“अवार्ड जेब में… जनता नर्क में” सरकार गिनाते रही स्वच्छता की ‘महान’ उपलब्धियां, पहली बारिश और हकीकत सबके सामने!

कागजी स्वच्छता के अवार्ड, जमीनी हकीकत में गंदगी का अंबार, इछावर से शुरू होकर पूरे मध्य प्रदेश तक लापरवाही, करोड़ों का बजट गया कहां?

 

सीहोर जिले के इछावर में मानसून से पहले हुई हल्की बारिश ने नगर परिषद के स्वच्छता के बड़े-बड़े दावों को पूरी तरह बेनकाब कर दिया है। नालियां चोक, सड़कें कीचड़ से भरी, बदबू फैली हुई यह तस्वीर केवल इछावर की नहीं, बल्कि मध्य प्रदेश की कई नगर पालिकाओं की वास्तविकता को उजागर करती है। BJP शासित मध्य प्रदेश सरकार स्वच्छता सर्वेक्षण में इंदौर को लगातार आठवीं बार स्वच्छतम शहर का तमगा दिलवाती है, भोपाल को दूसरा स्थान दिलाती है, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां करती है। लाखों-करोड़ों रुपये के बजट के बावजूद सफाई महज कागजों पर सिमटकर रह गई है।

 

इछावर नगर परिषद ने स्वच्छता के नाम पर करोड़ों रुपये बहाए, दिल्ली-भोपाल से अवार्ड लेकर अपनी पीठ थपथपाई, लेकिन पहली हल्की बारिश में ही सड़कें नालियों का गंदा पानी उगलने लगीं। स्थानीय निवासियों का आरोप है कि पिछले कई महीनों से नालियों की सफाई नहीं हुई। कचरा, कीचड़ और प्लास्टिक ने नालियों को पूरी तरह बंद कर रखा था। नतीजा हल्की बारिश में गंदा पानी सड़कों पर बह निकला, घरों के सामने जमा हो गया। इलाके में संक्रामक बीमारियों का खतरा मंडरा रहा है। मच्छरों का प्रकोप बढ़ गया है।

 

मई 2026 के अंत में इछावर के एक पार्षद जुनैद खान ने साफ चेतावनी दी थी कि अगर सात दिनों में गंदे नाले की सफाई और अधूरे निर्माण कार्य पूरे नहीं किए गए तो वार्डवासी नाले की गंदगी निकालकर सीधे नगर परिषद कार्यालय के मुख्य द्वार पर फेंक देंगे। दुर्गंध और मच्छरों से जनता त्रस्त है। यह बात साफ बताती है कि जिम्मेदार अधिकारी एसी कमरों में बैठे अवार्ड बांटने और रिपोर्ट तैयार करने में व्यस्त हैं, जबकि जनता नरक भोग रही है।

 

मध्य प्रदेश भर में एक जैसी कहानी

 

यह समस्या केवल इछावर तक सीमित नहीं है। मध्य प्रदेश के कई शहरों में हालात लगभग एक जैसे हैं। भोपाल, इंदौर, ग्वालियर जैसे शहरों में भी नालियां कचरे से भरी पड़ी हैं। हाल की खबरों में चित्रकूट, छतरपुर जैसे क्षेत्रों में भी नालियों में कचरा और गंदगी की भरमार बताई गई है, जहां नियमित सफाई न होने से हल्की बारिश में पानी सड़कों पर आ जाता है। इंदौर को स्वच्छतम शहर कहकर सरकार सीना फुलाती है, लेकिन वहां भी पानी प्रदूषण और गंदगी की शिकायतें आती रहती हैं। विपक्ष पहले ही कह चुका है कि अवार्ड फर्जी दस्तावेजों पर आधारित हैं, जबकि जनता गंदा पानी पीने को मजबूर है।

 

पिछले 2-3 दिनों में इछावर क्षेत्र के गांव झारखेड़ा समेत कई जगहों पर जल संकट की खबरें आई हैं। गर्मी में पानी के लिए हाहाकार मचा है, महिलाएं और बच्चे रात के 11 बजे तक पानी भरने को मजबूर हैं। वहीं दूसरी ओर, स्वच्छता के नाम पर बजट पास होता है लेकिन नालियां नहीं साफ होतीं। सरकार विकास के ढिंढोरे पीटती है, लेकिन बुनियादी सुविधाएं सफाई, सुरक्षा, पानी जनता से दूर होती जा रही हैं।

 

करोड़ों का बजट कहां गया?

 

सवाल यह है कि स्वच्छता मिशन के तहत मध्य प्रदेश को केंद्र से मिले करोड़ों रुपये का क्या हुआ? इछावर जैसे छोटे शहरों में नालियां चोक क्यों हैं? कचरा प्रबंधन कहां है? प्लास्टिक और निर्माण मलबा नालियों में क्यों डाला जाता है? जिम्मेदार अधिकारी और पार्षद जनता के टैक्स पर एसी में बैठकर रिपोर्टें तैयार करते हैं, जबकि सड़कें गंदगी से भरी पड़ी हैं।

 

भारी बारिश आने वाली है। अगर हल्की बारिश में यह हाल है तो मानसून में इछावर, भोपाल, इंदौर समेत पूरे प्रदेश का क्या हाल होगा? शहरी बाढ़, जलभराव, बीमारियां ये सब बढ़ने वाले हैं। BJP सरकार की ‘सबका साथ, सबका विकास’ की बात खोखली साबित हो रही है। अवार्ड बांटने वाली मशीनरी तेज है, लेकिन जमीनी काम शून्य।

 

कुंभकर्णी नींद सोए जिम्मेदार कब जागेंगे?

 

इछावर की जनता पूछ रही है टैक्स तो समय पर भरते हैं, लेकिन साफ-सुथरी सड़कें, साफ नालियां और स्वच्छ पर्यावरण क्यों नहीं मिलता? कुंभकर्णी नींद सोए जिम्मेदार कब जागेंगे? एसी कमरों से बाहर निकलकर देखें कि अवार्ड की चमक के पीछे जनता कैसे गंदगी में सांस ले रही है।

 

मध्य प्रदेश सरकार को अब कागजी घोड़ों को दौड़ाना बंद करना चाहिए। वास्तविक सफाई अभियान चलाएं, नालियों की नियमित सफाई सुनिश्चित करें, कचरा प्रबंधन को मजबूत करें और बजट का सही उपयोग करें। अन्यथा, आने वाली बारिश न केवल सड़कों को, बल्कि सरकार की credibility को भी बहा ले जाएगी।

 

इछावर एक उदाहरण है, लेकिन समस्या statewide है। इंदौर के अवार्ड की चमक भले दिल्ली तक पहुंचे, लेकिन इछावर, झारखेड़ा और सैकड़ों गांव-शहरों की गंदगी और जल संकट सरकार की असली तस्वीर पेश कर रहे हैं।

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