NHM कर्मचारियों के सामूहिक इस्तीफे के बाद स्वास्थ्य सेवाएं ठप.. संघ के अध्यक्ष ने कहा– “160 बार ज्ञापन देने के बाद भी नहीं हुई कोई सुनवाई”
रायपुर। छत्तीसगढ़ इन दिनों मौसमी बीमारियों के प्रकोप से जूझ रहा है, लेकिन इस संकट की घड़ी में राज्य की स्वास्थ्य सेवाएं बुरी तरह प्रभावित हो गई हैं। वजह है—राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (एनएचएम) के संविदा कर्मचारियों का अनिश्चितकालीन आंदोलन, जो बीते 18 अगस्त से जारी है। संविदा स्वास्थ्य कर्मचारियों ने अपनी 10 सूत्री मांगों को लेकर यह आंदोलन शुरू किया था। कर्मचारियों का आरोप है कि बार-बार आश्वासन के बावजूद सरकार ने उनकी समस्याओं का समाधान नहीं किया। अब स्थिति इतनी गंभीर हो गई है कि पूरे प्रदेश में स्वास्थ्य सेवाएं चरमराने लगी हैं।
चुनावी वादों से लेकर आंदोलन तक
एनएचएम कर्मचारी संघ के प्रदेश अध्यक्ष डॉ. अमित मिरी ने प्रेसवार्ता में कहा कि विधानसभा चुनाव 2023 के दौरान भाजपा ने अपने घोषणा पत्र में मोदी की गारंटी का हवाला देते हुए संविदा स्वास्थ्य कर्मचारियों की समस्याओं को हल करने का वादा किया था। लेकिन सरकार बने 20 महीने से ज्यादा हो गए और 160 से अधिक ज्ञापन मुख्यमंत्री, स्वास्थ्य मंत्री, वित्त मंत्री, उपमुख्यमंत्री, सांसद और विधायकों को सौंपने के बाद भी कर्मचारियों की मांगों पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई।
निराश होकर एनएचएम कर्मचारियों ने कई बार आंदोलन का सहारा लिया। जुलाई 2024 में विधानसभा मानसून सत्र के दौरान दो दिवसीय प्रदर्शन, मई 2025 में विश्व मजदूर दिवस पर आंदोलन और जुलाई 2025 में फिर दो दिवसीय धरना दिया गया। तब भी शासन ने कार्रवाई का आश्वासन दिया, लेकिन समयसीमा तय न होने से कर्मचारियों का आक्रोश बढ़ता गया। अंततः 16 अगस्त तक भी कोई ठोस निर्णय न आने पर 18 अगस्त से कर्मचारी अनिश्चितकालीन हड़ताल पर चले गए।
आंदोलन की मुख्य मांगें
कर्मचारी संघ ने अपनी 10 सूत्री मांगें रखी हैं, जिनमें प्रमुख हैं—
- संविलियन और जॉब सुरक्षा
- पब्लिक हेल्थ कैडर की स्थापना
- ग्रेड पे निर्धारण
- कार्य मूल्यांकन प्रणाली में सुधार
- लंबित 27% वेतन वृद्धि
- नियमित भर्ती में सीटों का आरक्षण
- अनुकंपा नियुक्ति
- मेडिकल और अन्य अवकाश की सुविधा
- स्थानांतरण नीति
- न्यूनतम 10 लाख का चिकित्सा बीमा
डॉ. मिरी का कहना है कि सरकार इन मांगों पर स्पष्ट रुख नहीं अपना रही है।
शासन से बनी सहमति पर भी आपत्ति
शासन ने पांच मांगों पर सहमति जताई थी, लेकिन कर्मचारी संघ ने उन पर भी आपत्ति दर्ज कराई है।
- ट्रांसफर नीति: पहले भी कई बार समितियां बनीं लेकिन कोई ठोस हल नहीं निकला। इस बार भी समिति के काम की समयसीमा तय नहीं की गई है।
- सीआर व्यवस्था: अपीलेट अथॉरिटी बनाई गई है, लेकिन संघ का कहना है कि जब तक अथॉरिटी का अंतिम निर्णय न आए, तब तक कर्मचारी की सेवा समाप्त नहीं की जानी चाहिए।
- 10 लाख का कैशलेस बीमा: अभी तक कोई सर्कुलर जारी नहीं हुआ। संघ का कहना है कि कर्मचारी कल्याण के लिए हर साल करोड़ों की राशि लैप्स हो जाती है, लेकिन उसका सही उपयोग नहीं हो रहा।
- 27% लंबित वेतन वृद्धि: इसे 5% कर दिया गया है और उस पर भी कोई आदेश जारी नहीं हुआ।
- सवैतनिक अवकाश: इस पर जारी सर्कुलर के अनुसार राज्य कार्यालय निर्णय करेगा, जबकि संघ चाहता है कि निर्णय जिला स्तर पर हो और तय समय सीमा के भीतर पूरा किया जाए।
स्वास्थ्य मंत्री पर लगाए आरोप
एनएचएम कर्मचारी संघ का आरोप है कि प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री लगातार यह कह रहे हैं कि नियमितीकरण और अन्य सुविधाओं के लिए केंद्र की अनुमति जरूरी है, जबकि यह पूरी तरह से गलत है। संघ ने दावा किया कि केंद्र सरकार के संयुक्त सचिव मनोज झालानी द्वारा भेजे गए पत्र और हाल ही में सूचना के अधिकार (RTI) से मिली जानकारी यह साबित करती है कि एनएचएम कर्मचारियों के नियमितीकरण सहित कई सुविधाएं राज्य सरकार के अधिकार क्षेत्र में आती हैं।
सामूहिक इस्तीफे से बढ़ा संकट
आंदोलन के दौरान शासन ने सभी कर्मचारियों को 24 घंटे के भीतर ड्यूटी ज्वाइन करने की चेतावनी दी। इसके विरोध में कर्मचारियों ने राज्य स्वास्थ्य भवन का घेराव किया और चेतावनी पत्र को वहीं जला दिया। बाद में उच्च अधिकारियों के साथ चर्चा हुई, लेकिन कोई समाधान नहीं निकला।
स्थिति तब और बिगड़ गई जब प्रदेश अध्यक्ष सहित 29 पदाधिकारियों को सेवा से हटाने का आदेश जारी कर दिया गया। इसके विरोध में 4 सितंबर को प्रदेशभर के हजारों कर्मचारियों ने अपने जिला कार्यालयों में सामूहिक इस्तीफा दे दिया। संघ ने घोषणा की है कि आंदोलन अब और तेज किया जाएगा।
स्वास्थ्य सेवाएं प्रभावित
लगातार जारी हड़ताल का असर प्रदेश की स्वास्थ्य सेवाओं पर साफ दिखाई दे रहा है।
- पोषण पुनर्वास केंद्रों में बच्चों का इलाज ठप है।
- स्कूलों और आंगनबाड़ी में स्वास्थ्य परीक्षण और टीकाकरण प्रभावित हैं।
- टीबी और मलेरिया की जांचें बाधित हो रही हैं।
- प्रसव कार्य और नवजात शिशु केंद्रों की सेवाएं अधर में लटकी हुई हैं।
ग्रामीण इलाकों में स्वास्थ्य सुविधाएं लगभग ठप हो गई हैं। सबसे ज्यादा परेशानी गरीब और दूर-दराज के मरीजों को उठानी पड़ रही है।
समाधान की मांग
एनएचएम कर्मचारी संघ के प्रदेश अध्यक्ष डॉ. अमित मिरी ने कहा कि “शासन और कर्मचारियों के बीच संवाद की कमी के कारण यह संकट खड़ा हुआ है। जनता को स्वास्थ्य सेवाओं से वंचित करना हमारा उद्देश्य नहीं है, लेकिन मजबूरी में हमें आंदोलन का रास्ता चुनना पड़ा।” उन्होंने राज्य सरकार से अपील की कि वह तत्काल कर्मचारियों से बातचीत कर कोई ठोस समाधान निकाले।
मौसमी बीमारियों के इस दौर में छत्तीसगढ़ की जनता दोहरी मार झेल रही है—एक ओर बीमारी का खतरा और दूसरी ओर स्वास्थ्य सेवाओं की अनुपलब्धता। अब सभी की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि सरकार और कर्मचारी संघ के बीच संवाद कब और कैसे होता है।
