा रहे हैं, जिससे बाजार में मांग और भी घट गई है।
घरेलू खपत में भी कमी
केवल होटल और रेस्टोरेंट ही नहीं, बल्कि घरेलू स्तर पर भी Chicken consumption drop में कमी आई है। पहले जो लोग रोजाना चिकन का सेवन करते थे, वे अब सप्ताह में एक या दो बार ही इसे खरीद रहे हैं। इसी तरह जो उपभोक्ता सप्ताह में दो बार चिकन लेते थे, वे अब इसे घटाकर एक बार कर चुके हैं। इस बदलाव ने कुल मिलाकर चिकन की मांग को काफी प्रभावित किया है और बाजार में सुस्ती ला दी है।
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कारोबारियों की बढ़ती चिंता
हैचरी एसोसिएशन सेंट्रल इंडिया बॉयलर के सचिव धनराज बैनर्जी के अनुसार, गैस संकट और युद्ध के कारण होटल-रेस्टोरेंट की मांग में भारी कमी आई है। साथ ही, घरेलू खपत में गिरावट ने भी स्थिति को और खराब कर दिया है। उन्होंने बताया कि इन सभी कारणों से चिकन की कुल खपत में करीब 40 फीसदी की गिरावट आई है, जो पोल्ट्री उद्योग के लिए गंभीर चिंता का विषय है।
सप्लाई चेन पर भी पड़ा असर
Chicken consumption drop में गिरावट का असर सिर्फ बिक्री तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरी सप्लाई चेन प्रभावित हो रही है। पोल्ट्री फार्म से लेकर ट्रांसपोर्ट और रिटेल दुकानों तक हर स्तर पर कारोबार धीमा पड़ गया है। कई छोटे कारोबारियों को लागत निकालना भी मुश्किल हो रहा है।
किसानों और रोजगार पर मंडराया खतरा
पोल्ट्री फार्म चलाने वाले किसानों को भी इस गिरावट का सीधा नुकसान उठाना पड़ रहा है। चारे और दवाइयों की लागत लगातार बढ़ रही है, जबकि चिकन के दाम थोक में कम मिल रहे हैं। इससे किसानों का मुनाफा लगभग खत्म हो गया है। पोल्ट्री उद्योग से जुड़े हजारों लोगों की रोजी-रोटी पर भी असर पड़ रहा है। अगर चिकन की खपत में गिरावट लंबे समय तक बनी रहती है, तो कई छोटे व्यवसाय बंद होने की कगार पर आ सकते हैं।
