क्या भारत में वैक्सीन से हो रही हैं मौतें?
भारत में कोरोना वैक्सीनेशन अभियान की शुरुआत से ही एक सवाल बार-बार उठता रहा है, क्या वैक्सीन की वजह से मौतें हो रही हैं? खासकर युवाओं में अचानक हृदयाघात या अन्य स्वास्थ्य समस्याओं की खबरें आने के बाद यह चर्चा और तेज हो गई। लेकिन वैज्ञानिक अध्ययन और आधिकारिक रिपोर्ट्स क्या कहती हैं? हमने विभिन्न वेबसाइट्स, सरकारी रिपोर्ट्स और मेडिकल जर्नल्स का विश्लेषण किया है। आईसीएमआर (इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च) और एम्स (ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज) की स्टडीज से पता चलता है कि कोरोना वैक्सीन और मौतों के बीच कोई सीधा संबंध नहीं है। बल्कि, वैक्सीन ने लाखों जानें बचाई हैं.
आईसीएमआर की एक स्टडी में 729 अचानक मौतों के मामलों का विश्लेषण किया गया। इसमें पाया गया कि वैक्सीनेशन से मौतों का जोखिम नहीं बढ़ता। उल्टा, दो डोज लेने वालों में अचानक मौत का खतरा 49% कम था। स्टडी में पाया गया कि मौतों के पीछे अन्य कारक थे, जैसे कि पहले से कोरोना संक्रमण, परिवार में अचानक मौत का इतिहास, शराब का अधिक सेवन, नशीली दवाएं या तीव्र शारीरिक व्यायाम। एम्स की एक ऑटोप्सी-आधारित स्टडी में भी वैक्सीनेशन और युवाओं में अचानक मौतों के बीच कोई लिंक नहीं मिला। स्टडी में 2200 से ज्यादा ऑटोप्सी की गईं, और पाया गया कि वैक्सीनेशन की स्थिति सभी आयु वर्गों में समान थी, लेकिन मौतों का कारण पहले से मौजूद हृदय रोग थे.
सरकार की ओर से जारी रिपोर्ट्स में भी यही बात दोहराई गई है। स्वास्थ्य मंत्रालय ने जुलाई 2025 में कहा कि आईसीएमआर और एनसीडीसी (नेशनल सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल) की स्टडीज से साबित होता है कि कोरोना वैक्सीन सुरक्षित हैं। वैक्सीनेशन ने 2020-2024 के बीच 25 लाख से ज्यादा मौतें रोकीं। ग्लोबल स्टडीज में भारत की वैक्सीन कोविशील्ड और कोवैक्सिन को सुरक्षित बताया गया है। एक लैंसेट स्टडी में कहा गया कि भारत में वैक्सीनेशन ने 42 लाख अतिरिक्त मौतें रोकीं.
हालांकि, कुछ रिपोर्ट्स में वैक्सीन के बाद गंभीर साइड इफेक्ट्स (एईएफआई) का जिक्र है। जनवरी 2021 से अक्टूबर 2022 तक सरकार ने 1,148 मौतें वैक्सीन के बाद रिपोर्ट कीं, लेकिन ये आंकड़े अंडर-रिपोर्टिंग के कारण कम हो सकते हैं। लेकिन कैजुअलिटी असेसमेंट में ज्यादातर मामलों को संयोग माना गया, न कि वैक्सीन का प्रत्यक्ष प्रभाव। एक स्टडी में 2,708 गंभीर एईएफआई में से 45% संयोग थे, और 28% अनिश्चित। मौतों में 41% हुईं, लेकिन उम्र, लिंग और क्षेत्रीय कारकों से जुड़ी थीं। महिलाओं और युवाओं में मौत का जोखिम कम था.
फिर भी, सोशल मीडिया पर अफवाहें फैल रही हैं। एक्स (पूर्व ट्विटर) पर कई पोस्ट्स में दावा किया जा रहा है कि वैक्सीन से मायोकार्डाइटिस या ब्लड क्लॉट्स हो रहे हैं। लेकिन ये दावे आधारहीन हैं। आईसीएमआर की स्टडी में साफ कहा गया कि वैक्सीन से अचानक मौत का जोखिम नहीं बढ़ता। वैक्सीनेशन के बाद हॉस्पिटलाइजेशन और मौतें कम हुई। एक क्रॉस-सेक्शनल स्टडी में पाया गया कि पूर्ण वैक्सीनेशन से मौत का खतरा 70% कम था।
वैक्सीनेशन अभियान की सफलता के बावजूद, हेजिटेंसी बनी हुई है। एक स्टडी में 12% लोग वैक्सीन से हिचकिचा रहे थे, मुख्य कारण साइड इफेक्ट्स का डर। लेकिन वैक्सीन ने कोरोना से मौतों को कम किया। भारत में 2 बिलियन से ज्यादा डोज दिए गए, और गंभीर साइड इफेक्ट्स दुर्लभ हैं। सरकार को और पारदर्शिता बरतनी चाहिए, ताकि अफवाहें रुकें। कुल मिलाकर, वैक्सीन मौतों का कारण नहीं, बल्कि जीवन रक्षक हैं.
वैक्सीन हेजिटेंसी
भारत में वैक्सीनेशन प्रोग्राम दुनिया के सबसे बड़े अभियानों में से एक है, लेकिन वैक्सीन हेजिटेंसी (संकोच) एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। कोरोना वैक्सीन से लेकर अन्य वैक्सीन जैसे एचपीवी या रूटीन इम्यूनाइजेशन तक, लोग डरते हैं। हमने विभिन्न स्टडीज और न्यूज रिपोर्ट्स का विश्लेषण किया। मुख्य कारण हैं – साइड इफेक्ट्स का डर, मिसइनफॉर्मेशन, सांस्कृतिक विश्वास और स्वास्थ्य प्रणाली पर अविश्वास।
एक प्लोस वन स्टडी में गोरखपुर जिले में 12% वैक्सीन हेजिटेंसी पाई गई। कारण थे वैक्सीन की सुरक्षा पर संदेह, तेज विकास और साइड इफेक्ट्स का डर। स्वास्थ्य व्यवहार मॉडल्स से पता चला कि चिंता, जोखिम की धारणा और विश्वास वैक्सीनेशन को प्रभावित करते हैं। जॉन्स हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी की स्टडी में भारत में हेजिटेंसी का मुख्य कारण साइड इफेक्ट्स और प्रभावशीलता पर संदेह बताया गया। 2023 में जीरो-डोज बच्चों की संख्या 16 लाख थी, दुनिया में दूसरी सबसे ज्यादा.
कोरोना वैक्सीन पर हेजिटेंसी ज्यादा थी। एक साइंसडायरेक्ट स्टडी में पाया गया कि 67% लोग वैक्सीन लेने को तैयार थे, लेकिन 23% अनिश्चित और 10% मना कर रहे थे। कारण – साइड इफेक्ट्स, सुरक्षा और सोशल मीडिया अफवाहें। दिसंबर 2020 के सर्वे में ग्रामीण भारत में 44% लोग वैक्सीन के लिए पैसे देने को तैयार नहीं थे। अफवाहें जैसे – वैक्सीन से बांझपन, मौत या सूअर/गाय का खून शामिल होना। हरियाणा में वैक्सीनेशन ड्राइव प्रभावित हुईं इन अफवाहों से।
अन्य वैक्सीनों में भी यही समस्या। एचपीवी वैक्सीन पर 2009-2010 के ट्रायल्स में मौतें और साइड इफेक्ट्स की खबरें आईं, लेकिन जांच में कोई लिंक नहीं मिला। फिर भी, एक्स पर पोस्ट्स में दावा किया जाता है कि गेट्स फाउंडेशन ने ट्राइबल गर्ल्स पर एक्सपेरिमेंट किया। पोलियो और मीजल्स वैक्सीन पर भी हेजिटेंसी रही। धार्मिक विश्वास, स्वास्थ्यकर्मियों पर अविश्वास और पहुंच की कमी कारण हैं। एक स्टडी में पाया गया कि समय की कमी, लंबी वेटिंग और एईएफआई का डर मुख्य बाधाएं हैं।
सोशल मीडिया ने समस्या बढ़ाई। एक्स पर पोस्ट्स में वैक्सीन को “स्वास्थ्य आतंकवाद” कहा जाता है। लेकिन स्टडीज कहती हैं कि हेजिटेंसी से वैक्सीन-प्रिवेंटेबल बीमारियां बढ़ती हैं। मीजल्स और डिप्थीरिया के आउटब्रेक इसी का नतीजा हैं। सरकार ने कम्युनिकेशन स्ट्रैटजी शुरू की, लेकिन डिजिटल लिटरेसी की कमी समस्या है।
समाधान के लिए, सबूत-आधारित शिक्षा, कम्युनिटी एंगेजमेंट और पारदर्शी कम्युनिकेशन जरूरी। डॉक्टर्स और सरकार को अफवाहें दूर करनी होंगी। वैक्सीन हेजिटेंसी से लाखों जानें खतरे में हैं। जागरूकता से ही इसे हराया जा सकता है।
वैक्सीन मिथक
वैक्सीनेशन को लेकर भारत में कई मिथक फैले हैं, जो हेजिटेंसी बढ़ाते हैं। कोरोना से लेकर एचपीवी तक, अफवाहें आम हैं। हमने फैक्ट्स और मिथकों का विश्लेषण किया.
मिथक 1: वैक्सीन से बीमारी होती है जिससे बचाती हैं।
तथ्य: वैक्सीन इम्यून सिस्टम को उत्तेजित करती हैं बिना बीमारी पैदा किए। कमजोर या मृत वायरस इस्तेमाल होते हैं.
मिथक 2: वैक्सीन से ऑटिज्म होता है।
तथ्य: 1998 की एक स्टडी झूठी साबित हुई। बड़े अध्ययन में कोई लिंक नहीं.
मिथक 3: वैक्सीन में हानिकारक तत्व हैं।
तथ्य: मात्रा सुरक्षित है। कोई भी चीज ज्यादा हो तो विषैली, लेकिन वैक्सीन में सुरक्षित स्तर.
मिथक 4: वैक्सीन से बांझपन या मौत।
तथ्य: कोई सबूत नहीं। ग्लोबल स्टडीज में वैक्सीन सुरक्षित.
मिथक 5: कोरोना वैक्सीन तेज बनी, असुरक्षित।
तथ्य: दशकों की रिसर्च पर आधारित। भारत में कोविशील्ड और कोवैक्सिन सुरक्षित, लाखों जानें बचाई.
एचपीवी वैक्सीन पर मिथक: ट्रायल्स में मौतें हुईं।
तथ्य: जांच में कोई लिंक नहीं। गेट्स फाउंडेशन ने नैतिक ट्रायल्स किए, लेकिन सहमति मुद्दों से बैकलैश.
अन्य मिथक: वैक्सीन में सूअर या गाय का खून।
तथ्य: नहीं। धार्मिक संगत।
वैक्सीन तथ्य: 30 लाख बच्चे सालाना बचते हैं। हर्ड इम्यूनिटी से समाज सुरक्षित। भारत में 76% पूर्ण इम्यूनाइजेशन, लेकिन 24% कमी। मिथकों से बीमारियां बढ़ती हैं। जागरूकता जरूरी।
