युद्ध की मार से प्लास्टिक उद्योग बेहाल: पाउच से पन्नी तक 50% महंगे
रायपुर: अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच बढ़ते युद्ध जैसे हालात का असर अब दुनियाभर के उद्योगों पर दिखाई देने लगा है। भारत में भी इसका सीधा प्रभाव प्लास्टिक उद्योग पर पड़ा है। कच्चे तेल की कीमतों में आई तेजी के कारण प्लास्टिक उद्योग बुरी तरह प्रभावित हुआ है। प्लास्टिक से बनने वाले लगभग सभी सामान महंगे हो गए हैं, वहीं उत्पादन में भी गिरावट दर्ज की जा रही है। कारोबारियों का कहना है कि लागत बढ़ने और मांग घटने से उद्योग संकट के दौर से गुजर रहा है।
दरअसल, प्लास्टिक उत्पादों के निर्माण में इस्तेमाल होने वाला सबसे अहम कच्चा माल “प्लास्टिक दाना” होता है। पहले यह 100 रुपए प्रति किलो तक उपलब्ध था, लेकिन अब इसके दाम बढ़कर 180 से 200 रुपए प्रति किलो तक पहुंच गए हैं। इसी तरह प्लास्टिक स्क्रैप, जो पहले 70 से 80 रुपए किलो मिलता था, अब 120 से 130 रुपए प्रति किलो बिक रहा है। कच्चे माल की कीमतों में भारी बढ़ोतरी के चलते प्लास्टिक से बने हर प्रकार के उत्पादों की लागत बढ़ गई है।
पेट्रोकेमिकल्स महंगे होने से बढ़ी उत्पादन लागत
विशेषज्ञों के अनुसार प्लास्टिक दाना तैयार करने के लिए एथिलीन और प्रोपलीन जैसे पेट्रोकेमिकल्स की जरूरत होती है, जो सीधे कच्चे तेल से तैयार किए जाते हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तेल की कीमतों में उछाल आने से इन पेट्रोकेमिकल्स की लागत भी बढ़ गई है। इसका सीधा असर प्लास्टिक उद्योग पर पड़ा है। उद्योग से जुड़े लोगों का कहना है कि जब कच्चा माल महंगा होगा तो प्लास्टिक उत्पादों की कीमतें बढ़ना तय है। यही वजह है कि घरेलू उपयोग से लेकर पैकेजिंग तक में इस्तेमाल होने वाली प्लास्टिक सामग्री के दाम लगातार बढ़ रहे हैं।

पाउच और प्लास्टिक पन्नी के दाम में भारी उछाल
नमकीन, दूध, दही, तेल और अन्य खाद्य उत्पादों की पैकिंग में इस्तेमाल होने वाले प्लास्टिक पाउच अब पहले से काफी महंगे हो गए हैं। राजधानी के नमकीन कारोबारी राधाकिशन सुंदरानी ने बताया कि जो प्रिंटेड पाउच पहले 200 रुपए किलो मिलते थे, उनकी कीमत अब बढ़कर 300 रुपए किलो तक पहुंच गई है। यानी सीधे 50 फीसदी तक की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। इसी तरह सिंगल यूज प्लास्टिक पन्नी के दाम भी तेजी से बढ़े हैं। पहले यह 100 से 120 रुपए किलो बिकती थी, लेकिन अब इसके भाव 180 से 200 रुपए किलो तक पहुंच गए हैं। कारोबारियों का कहना है कि इसका असर छोटे व्यापारियों से लेकर बड़े उद्योगों तक पर पड़ रहा है।
खाद्य तेल, चावल और सीमेंट पैकिंग भी प्रभावित
प्लास्टिक की महंगाई का असर केवल छोटे उत्पादों तक सीमित नहीं है। चावल और सीमेंट की प्लास्टिक बोरियों के दाम भी बढ़ गए हैं। खाद्य तेल की पैकिंग पर आने वाला खर्च भी लगभग दोगुना हो चुका है। कारोबारियों के मुताबिक, पहले एक लीटर तेल की पैकिंग पर करीब 90 पैसे से एक रुपए तक खर्च आता था, लेकिन अब यही लागत बढ़कर करीब दो रुपए तक पहुंच गई है। पैकेजिंग लागत बढ़ने से कंपनियां अब उत्पादों की कीमतों में इजाफा करने पर मजबूर हो रही हैं। इससे आम उपभोक्ताओं की जेब पर भी सीधा असर पड़ रहा है।
उद्योगों का उत्पादन घटा, मांग भी हुई कम
प्लास्टिक उद्योग से जुड़े व्यापारियों का कहना है कि बढ़ती लागत के कारण कई छोटे उद्योगों ने उत्पादन कम कर दिया है। महंगे उत्पादों की वजह से बाजार में मांग भी कमजोर पड़ने लगी है। उद्योग संचालकों का कहना है कि यदि यही स्थिति बनी रही तो आने वाले समय में कई छोटे उद्योग बंद होने की कगार पर पहुंच सकते हैं। प्रदेश में प्लास्टिक उद्योग से जुड़े हजारों लोगों को रोजगार मिलता है। ऐसे में इस क्षेत्र में मंदी आने से रोजगार पर भी असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है।
सरकार से राहत पैकेज की मांग
छत्तीसगढ़ चैंबर ऑफ कॉमर्स के अध्यक्ष सतीश थौरानी ने कहा कि प्लास्टिक के दाम लगातार बढ़ने से इससे जुड़े उद्योग बुरी तरह प्रभावित हुए हैं। प्रदेश में करीब 200 प्लास्टिक उद्योग संचालित हैं, जो वर्तमान में संकट का सामना कर रहे हैं। उन्होंने सरकार से मांग की है कि उद्योगों को राहत देने के लिए विशेष योजना बनाई जाए। उनका कहना है कि यदि सरकार सब्सिडी या अन्य आर्थिक सहायता उपलब्ध कराए तो उद्योगों को राहत मिल सकती है और उत्पादन दोबारा सामान्य हो सकेगा।
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