क्या AI से बनी मूर्तियां धार्मिक भावनाओं से खिलवाड़ है? रायपुर में गणेश के बाद अब दुर्गा मूर्तियों पर विवाद, बजरंग दल और विहिप ने FIR की दी चेतावनी
रायपुर। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में AI तकनीक और कार्टून जैसे डिज़ाइन से बनी मां दुर्गा की प्रतिमाएं अब धार्मिक विवाद का कारण बन गई हैं। कुछ ही दिन पहले AI आधारित भगवान गणेश की प्रतिमाओं पर बवाल हुआ था, और अब नवरात्रि से पहले दुर्गा प्रतिमाओं को लेकर बजरंग दल और विश्व हिंदू परिषद (विहिप) ने कड़ा विरोध दर्ज कराया है।
विवाद की शुरुआत कहां से हुई?
रायपुर के माना इलाके में स्थापित मूर्तिकारों के स्टॉल पर विहिप और बजरंग दल के कार्यकर्ता पहुंचे। उन्होंने आपत्ति जताई कि कुछ मूर्तियां आधुनिक या कार्टून जैसे रूपों में बनाई जा रही हैं, जो मां दुर्गा के पारंपरिक स्वरूप से मेल नहीं खातीं।
विहिप जिला उपाध्यक्ष योगेश सैनी ने आरोप लगाया कि—
“कुछ प्रतिमाएं देवी को आधे कपड़ों में दिखा रही हैं, जो हमारे धार्मिक मूल्यों और नवरात्रि की आस्था के खिलाफ है। अगर ऐसा नहीं रोका गया, तो हम संबंधित मूर्तिकारों पर FIR दर्ज करवाएंगे।”
पहले भी उठ चुकी है आवाज़
गौरतलब है कि कुछ ही समय पहले रायपुर में AI से बनी गणेश प्रतिमाएं भी चर्चा का विषय बनी थीं। उस समय भी सर्व हिंदू समाज समेत कई संगठनों ने यह कहते हुए विरोध किया था कि: “धार्मिक मूर्तियों के स्वरूप में इस तरह के ‘ट्रेंडिंग बदलाव’ परंपराओं और श्रद्धा की पवित्रता को ठेस पहुंचाते हैं।”
क्या कहते हैं मूर्तिकार?
कुछ स्थानीय मूर्तिकारों का कहना है कि—”नई पीढ़ी की पसंद और सोशल मीडिया के ट्रेंड को ध्यान में रखते हुए प्रतिमाओं में कुछ बदलाव किए जाते हैं, लेकिन हमारा उद्देश्य कभी किसी की आस्था को ठेस पहुंचाना नहीं होता।” हालांकि विरोध के बाद कुछ मूर्तिकारों ने AI डिज़ाइन वाली मूर्तियों को हटाना शुरू कर दिया है।
प्रशासन की भूमिका पर भी सवाल
अब सवाल यह भी उठ रहा है कि स्थानीय प्रशासन और संस्कृति विभाग इन बदलते रुझानों और विरोधों के बीच कैसे संतुलन बनाएगा? क्या कोई स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी होंगे?
अब उठते हैं ये अहम सवाल:
क्या AI या आधुनिक तकनीक से बनी मूर्तियां आस्था के मूल स्वरूप से खिलवाड़ हैं या यह कला की नई अभिव्यक्ति है?
धार्मिक आयोजनों में रचनात्मकता की कितनी सीमा तय की जानी चाहिए?
क्या प्रशासन को मूर्तियों के स्वरूप को लेकर दिशा-निर्देश जारी करने चाहिए?
क्या यह मामला सिर्फ धार्मिक भावनाओं का है, या इसके पीछे राजनीतिक उद्देश्य भी हैं?
बदलती पीढ़ी और डिजिटल युग में पारंपरिक संस्कृति की रक्षा कैसे हो?
