‘आशीर्वाद’ का दीया या खजाने का धुआं? पीएम के जन्मदिन पर उज्जैन और रायपुर में जले 58 लाख दीये, बस्ते छुड़ाकर कतार में खड़े किए गए नौनिहाल
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिन के बहाने सरकारी खजाने को ‘दीपोत्सव’ की भट्ठी में झोंकने की होड़ मच गई। अंधकार मिटाने के नाम पर शुरू हुए ‘सेवा संकल्प अभियान’ का यह जलसा असल में आंकड़ों के दिखावे और इवेंट मैनेजमेंट की नुमाइश बनकर रह गया। जब मध्य प्रदेश के उज्जैन और छत्तीसगढ़ के रायपुर में तेल और बाती की नदियां बहाई जा रही थीं, तब बुनियादी सुविधाओं के अभाव में जूझती जनता यह समझने की कोशिश कर रही थी कि इस चकाचौंध से आखिर किसका मुकद्दर रोशन हुआ।
शिप्रा किनारे 33.27 लाख दीयों का ‘विश्व रिकॉर्ड’ और करोड़ों स्वाहा
मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के गृह नगर उज्जैन में दीपोत्सव के नाम पर आंकड़ों का ऐसा तांडव हुआ कि पूरा तंत्र केवल तेल नापने में व्यस्त हो गया। शिप्रा के रामघाट, दत्त अखाड़ा से लेकर महाकाल लोक तक कुल 33.27 लाख दीये एक साथ प्रज्वलित कर ‘विश्व रिकॉर्ड’ बनाने का दावा किया गया। पूरे प्रदेश में तो 3.55 करोड़ दीपों की बात कही गई, लेकिन सारा दम उज्जैन में दिखा।
इस भव्य रिकॉर्ड की कीमत भी उतनी ही रिकॉर्डतोड़ रही। करीब 33 लाख से अधिक दीयों की थोक लागत लगभग ₹50 से ₹55 लाख रही। वहीं, लाखों दीयों के पेट भरने के लिए बहे 70 हजार लीटर से अधिक तेल पर करीब ₹1.10 से ₹1.25 करोड़ फूंक दिए गए। वीआईपी मंच, साउंड, लेजर और सुरक्षा व्यवस्था का भारी-भरकम बजट जोड़ लें, तो चंद घंटों के इस कीर्तिमान पर ₹2.5 करोड़ से अधिक की सरकारी व प्रायोजित राशि स्वाहा हो गई।
रायपुर में 13 किमी के दायरे में 25 लाख दीये और विभागों को मिला ‘टारगेट’
पड़ोसी राज्य छत्तीसगढ़ भी इस राजनीतिक भक्ति-दौड़ में पीछे नहीं रहा। राजधानी रायपुर में सिविल लाइन स्थित मुख्यमंत्री निवास से लेकर तेलीबांधा मरीन ड्राइव तक करीब 13 किलोमीटर की परिधि में 25 लाख दीये बिछाए गए। दिलचस्प यह रहा कि इस ‘सेवा’ को साकार करने के लिए विभागों को बाकायदा मौखिक टारगेट थमाए गए—महिला एवं बाल विकास को 2.50 लाख, आदिवासी कल्याण को 1 लाख और आबकारी तक को 25 हजार दीयों का कोटा मिला।
रायपुर में 20 रुपये दर्जन के बाजार भाव के हिसाब से सिर्फ 25 लाख मिट्टी के दीयों की अनुमानित खरीद लागत ही ₹37.50 लाख बैठती है। इसके ऊपर लगभग 50 हजार लीटर तेल और बत्तियों का खर्च ₹80 से ₹90 लाख रहा। इवेंट मैनेजमेंट, बैरिकेडिंग और ड्रोन फोटोग्राफी का तामझाम मिलाकर रायपुर की शाम को रोशन करने में करीब ₹1.75 करोड़ से ₹2 करोड़ का धुआं उड़ा दिया गया।
किताबों की जगह तेल की बोतल: जब ‘भविष्य’ बना इवेंट का मजदूर
इस पूरे तमाशे का सबसे कड़वा पहलू वे स्कूली बच्चे रहे, जिन्हें भारत का ‘भविष्य’ कहा जाता है। शासन की प्राथमिकताओं का आलम यह था कि स्कूलों और कॉलेजों के हजारों छात्र-छात्राओं को क्लासरूम से उठाकर घाटों और सड़कों पर कतारबद्ध कर दिया गया। जिस समय नन्हें हाथों में पेन और कॉपी होनी चाहिए थी, उस समय वे चिलचिलाती धूप में घुटनों के बल बैठकर 13 किलोमीटर लंबी कतारों में दीये बिछाने, गिनती करने और तेल उड़ेलने की ‘अनौपचारिक ट्रेनिंग’ ले रहे थे। सरकारी आदेशों और हाजिरी के डर से शिक्षक भी बच्चों से दीये सजवाते नजर आए। जो स्कूल पंखों की कमी, टपकती छतों और शिक्षकों के खाली पदों से जूझ रहे हैं, उनके बच्चों को महज एक राजनेता के जन्मदिन पर ‘फ्री वालंटियर’ बनाकर धूप में झोंक देना इस व्यवस्था के प्राथमिकताओं पर सबसे बड़ा व्यंग्य है।
पसीना बहाया बच्चों और मुलाजिमों ने, मालाएं पहन ले उड़े माननीय
इस महा-आयोजन का असली फलसफा दीये बुझने के बाद सामने आया। दिनभर चिलचिलाती धूप में घुटने छिलवाकर दीये बिछाने वाले नन्हें बच्चे खाली पेट घरों को लौटे, और निलंबन के डर से दिन-रात एक करने वाले छोटे कर्मचारी-अधिकारी तेल से सने कपड़े समेटते रह गए। लेकिन जैसे ही दीयों की लौ भड़की, कैमरा चमका और सोशल मीडिया पर तस्वीरों की बाढ़ आई, सारी मेहनत की मलाई राजनेताओं की थाली में परोस दी गई। घंटों पसीना बहाने वाले स्कूली बच्चों और मुलाजिमों का नामोनिशान तक नहीं दिखा; मंच पर खड़े होकर वर्ल्ड रिकॉर्ड का सर्टिफिकेट थामने, सीना चौड़ा करने और शीर्ष नेतृत्व के सामने नंबर बढ़ाने की सारी वाहवाही खादीधारी नेता अकेले ही लूट ले गए। व्यवस्था की विडंबना देखिए—हाथ काले किए बच्चों और कर्मचारियों ने, और उस कालिख की चमक से अपनी राजनीतिक रोटियां सेंक लीं हुक्मरानों ने।
