नकल रोकने के नाम पर सख्ती या छात्रों की परेशानी? कड़ी धूप में नंगे पांव चलने को मजबूर हुए अभ्यर्थी, कहीं कपड़े कटवाने तक की नौबत
छत्तीसगढ़ व्यावसायिक परीक्षा मंडल (CG Vyapam) द्वारा आयोजित प्रवेश और भर्ती परीक्षाएं एक बार फिर चर्चा में हैं, लेकिन इस बार वजह सवालों की तैयारी नहीं बल्कि अभ्यर्थियों की “तैयारी से पहले की परीक्षा” बन गई है। हालात ऐसे हैं कि कई उम्मीदवारों को तपती गर्मी परीक्षा केंद्र तक नंगे पैर पहुंचना पड़ रहा है, और वजह बताई जा रही है—चप्पलों की मोटाई का अस्पष्ट नियम।
चप्पल पहनने का नियम, लेकिन “कितनी मोटी” यह रहस्य
व्यापम के ड्रेस कोड के अनुसार परीक्षार्थियों को जूते और सैंडल पहनने की अनुमति नहीं है, केवल चप्पल पहनकर आना अनिवार्य है। सुनने में यह नियम सरल लगता है, लेकिन असली समस्या वहीं शुरू होती है जहां स्पष्टता खत्म हो जाती है। नियमों में यह नहीं बताया गया कि चप्पल की मोटाई कितनी होनी चाहिए।
इस अस्पष्टता का नतीजा यह हुआ कि कई अभ्यर्थी मोटे तले वाले बाथरूम स्लिपर पहनकर परीक्षा केंद्र पहुंच रहे हैं। सुरक्षा जांच के दौरान इन्हें भी उतार दिया जा रहा है, क्योंकि आशंका जताई जा रही है कि इनके तले के भीतर छोटे इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस, जैसे चिप या ब्लूटूथ डिवाइस छिपाई जा सकती है। ऐसे में अभ्यर्थी या तो चप्पल से वंचित हो रहे हैं या फिर नंगे पैर परीक्षा केंद्र तक पहुंचने को मजबूर हैं।

200–300 मीटर की “नंगे पैर यात्रा”
कई परीक्षा केंद्रों में मुख्य गेट से परीक्षा कक्ष तक की दूरी 200 से 300 मीटर तक बताई जा रही है। भीषण गर्मी और तपती जमीन के बीच अभ्यर्थियों को यह दूरी नंगे पैर तय करनी पड़ रही है। सवाल यह उठता है कि क्या सुरक्षा के नाम पर यह “यात्रा” परीक्षा का हिस्सा बन गई है? क्या परीक्षा केवल उत्तर पुस्तिका तक सीमित है, या फिर प्रवेश द्वार से शुरू होकर आत्मसम्मान और सुविधा की परीक्षा भी साथ में ली जा रही है?
ड्रेस कोड या डिटेक्शन सिस्टम?
व्यापम की परीक्षाओं में सख्त ड्रेस कोड लागू है। हल्के रंग के आधी बाजू वाले कपड़े ही स्वीकार किए जाते हैं, जबकि फुल स्लीव्स और गहरे रंग के कपड़ों पर प्रतिबंध है। कई जगहों पर यह भी आरोप सामने आए हैं कि दुपट्टे हटवाए गए, शर्ट की बांहें काटी गईं, और कुछ मामलों में अभ्यर्थियों को कपड़े बदलने या हटाने तक के लिए मजबूर किया गया।
ऐसे में एक बड़ा सवाल खड़ा होता है—क्या परीक्षा केंद्र शिक्षा का स्थान हैं या फिर अत्यधिक सख्त “ड्रेस स्कैनिंग जोन”?

क्या नकल रोकने का तरीका ही सबसे बड़ा तनाव बन गया?
नकल रोकने के लिए सख्त कदम उठाना जरूरी माना जाता है, लेकिन सवाल यह है कि क्या सुरक्षा के नाम पर अभ्यर्थियों की गरिमा और मानसिक शांति को दांव पर लगाया जा सकता है?
कई परीक्षार्थियों को ड्रेस कोड की जांच में इतना समय लग जाता है कि परीक्षा से पहले ही मानसिक थकान शुरू हो जाती है। कुछ मामलों में तो अव्यवस्था और सख्ती के कारण छात्र परीक्षा देने से ही वंचित रह जाते हैं।
उपस्थिति के आंकड़े भी कहानी कहते हैं
हाल ही में आयोजित पीपीएचटी और नर्सिंग प्रवेश परीक्षाओं में उपस्थिति दर भी इस स्थिति की एक झलक देती है। हजारों आवेदन के बावजूद केवल 66% और 70% अभ्यर्थी ही परीक्षा में शामिल हुए। क्या यह सिर्फ सामान्य अनुपस्थिति है, या व्यवस्था से जुड़ी असुविधाओं का संकेत?
नियमों की जरूरत या नियमों की व्याख्या की कमी?
ड्रेस कोड, सुरक्षा जांच और नकल रोकने के प्रयास निश्चित रूप से आवश्यक हैं, लेकिन समस्या नियमों में नहीं बल्कि उनकी अस्पष्टता और अनुप्रयोग में दिखाई देती है। चप्पल की मोटाई तक स्पष्ट न होना, क्या यह प्रशासनिक चूक है या अत्यधिक सख्ती का उदाहरण?
असली सवाल जो अब भी बाकी हैं
क्या परीक्षा प्रणाली को इतना कठोर बना देना उचित है कि वह सुविधा और सुरक्षा के बीच संतुलन ही खो दे?
क्या हर अभ्यर्थी को संदिग्ध मानकर ही जांच प्रणाली बनाई जानी चाहिए?
और सबसे महत्वपूर्ण—क्या शिक्षा की परीक्षा देने आए छात्र को पहले व्यवस्था की परीक्षा देनी चाहिए?
इन सवालों के बीच CG Vyapam की यह व्यवस्था एक बार फिर बहस के केंद्र में है, जहां परीक्षा का असली उद्देश्य ज्ञान है, लेकिन अनुभव किसी और ही परीक्षा में बदलता नजर आ रहा है।
